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मुनव्वर राना की चुनिंदा ग़ज़लें | Munnawar Rana Ki Chuninda Ghazle (Part 2)

Hindi Kavita
हिंदी कविता

Munnawar-Rana 
 

मुनव्वर राना  की चुनिंदा ग़ज़लें | Munnawar Rana Ki Chuninda Ghazle (Part 2)

नुमाइश के लिए गुलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं - मुनव्वर राना

नुमाइश के लिए गुलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
 
मुलाक़ातों पे हँसते, बोलते हैं, मुस्कराते हैं
तबीयत में मगर बेज़ारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
 
खुले रखते हैं दरवाज़े दिलों के रात-दिन दोनों
मगर सरहद पे पहरेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
 
उसे हालात ने रोका मुझे मेरे मसायल ने
वफ़ा की राह में दुश्वारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
 
मेरा दुश्मन मुझे तकता है, मैं दुश्मन को तकता हूँ
कि हायल राह में किलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
 
मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है
मिरे कांधे पे ज़िम्मेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

पैरों को मिरे दीदा-ए-तर बाँधे हुए है - मुनव्वर राना

पैरों को मिरे दीदा-ए-तर बाँधे हुए है
ज़ंजीर की सूरत मुझे घर बाँधे हुए है
 
हर चेहरे में आता है नज़र एक ही चेहरा
लगता है कोई मेरी नज़र बाँधे हुए है
 
बिछड़ेंगे तो मर जाएँगे हम दोनों बिछड़ कर
इक डोर में हम को यही डर बाँधे हुए है
 
पर्वाज़ की ताक़त भी नहीं बाक़ी है लेकिन
सय्याद अभी तक मिरे पर बाँधे हुए है
 
हम हैं कि कभी ज़ब्त का दामन नहीं छोड़ा
दिल है कि धड़कने पे कमर बाँधे हुए है
 
आँखें तो उसे घर से निकलने नहीं देतीं
आँसू है कि सामान-ए-सफ़र बाँधे हुए है
 
फेंकी न 'मुनव्वर' ने बुज़ुर्गों की निशानी
दस्तार पुरानी है मगर बाँधे हुए है

फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे - मुनव्वर राना

फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे
इज़्ज़त के साथ दुनिया से रुख़्सत करो मुझे
 
मैं ने तो तुम से की ही नहीं कोई आरज़ू
पानी ने कब कहा था कि शर्बत करो मुझे
 
कुछ भी हो मुझ को एक नई शक्ल चाहिए
दीवार पर बिछाओ मुझे छत करो मुझे
 
जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तिरे लिए
दुनिया ब-ज़िद है मुझ से कि जन्नत करो मुझे

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है - मुनव्वर राना

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है
 
यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे
यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है
 
चलो माना कि शहनाई मोहब्बत की निशानी है
मगर वो शख़्स जिसकी आ के बेटी बैठ जाती है
 
बढ़े बूढ़े कुएँ में नेकियाँ क्यों फेंक आते हैं ?
कुएँ में छुप के क्यों आख़िर ये नेकी बैठ जाती है ?
 
नक़ाब उलटे हुए गुलशन से वो जब भी गुज़रता है
समझ के फूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है
 
सियासत नफ़रतों का ज़ख्म भरने ही नहीं देती
जहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है
 
वो दुश्मन ही सही आवाज़ दे उसको मोहब्बत से
सलीक़े से बिठा कर देख हड्डी बैठ जाती है

बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना - मुनव्वर राना

बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना
आप आसान समझते हैं मुनव्वर होना
 
एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना
 
सिर्फ़ बच्चों की मोहब्बत ने क़दम रोक लिए
वर्ना आसान था मेरे लिए बे-घर होना
 
हम को मा'लूम है शोहरत की बुलंदी हम ने
क़ब्र की मिट्टी का देखा है बराबर होना
 
इस को क़िस्मत की ख़राबी ही कहा जाएगा
आप का शहर में आना मिरा बाहर होना
 
सोचता हूँ तो कहानी की तरह लगता है
रास्ते से मिरा तकना तिरा छत पर होना
 
मुझ को क़िस्मत ही पहुँचने नहीं देती वर्ना
एक ए'ज़ाज़ है उस दर का गदागर होना
 
सिर्फ़ तारीख़ बताने के लिए ज़िंदा हूँ
अब मिरा घर में भी होना है कैलेंडर होना

भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है - मुनव्वर राना

भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है
मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है
 
अगर सोने के पिंजड़े में भी रहता है तो क़ैदी है
परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है
 
चमन में घूमने फिरने के कुछ आदाब होते हैं
उधर हरगिज़ नहीं जाना उधर सय्याद रहता है
 
लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में
जिधर से भी गुज़रता हूँ मैं रस्ता याद रहता है
 
हमें भी अपने अच्छे दिन अभी तक याद हैं 'राना'
हर इक इंसान को अपना ज़माना याद रहता है

मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं - मुनव्वर राना

मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं
किसी भी सीने को खोलो तो ग़म निकलते हैं
 
हमारे जिस्म के अंदर की झील सूख गई
इसी लिए तो अब आँसू भी कम निकलते हैं
 
ये कर्बला की ज़मीं है इसे सलाम करो
यहाँ ज़मीन से पत्थर भी नम निकलते हैं
 
यही है ज़िद तो हथेली पे अपनी जान लिए
अमीर-ए-शहर से कह दो कि हम निकलते हैं
 
कहाँ हर एक को मिलते हैं चाहने वाले
नसीब वालों के गेसू में ख़म निकलते हैं
 
जहाँ से हम को गुज़रने में शर्म आती है
उसी गली से कई मोहतरम निकलते हैं
 
तुम्ही बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ
कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम निकलते हैं
 
तुम्हारे अहद-ए-हुकूमत का सानेहा ये है
कि अब तो लोग घरों से भी कम निकलते हैं

महफ़िल में आज मर्सिया-ख़्वानी ही क्यूँ न हो - मुनव्वर राना

महफ़िल में आज मर्सिया-ख़्वानी ही क्यूँ न हो
आँखों से बहने दीजिए पानी ही क्यूँ न हो
 
नश्शे का एहतिमाम से रिश्ता नहीं कोई
पैग़ाम उस का आए ज़बानी ही क्यूँ न हो
 
ऐसे ये ग़म की रात गुज़रना मुहाल है
कुछ भी सुना मुझे वो कहानी ही क्यूँ न हो
कोई भी साथ देता नहीं उम्र-भर यहाँ
कुछ दिन रहेगी साथ जवानी ही क्यूँ न हो
 
इस तिश्नगी की क़ैद से जैसे भी हो निकाल
पीने को कुछ भी चाहिए पानी ही क्यूँ न हो
 
दुनिया भी जैसे ताश के पत्तों का खेल है
जोकर के साथ रहती है रानी ही क्यूँ न हो
 
तस्वीर उस की चाहिए हर हाल में मुझे
पागल हो सर-फिरी हो दिवानी ही क्यूँ न हो
 
सोना तो यार सोना है चाहे जहाँ रहे
बीवी है फिर भी बीवी पुरानी ही क्यूँ न हो
 
अब अपने घर में रहने न देंगे किसी को हम
दिल से निकाल देंगे निशानी ही क्यूँ न हो

मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता - मुनव्वर राना

मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता
अब इस से ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता
 
दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें
रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता
 
बस तू मिरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे
फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता
 
ऐ मौत मुझे तू ने मुसीबत से निकाला
सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता
 
इस ख़ाक-ए-बदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी
क्या इतना करम बाद-ए-सबा हो नहीं सकता
 
पेशानी को सज्दे भी अता कर मिरे मौला
आँखों से तो ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता
 
दरबार में जाना मिरा दुश्वार बहुत है
जो शख़्स क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता

मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी - मुनव्वर राना

मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी
माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी
 
मौत का आना तो तय है मौत आएगी मगर
आप के आने से थोड़ी ज़िंदगी बढ़ जाएगी
 
इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप
शहर वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जाएगी
 
आप के हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जाएगा
इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जाएगी
 
बेवफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे इसे
तज़्किरा उस से न कर शर्मिंदगी बढ़ जाएगी

मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है - मुनव्वर राना

मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है
ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है
 
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है
 
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ
जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है
 
ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी
और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है
 
एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर
इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं - मुनव्वर राना

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं
 
कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं
 
नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं
 
अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं
 
किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं
 
पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं
 
जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं
 
यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं
 
हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं
 
हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं
 
सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं
 
हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं
 
गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं
 
हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ - मुनव्वर राना

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ
 
कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ
 
सोचता हूँ तो छलक उठती हैं मेरी आँखें
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊँ
 
चारागर तेरी महारथ पे यक़ीं है लेकिन
क्या ज़रूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊँ
 
बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊँ
 
शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊँ

मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ - मुनव्वर राना

मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ
मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ
 
ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है
अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ
 
मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे
मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ
 
मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा
मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ
 
बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में
अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ
 
मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में
मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो'तबर हो जाऊँ
 
बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना
सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा - मुनव्वर राना

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा
लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा
 
शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है
मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा
 
तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में
हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा
 
हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है
ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा
 
पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है
हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा
 
ये ऐसी चोट है जिस को हमेशा दुखते रहना है
ये ऐसा ज़ख़्म है जो उम्र भर अच्छा नहीं होगा

ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है - मुनव्वर राना

ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है
इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है
 
वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा
वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है
 
यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा
समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है
 
तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा
कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है
 
किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है
अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है
 
मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा
सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है
 
कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी
शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है

ये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गया - मुनव्वर राना

ये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गया
मैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया
 
माँ आज मुझ को छोड़ के गाँव चली गई
मैं आज अपने आईना-ख़ाने से कट गया
 
जोड़े की शान बढ़ गई महफ़िल महक उठी
लेकिन ये फूल अपने घराने से कट गया
 
ऐ आँसुओ तुम्हारी ज़रूरत है अब मुझे
कुछ मैल तो बदन का नहाने से कट गया
 
उस पेड़ से किसी को शिकायत न थी मगर
ये पेड़ सिर्फ़ बीच में आने से कट गया
 
वर्ना वही उजाड़ हवेली सी ज़िंदगी
तुम आ गए तो वक़्त ठिकाने से कट गया

ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं - मुनव्वर राना

ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं
सहरा में चराग़ों की दुकानें नहीं होतीं
 
ख़ुश्बू का ये झोंका अभी आया है उधर से
किस ने कहा सहरा में अज़ानें नहीं होतीं
 
क्या मरते हुए लोग ये इंसान नहीं हैं
क्या हँसते हुए फूलों में जानें नहीं होतीं
 
अब कोई ग़ज़ल-चेहरा दिखाई नहीं देता
अब शहर में अबरू की कमानें नहीं होतीं
 
इन पर किसी मौसम का असर क्यूँ नहीं होता
रद्द क्यूँ तिरी यादों की उड़ानें नहीं होतीं
 
ये शेर है छुप कर कभी हमला नहीं करता
मैदानी इलाक़ों में मचानें नहीं होतीं
 
कुछ बात थी जो लब नहीं खुलते थे हमारे
तुम समझे थे गूँगों के ज़बानें नहीं होतीं

रोने में इक ख़तरा है, तालाब नदी हो जाते हैं - मुनव्वर राना

रोने में इक ख़तरा है, तालाब नदी हो जाते हैं
हंसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़्मी हो जाते हैं
 
इस्टेसन से वापस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं
पत्ते देहाती रहते हैं, फल शहरी हो जाते हैं
 
बोझ उठाना शौक कहाँ है, मजबूरी का सौदा है
रहते-रहते इस्टेशन पर लोग कुली हो जाते हैं
 
सबसे हंसकर मिलिये-जुलिये, लेकिन इतना ध्यान रहे
सबसे हंसकर मिलने वाले, रुसवा भी हो जाते हैं
 
अपनी अना को बेच के अक्सर लुक़्म-ए-तर की चाहत में
कैसे-कैसे सच्चे शाइर दरबारी हो जाते हैं

वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है - मुनव्वर राना

वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है
रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है
 
ख़ाक आँखों से लगाई तो ये एहसास हुआ
अपनी मिट्टी से हर इक शख़्स जुड़ा होता है
 
सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है
कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है
 
मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन
मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है
 
ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही
मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है

सहरा-पसंद हो के सिमटने लगा हूँ मैं - मुनव्वर राना

सहरा-पसंद हो के सिमटने लगा हूँ मैं
अँदर से लग रहा हूँ कि बँटने लगा हूँ मैं
 
क्या फिर किसी सफ़र पे निकलना है अब मुझे
दीवारो-दर से क्यों ये लिपटने लगा हूँ मैं
 
आते हैं जैसे- जैसे बिछड़ने के दिन करीब
लगता है जैसे रेल से कटने लगा हूँ मैं
 
क्या मुझमें एहतेजाज की ताक़त नहीं रही
पीछे की सिम्त किस लिए हटने लगा हूँ मैं
 
फिर सारी उम्र चाँद ने रक्खा मेरा ख़याल
एक रोज़ कह दिया था कि घटने लगा हूँ मैं
 
उसने भी ऐतबार की चादर समेट ली
शायद ज़बान दे के पलटने लगा हूँ मैं

सहरा पे बुरा वक़्त मिरे यार पड़ा है - मुनव्वर राना

सहरा पे बुरा वक़्त मिरे यार पड़ा है
दीवाना कई रोज़ से बीमार पड़ा है
 
सब रौनक़-ए-सहरा थी इसी पगले के दम से
उजड़ा हुआ दीवाने का दरबार पड़ा है
 
आँखों से टपकती है वही वहशत-ए-सहरा
काँधे भी बताते हैं बड़ा बार पड़ा है
 
दिल में जो लहू-झील थी वो सूख चुकी है
आँखों का दो-आबा है सो बे-कार पड़ा है
 
तुम कहते थे दिन हो गए देखा नहीं उस को
लो देख लो ये आज का अख़बार पड़ा है
 
ओढ़े हुए उम्मीद की इक मैली सी चादर
दरवाज़ा-ए-बख़्शिश पे गुनहगार पड़ा है
 
ऐ ख़ाक-ए-वतन तुझ से मैं शर्मिंदा बहुत हूँ
महँगाई के मौसम में ये त्यौहार पड़ा है

सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है - मुनव्वर राना

सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है
तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है
 
ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी
जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है
 
हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता
अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है
 
ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ
बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है
 
तू मिरे साथ अगर है तो अंधेरा कैसा
रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है
 
मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा
ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है

हम कुछ ऐसे तिरे दीदार में खो जाते हैं - मुनव्वर राना

हम कुछ ऐसे तिरे दीदार में खो जाते हैं
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं
 
मुस्तक़िल जूझना यादों से बहुत मुश्किल है
रफ़्ता रफ़्ता सभी घर-बार में खो जाते हैं
 
इतना साँसों की रिफ़ाक़त पे भरोसा न करो
सब के सब मिट्टी के अम्बार में खो जाते हैं
 
मेरी ख़ुद्दारी ने एहसान किया है मुझ पर
वर्ना जो जाते हैं दरबार में खो जाते हैं
 
ढूँढने रोज़ निकलते हैं मसाइल हम को
रोज़ हम सुर्ख़ी-ए-अख़बार में खो जाते हैं
 
क्या क़यामत है कि सहराओं के रहने वाले
अपने घर के दर-ओ-दीवार में खो जाते हैं
 
कौन फिर ऐसे में तन्क़ीद करेगा तुझ पर
सब तिरे जुब्बा-ओ-दस्तार में खो जाते हैं

हर एक आवाज़ अब उर्दू को फ़रियादी बताती है - मुनव्वर राना

हर एक आवाज़ अब उर्दू को फ़रियादी बताती है
यह पगली फिर भी अब तक ख़ुद को शहज़ादी बताती है
 
कई बातें मुहब्‍बत सबको बुनियादी बताती है
जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है
 
जहाँ पिछले कई बरसों से काले नाग रहते हैं
वहाँ एक घोंसला चि‍ड़ियों का था दादी बताती है
 
अभी तक यह इलाक़ा है रवादारी के क़ब्‍ज़े में
अभी फ़िरक़ापरस्‍ती कम है आबादी बताती है
 
यहाँ वीरानियों की एक मुद्दत से हुकूमत है
यहाँ से नफ़रतें गुज़री है बरबादी बताती है
 
लहू कैसे बहाया जाय यह लीडर बताते हैं
लहू का ज़ायक़ा कैसा है यह खादी बताती है
 
ग़ुलामी ने अभी तक मुल्‍क का पीछा नहीं छोड़ा
हमें फिर क़ैद होना है ये आज़ादी बताती है
 
ग़रीबी क्‍यों हमारे शहर से बाहर नहीं जाती
अमीर-ए-शहर के घर की हर इक शादी बताती है
 
मैं उन आँखों के मयख़ाने में थोड़ी देर बैठा था
मुझे दुनिया नशे का आज तक आदी बताती है

हर एक चेहरा यहाँ पर गुलाल होता है - मुनव्वर राना

हर एक चेहरा यहाँ पर गुलाल होता है
हमारे शहर मैं पत्थर भी लाल होता है
 
मैं शोहरतों की बुलंदी पर जा नहीं सकता
जहाँ उरूज पर पहुँचो ज़वाल होता है
 
मैं अपने बच्चों को कुछ भी तो दे नहीं पाया
कभी-कभी मुझे ख़ुद भी मलाल होता है
 
यहीं से अमन की तबलीग रोज़ होती है
यहीं पे रोज़ कबूतर हलाल होता है
 
मैं अपने आप को सय्यद तो लिख नहीं सकता
अजान देने से कोई बिलाल होता है
 
पड़ोसियों की दुकानें तक नहीं खुलतीं
किसी का गाँव में जब इन्तिकाल होता है

हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते - मुनव्वर राना

हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यूँ शौक़ से मिट्टी नहीं खाते
 
तुम से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन
तुम से न मिलेंगे ये क़सम भी नहीं खाते
 
सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
 
बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद
अब जाग भी जाते हैं तो सहरी नहीं खाते
 
दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे क़लंदर
हर एक के पैसों की दवा भी नहीं खाते
 
अल्लाह ग़रीबों का मदद-गार है 'राना'
हम लोगों के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है - मुनव्वर राना

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है
इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है
 
मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं इन को काम दो
एक इमारत शहर में काफ़ी पुरानी और है
 
ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है
ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है
 
ख़ुश्क पत्ते आँख में चुभते हैं काँटों की तरह
दश्त में फिरना अलग है बाग़बानी और है
 
फिर वही उक्ताहटें होंगी बदन चौपाल में
उम्र के क़िस्से में थोड़ी सी जवानी और है
 
बस इसी एहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया
टूटे-फूटे घर में इक लड़की सियानी और है


Jane Mane Kavi (medium-bt) Hindi Kavita (medium-bt) Munawwar Rana(link)

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