मुनव्वर राना की चुनिंदा नज़्में | Munnawar Rana Ki Chuninda Nazme

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Munnawar-Rana

मुनव्वर राना की चुनिंदा नज़्में | Munnawar Rana Ki Chuninda Nazme

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ... पुराना इतवार मिला है - मुनव्वर राना

जाने क्या ढूँढने खोला था उन बंद दरवाजों को ...
 
अरसा बीत गया सुने उन धुंधली आवाजों को ...
 
यादों के सूखे बागों में जैसे
एक गुलाब खिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
कांच की एक डिब्बे में कैद ...
खरोचों वाले कुछ कंचे ...
 
कुछ आज़ाद इमली के दाने ...
इधर उधर बिखरे हुए ...
 
मटके का इक चौकोर लाल टुकड़ा ...
पड़ा बेकार मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
एक भूरी रंग की पुरानी कॉपी...
नीली लकीरों वाली ...
 
कुछ बहे हुए नीले अक्षर...
उन पुराने भूरे पन्नों में ...
 
स्टील के जंक लगे शार्पनर में पेंसिल का एक छोटा टुकड़ा ...
गिरफ्तार मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
बदन पर मिटटी लपेटे एक गेंद पड़ी है ...
 
लकड़ी का एक बल्ला भी है जो नीचे से छीला छीला है ...
 
बचपन फिर से आकर साकार मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
एक के ऊपर एक पड़े ...
माचिस के कुछ खाली डिब्बे ...
 
बुना हुआ एक फटा सफ़ेद स्वेटर ...
जो अब नीला नीला है ...
 
पीला पड़ चूका झुर्रियों वाला एक अखबार मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
गत्ते का एक चश्मा है ...
पीला प्लास्टिक वाला ...
 
चंद खाली लिफ़ाफ़े बड़ी बड़ी डाक टिकिटों वाले ...
 
उन खाली पड़े लिफाफों में भी छुपा एक इंतज़ार मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
पापा ने चार दिन रोने के बाद जो दी थी वो रुकी हुई घडी ...
 
दादा जी के डायरी से चुराई गयी वो सुखी स्याही वाला कलम मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
कई बरस बीत गए ...
 
आज यूँ महसूस हुआ रिश्तों को निभाने की दौड़ में भूल गये थे जिसे ...
 
यूँ लगा जैसे वही बिछड़ा ...
पुराना यार मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर ...
पुराना इतवार मिला है ...
 
आज उस बूढी अलमारी के अन्दर .... पुराना इतवार मिला है

शाइर - मुनव्वर राना

मैं अपनी आँखों को बेचना चाहता था
लेकिन कभी कोई ढंग का
ख़रीदार नहीं मिला
हर शख़्स आँखों के साथ
मेरे ख़्वाब भी ख़रीदना चाहता था
लेकिन ख़्वाब ख़रीदे और बेचे कहाँ जाते हैं
फिर मैं अपने अधूरे ख़्वाबों को
तकमील के उबटन के बग़ैर
कैसे किसी को दे सकता था
दुल्हन ख़रीदी और बेची कहाँ जाती है
यह तो क़साई भी नहीं कर सकता
मैं तो शाइर था

पटवारी का फ़ीता - मुनव्वर राना

बया का घोंसला
परिन्दों की वह टेकनालोजी है
जिसकी नक़्ल करके इंसानों ने
ऊँची ऊँची इमारतें तामीर कीं
लेकिन बया के बच्चे अपने लिए नया घोंसला बनाते हैं
उन्हें अपने पुरखों की हवेली से डर लगता है
वह इंसानों की तरह ज़मीन की तक़सीम का खेल नहीं खेलते
इसलिए उनके यहाँ
कोई लेखपाल या तहसीलदार नहीं होता
वह अपना फ़ैसला ख़ुद करने के लिए आज़ाद होते हैं!

स्पेयर पार्ट - मुनव्वर राना

कार ड्राइव करते हुए महसूस
हुआ कि इंजन का कोई “नट' साथ
छोड़ गया है
साथ छोड़ने वाले 'नट'
और हमसफ़र को तलाश नहीं किया जाता
बल्कि
इसका बदल तलाश किया जाता है
मैंने भी एक छोटे से कार मिस्त्री की
उम्मीदों से छोटी दुकान के किनारे
अपनी कार खड़ी कर दी
मिस्त्री पुराने नट बोल्ट से भरे डिब्बे में
मेरे लिए नट तलाश करता रहा
थोड़ी सी तलाश व जुस्तजू के बाद वह कामयाब हो गया
हमारी नेकियाँ भी आमाल के डिब्बे में ऐसे ही
पड़ी रहती हैं
और ब वक़्ते ज़रूरत
तक़दीर के इंजन को सीज़ होने से
बचा लेती हैं!

एहसास - मुनव्वर राना

कल
अचानक
बाज़ार से गुज़रते हुए
कंघियों की दुकान ने
मेरे पैर पकड़ लिये
मैं हैरान व परेशान था
कि
साठ के पेटे में पहुँचने के
क़रीब
आख़िर ऐसा क्यों हुआ
यह घुझे आखिर क्या होता जा रहा है
अब मैं उम्र बढ़ाने की दवाओं
पर औलादों से ज्यादा भरोसा
करने लगा हूँ
कंघियों की दुकान ने
आख़िर मुझे अब क्यों आवाज़ दी है
अब तो मेरे सर पर
बाल ढूँढ़ने पड़ते हैं

घर के आँगन की तरह... - मुनव्वर राना

हाथ उठाये हुए मग़मूम दुआ करते हैं
जो मसर्रत से हैं महरूम, दुआ करते हैं
टूटे बिखरे हुए मग़मूम दुआ करते हैं
तू सलामत रहे मा'सूम दुआ करते हैं
 
तेरी कोशिश से मुक़द्दर यूँ हमारा चमके
रात को जैसे फ़लक पर कोई तारा चमके
 
ख़ौफ़ो दहशत का चलन बढ़ के मिटाना है तुझे
बे घरों को भी किसी रोज़ बसाना है तुझे
आग नफ़रत की सलीक़े से बुझाना है तुझे
घर के आँगन की तरह मुल्क सजाना है तुझे
 
हाँ इसी मुल्क के सूरज की किरन है तू भी
मादरे हिन्द की बेटी है बहन है तू भी
 
तूने मज़हब की सियासत से बचाया ख़ुद को
फ़िरक़ा बन्दी की कसाफ़त से बचाया ख़ुद को
किसी ज़ालिम की हिमायत से बचाया ख़ुद को
ओछे लोगों की क़यादत से बचाया ख़ुद को
 
तूने ख़ुद्दारी का दरिया कभी रुकने न दिया
सर को ग़द्दारों के दरबार में झुकने न दिया

गुज़ारिश - मुनव्वर राना

जिस्म की बोली लगते समय वह
ज़्यादातर ख़ामोश रहती है
कोई मोल भाव
कोई तर्क वितर्क नहीं करती
एहतेजाज और शर्मिन्दगी को दूर रखती है
लेकिन वह किसी को भी अपने होंठ चूमने की इजाज़त
नहीं देती
जब कोई उसे बहुत मजबूर करता है
तो वह रोते बिलखते और हाथ जोड़ते हुए
सिर्फ़ इतना कहती है
कि
यह होंठ मैं किसी को दान कर चुकी हूँ
और बड़े लोग दान की हुई चीज़ें
कभी नहीं लेते।

कच्चा साथ - मुनव्वर राना

बातों बातों में उसने
एक दिन मुझसे कहा
मुझे तो सोना पसन्द है
तुम्हें क्या पसन्द है
मैंने हँसते हुए कहा
जागना!
अगली ही शाम वह किसी दूसरे के साथ
पार्क की उस बेंच पर बैठी थी
जहाँ
उजाला बहुत कम होता है

कल आज और कल - मुनव्वर राना

कल
शहर की एक
ख़ूबसूरत
सड़क पे
एक बैलगाड़ी
कारों के दरम्यान दौड़ती हुई
बहुत अजीब सी लग रही थी
आज मैं अपने घर में
नये ख़यालात के बच्चों में घिरा
अपने आपको
इसी बैलगाड़ी का हिस्सा
समझ रहा हूँ
कल उन बच्चों को भी
बैलगाड़ी का हिस्सा बन जाना है
लेकिन
इस बात को
वह लोग कल ही समझेंगे
क्योंकि आज समझने के लिए नहीं होता
आज...
सिर्फ़ आज होता है!

मन्सूख मोआहिदा - मुनव्वर राना

कई सदियों की बहस, हुज्जत और तक़रार के बाद
आँधी और चराग़ में यह मोआहिदा हो ही गया
दोनों एक दूसरे का ख़याल रखेंगे
जितनी देर तक यह दिया जलेगा
हवा होंठों पर उंगली रखे रहेगी
और जब हवा फूल पत्तियों से छेड़खानी
करने के लिए निकलेगी
तब दिया जलेगा नहीं
दोनों इस समझौते पर मुतमइन दिखे
लेकिन जब समझौते के काग़ज़ पर दस्तख़त करने का
वक़्त आया
तो दोनों ने इस फ़ार्मूले को कुबूल करने से
इनकार कर दिया
यह बात समझ में दोनों के आ गई
कि ज़िन्दगी, छेड़छाड़ के बगैर
और समझौतों की ज़ंजीरों में जकड़ कर
ज़िन्दगी नहीं रह जाती
बल्कि उसकी मौत हो जाती
एक झुँझलाई हुई दोपहर में
एक पुरसुकून चिड़िया
इश्क़े पेचाँ की बेल से लिपटी हुई
शाम होने का इन्तज़ार कर रही है
मेरी मा'सूम आरज़ू की तरह
बे नाम आरज़ू की तरह
जिसके इन्तज़ार के मौसमों में
कभी शाम नहीं आई
इस पुरसुकून चिड़िया को कौन समझाये
कि दोपहर और शाम के बीच
कभी समाज शुक्रिये का रूप धार लेता है
और कभी शुक्र समाज बन कर टूट पड़ता है!

मीडिया - मुनव्वर राना

अन्दर और बाहर के मौसम में कित्तना फ़र्क होता है
अखाबारात चीख़ने लगे
रेडियो और टेलीविज़न ने मुख़बिरी की रफ़्तार बढ़ा दी
फ़ोटोग्राफ़र हर दुखी मंज़र को
कैमरे में क़ैद करने लगे
सियासी गलियारों में सोग ओर जश्न का समाँ है
समाजी कार्यकर्ता
इमदाद बाँटने के नाम पर बटोर रहे हैं
आँधियों में जश्न का माहौल है
तूफ़ान ने पूरे शहर को बे दस्तो पा कर दिया
पेड़ पौधे ज़मीन का साथ छोड़ने पर मजबूर थे
लेकिन उसी होटल के एक कमरे में
दो मिलने और बिछड़ने वालों की कहानी तक
न ही अख़बार वाले पहुँचे
न ही टीवी चैनल
क्योंकि ख़बर तो मरने वालों का नसीब है
ज़िन्दा रह जाने वाले ख़बर का हिस्सा नहीं होते!

मेरे दरवाज़े पे लिख दो... - मुनव्वर राना

एक बे नाम सी चाहत के लिए आई थी
आप लोगों से मुहब्बत के लिए आई थी
मैं बड़े बूढ़ों की ख़िदमत के लिए आई थी
कौन कहता है हुकूमत के लिए आई थी
 
शजर-ओ-रंगो गुलो बू नहीं देखा जाता
शक की नज़रों से बहू को नहीं देखा जाता
 
रुख़्सती होते ही माँ बाप का घर भूल गई
भाई के चेहरों को बहनों की नज़र भूल गई
घर को जाती हुई हर राह गुज़र भूल गई
मैं वह चिड़िया हूँ कि जो अपना शजर भूल गई
 
मैं तो जिस देस में आयी थी वही याद रहा
हो के बेवा भी मुझे सिर्फ़ 'पती' याद रहा
 
नफ़रतों ने मेरे चेहरे से उजाला छीना
जो मेरे पास था इक चाहने वाला, छीना
सर से बच्चों के मेरे बाप का साया छीना
मुझसे गिरजा भी लिया मेरा शिवाला छीना
 
अब यह तक़दीर तो बदली भी नहीं जा सकती
मैं वह बेवा हूँ जो इटली भी नहीं जा सकती 

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