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मुनव्वर राना की चुनिंदा ग़ज़लें | Munnawar Rana Ki Chuninda Ghazle (Part 1)

Hindi Kavita
हिंदी कविता

Munnawar-Rana 
 

मुनव्वर राना  की चुनिंदा ग़ज़लें | Munnawar Rana Ki Chuninda Ghazle (Part 1)

अच्छा हुआ कि मेरा नशा भी उतर गया - मुनव्वर राना

अच्छा हुआ कि मेरा नशा भी उतर गया
तेरी कलाई से ये कड़ा भी उतर गया
 
वो मुतमइन बहुत है मिरा साथ छोड़ कर
मैं भी हूँ ख़ुश कि क़र्ज़ मिरा भी उतर गया
 
रुख़्सत का वक़्त है यूँही चेहरा खिला रहे
मैं टूट जाऊँगा जो ज़रा भी उतर गया
 
बेकस की आरज़ू में परेशाँ है ज़िंदगी
अब तो फ़सील-ए-जाँ से दिया भी उतर गया
 
रो-धो के वो भी हो गया ख़ामोश एक रोज़
दो-चार दिन में रंग-ए-हिना भी उतर गया
 
पानी में वो कशिश है कि अल्लाह की पनाह
रस्सी का हाथ थामे घड़ा भी उतर गया
 
वो मुफ़्लिसी के दिन भी गुज़ारे हैं मैं ने जब
चूल्हे से ख़ाली हाथ तवा भी उतर गया
 
सच बोलने में नश्शा कई बोतलों का था
बस ये हुआ कि मेरा गला भी उतर गया
 
पहले भी बे-लिबास थे इतने मगर न थे
अब जिस्म से लिबास-ए-हया भी उतर गया

अच्छी से अच्छी आब-ओ-हवा के बग़ैर भी - मुनव्वर राना

अच्छी से अच्छी आब-ओ-हवा के बग़ैर भी
ज़िंदा हैं कितने लोग दवा के बग़ैर भी
 
साँसों का कारोबार बदन की ज़रूरतें
सब कुछ तो चल रहा है दुआ के बग़ैर भी
 
बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग
इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी
 
अब ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं रहा
मरने लगे हैं लोग क़ज़ा के बग़ैर भी
 
हम बे-क़ुसूर लोग भी दिलचस्प लोग हैं
शर्मिंदा हो रहे हैं ख़ता के बग़ैर भी
 
चारागरी बताए अगर कुछ इलाज है
दिल टूटने लगे हैं सदा के बग़ैर भी

अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई - मुनव्वर राना

अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई
अजीब मैना है शिकरों में आ के बैठ गई
 
जगा रहा है ज़माना मगर नहीं खुलतीं
कहाँ की नींद इन आँखों में आ के बैठ गई
 
वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी
बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई
 
तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं
तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई
 
तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही
कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई
 
नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की
हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई
 
उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें
चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई
 
चली थी देखने सूरज की बद-मिज़ाजी को
मगर ये ओस भी फूलों में आ के बैठ गई
 
तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही
उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई

अलमारी से ख़त उस के पुराने निकल आए - मुनव्वर राना

अलमारी से ख़त उस के पुराने निकल आए
फिर से मिरे चेहरे पे ये दाने निकल आए
 
माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मिरा रस्ता
मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए
 
मुमकिन है हमें गाँव भी पहचान न पाए
बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए
 
ऐ रेत के ज़र्रे तिरा एहसान बहुत है
आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए
 
अब तेरे बुलाने से भी हम आ नहीं सकते
हम तुझ से बहुत आगे ज़माने निकल आए
 
एक ख़ौफ़ सा रहता है मिरे दिल में हमेशा
किस घर से तिरी याद न जाने निकल आए

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए - मुनव्वर राना

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए
 
आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए
 
ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए
 
ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें
टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए
 
अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया - मुनव्वर राना

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया
 
आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी
सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया
 
फिर भी न दूर हो सकी आँखों से बेवगी
मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया
 
दुनिया क्या ख़बर इसे कहते हैं शायरी
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया
 
अंदर की टूट -फूट छिपाने के वास्ते
जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया
 
घर की ज़रूरतों के लिए अपनी उम्र को
बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया
 
पिछला निशान जलने का मौजूद था तो फिर
क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया

इतनी तवील उम्र को जल्दी से काटना - मुनव्वर राना

इतनी तवील उम्र को जल्दी से काटना
जैसे दवा की पन्नी को कैंची से काटना
 
छत्ते से छेड़छाड़ की आदत मुझे भी है
सीखा है मैंने शहद की मक्खी से काटना
 
इन्सान क़त्ल करने के जैसा तो ये भी है
अच्छे-भले शजरको कुल्हाड़ी से काटना
 
पानी का जाल बुनता है दरिया तो फिर बुने
तैराक जानता है हथेली से काटना
 
रहता है दिन में रात के होने का इंतज़ार
फिर रात को दवाओं की गोली से काटना
 
ये फ़न कोई फ़क़ीर सिखाएगा आपको
हीरे को एक फूल की पत्ती से काटना
 
मुमकिनहै मैं दिखाई पड़ूँ एक दिन तुम्हें
यादों का जाल ऊन की तीली से काटना
 
इक उम्र तक बज़ुर्गों के पैरों मे बैठकर
पत्थर को मैंने सीखा है पानी से काटना 

इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये - मुनव्वर राना

इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये
 
आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिये
 
ऐरे गैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आपको औरत नहीं अखबार होना चाहिये
 
जिंदगी कब तलक दर दर फिरायेगी हमें
टूटा फूटा ही सही घर बार होना चाहिये
 
अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दें मुझे
इश्क के हिस्से में भी इतवार होना चाहिये

ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे - मुनव्वर राना

ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे
मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे
 
मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत
कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे
 
एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया
इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे
 
कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी
कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे
 
मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है
मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे

कई घरों को निगलने के बाद आती है - मुनव्वर राना

कई घरों को निगलने के बाद आती है
मदद भी शहर के जलने के बाद आती है
 
न जाने कैसी महक आ रही है बस्ती में
वही जो दूध उबलने के बाद आती है
 
नदी पहाड़ों से मैदान में तो आती है
मगर ये बर्फ़ पिघलने के बाद आती है
 
वो नींद जो तेरी पलकों के ख़्वाब बुनती है
यहाँ तो धूप निकलने के बाद आती है
 
ये झुग्गियाँ तो ग़रीबों की ख़ानक़ाहें हैं
कलन्दरी यहाँ पलने के बाद आती है
 
गुलाब ऎसे ही थोड़े गुलाब होता है
ये बात काँटों पे चलने के बाद आती है
 
शिकायतें तो हमें मौसम-ए-बहार से है
खिज़ाँ तो फूलने-फलने के बाद आती है

कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा - मुनव्वर राना

कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा
तुम्हारे बा'द किसी की तरफ़ नहीं देखा
 
ये सोच कर कि तिरा इंतिज़ार लाज़िम है
तमाम-उम्र घड़ी की तरफ़ नहीं देखा
 
यहाँ तो जो भी है आब-ए-रवाँ का आशिक़ है
किसी ने ख़ुश्क नदी की तरफ़ नहीं देखा
 
वो जिस के वास्ते परदेस जा रहा हूँ मैं
बिछड़ते वक़्त उसी की तरफ़ नहीं देखा
 
न रोक ले हमें रोता हुआ कोई चेहरा
चले तो मुड़ के गली की तरफ़ नहीं देखा
 
बिछड़ते वक़्त बहुत मुतमइन थे हम दोनों
किसी ने मुड़ के किसी की तरफ़ नहीं देखा
 
रविश बुज़ुर्गों की शामिल है मेरी घुट्टी में
ज़रूरतन भी सखी की तरफ़ नहीं देखा

काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले - मुनव्वर राना

काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले
इक ज़रा देर को कमरे में अँधेरा कर ले
 
अब मुझे पार उतर जाने दे ऐसा कर ले
वर्ना जो आए समझ में तिरी दरिया कर ले
 
ख़ुद-ब-ख़ुद रास्ता दे देगा ये तूफ़ान मुझे
तुझ को पाने का अगर दिल ये इरादा कर ले
 
आज का काम तुझे आज ही करना होगा
कल जो करना है तो फिर आज तक़ाज़ा कर ले
 
अब बड़े लोगों से अच्छाई की उम्मीद न कर
कैसे मुमकिन है करैला कोई मीठा कर ले
 
गर कभी रोना ही पड़ जाए तो इतना रोना
आ के बरसात तिरे सामने तौबा कर ले
 
मुद्दतों बा'द वो आएगा हमारे घर में
फिर से ऐ दिल किसी उम्मीद को ज़िंदा कर ले
 
हम-सफ़र लैला भी होगी मैं तभी जाऊँगा
मुझ पे जितने भी सितम करने हों सहरा कर ले

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई - मुनव्वर राना

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई
 
यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया
मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई
 
अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता
बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई
 
किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद
उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई
 
मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी
तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई
 
क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता
ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई
 
घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं
उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई
 
कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती
इधर पहुँची उधर पहुँची यहाँ आई वहाँ आई

किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ - मुनव्वर राना

किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ
मैं इस सुरंग से निकलूँ तू आब-जू हो जाऊँ
 
बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर
मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ
 
मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या
वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ
 
किसी तरह भी ये वीरानियाँ हों ख़त्म मिरी
शराब-ख़ाने के अंदर की हाव-हू जाऊँ
 
मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा
कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ
 
कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए
अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ
 
नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता
पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ

ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना - मुनव्वर राना

ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना
मगर फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वो आप का गुलनार हो जाना
 
किसी दिन मेरी रुस्वाई का ये कारन न बन जाए
तुम्हारा शहर से जाना मिरा बीमार हो जाना
 
वो अपना जिस्म सारा सौंप देना मेरी आँखों को
मिरी पढ़ने की कोशिश आप का अख़बार हो जाना
 
कभी जब आँधियाँ चलती हैं हम को याद आता है
हवा का तेज़ चलना आप का दीवार हो जाना
 
बहुत दुश्वार है मेरे लिए उस का तसव्वुर भी
बहुत आसान है उस के लिए दुश्वार हो जाना
 
किसी की याद आती है तो ये भी याद आता है
कहीं चलने की ज़िद करना मिरा तय्यार हो जाना
 
कहानी का ये हिस्सा अब भी कोई ख़्वाब लगता है
तिरा सर पर बिठा लेना मिरा दस्तार हो जाना
 
मोहब्बत इक न इक दिन ये हुनर तुम को सिखा देगी
बग़ावत पर उतरना और ख़ुद-मुख़्तार हो जाना
 
नज़र नीची किए उस का गुज़रना पास से मेरे
ज़रा सी देर रुकना फिर सबा-रफ़्तार हो जाना

ख़ुद अपने ही हाथों का लिखा काट रहा हूँ - मुनव्वर राना

ख़ुद अपने ही हाथों का लिखा काट रहा हूँ
ले देख ले दुनिया मैं पता काट रहा हूँ
 
ये बात मुझे देर से मा'लूम हुई है
ज़िंदाँ है ये दुनिया मैं सज़ा काट रहा हूँ
 
दुनिया मिरे सज्दे को इबादत न समझना
पेशानी पे क़िस्मत का लिखा काट रहा हूँ
 
अब आप की मर्ज़ी है इसे जो भी समझिए
लेकिन मैं इशारे से हवा काट रहा हूँ
 
तू ने जो सज़ा दी थी जवानी के दिनों में
मैं उम्र की चौखट पे खड़ा काट रहा हूँ

ख़ून रुलवाएगी ये जंगल-परस्ती एक दिन - मुनव्वर राना

ख़ून रुलवाएगी ये जंगल-परस्ती एक दिन
सब चले जाएँगे ख़ाली कर के बस्ती एक दिन
 
चूसता रहता है रस भौंरा अभी तक देख लो
फूल ने भूले से की थी सरपरस्ती एक दिन
 
देने वाले ने तबीअ'त क्या अजब दी है उसे
एक दिन ख़ाना-बदोशी घर-गृहस्ती एक दिन
 
कैसे कैसे लोग दस्तारों के मालिक हो गए
बिक रही थी शहर में थोड़ी सी सस्ती एक दिन
 
तुम को ऐ वीरानियों शायद नहीं मा'लूम है
हम बनाएँगे इसी सहरा को बस्ती एक दिन
 
रोज़-ओ-शब हम को भी समझाती है मिट्टी क़ब्र की
ख़ाक में मिल जाएगी तेरी भी हस्ती एक दिन

गले मिलने को आपस में दुआएँ रोज़ आती हैं - मुनव्वर राना

गले मिलने को आपस में दुआएँ रोज़ आती हैं
अभी मस्ज़िद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
 
अभी रोशन हैं चाहत के दीये हम सबकी आँखों में
बुझाने के लिये पागल हवाएँ रोज़ आती हैं
 
कोई मरता नहीं है, हाँ मगर सब टूट जाते हैं
हमारे शहर में ऎसी वबाएँरोज़ आती हैं
 
अभी दुनिया की चाहत ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा
अभी मुझको बुलाने दाश्ताएँरोज़ आती हैं
 
ये सच है नफ़रतों की आग ने सब कुछ जला डाला
मगर उम्मीद की ठंडी हवाएँ रोज़ आती हैं

घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं - मुनव्वर राना

घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं
लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं
 
उड़ के इक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं
घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं
 
सहमी सहमी हुई रहती हैं मकान-ए-दिल में
आरज़ूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं
 
टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में
कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं
 
आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र
मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं

चले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम ने - मुनव्वर राना

चले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम ने
बढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने
 
पड़ा रहने दो अपने बोरिए पर हम फ़क़ीरों को
फटी रह जाएँगी आँखें जो मुट्ठी खोल दी हम ने
 
कहाँ तक बोझ बैसाखी का सारी ज़िंदगी ढोते
उतरते ही कुएँ में आज रस्सी खोल दी हम ने
 
फ़रिश्तो तुम कहाँ तक नामा-ए-आमाल देखोगे
चलो ये नेकियाँ गिन लो कि गठरी खोल दी हम ने
 
तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता
तुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हम ने
 
पुराने हो चले थे ज़ख़्म सारे आरज़ूओं के
कहो चारागरों से आज पट्टी खोल दी हम ने
 
तुम्हारे दुख उठाए इस लिए फिरते हैं मुद्दत से
तुम्हारे नाम आई थी जो चिट्ठी खोल दी हम ने

छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है - मुनव्वर राना

छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है
अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है
 
आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली
सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है
 
शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो
चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है
 
वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना
आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
 
रोज़ मैं अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूँ
रोज़ उंगली मेरी तेज़ाब में आ जाती है
 
दिल की गलियों से तेरी याद निकलती ही नहीं
सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है
 
रात भर जागते रहने का सिला है शायद
तेरी तस्वीर-सी महताब में आ जाती है
 
एक कमरे में बसर करता है सारा कुनबा
सारी दुनिया दिले- बेताब में आ जाती है
 
ज़िन्दगी तू भी भिखारिन की रिदा ओढ़े हुए
कूचा - ए - रेशमो -किमख़्वाब में आ जाती है
 
दुख किसी का हो छलक उठती हैं मेरी आँखें
सारी मिट्टी मिरे तालाब में आ जाती है

जहां तक हो सका हमने तुम्हें परदा कराया है - मुनव्वर राना

जहां तक हो सका हमने तुम्हें परदा कराया है
मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है
 
चमक यूं ही नहीं आती है खुद्दारी के चेहरे पर
अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है
 
बड़ी मुद्दत पे खायी हैं खुशी से गालियाँ हमने
बड़ी मुद्दत पे उसने आज मुंह मीठा कराया है
 
बिछड़ना उसकी ख्वाहिश थी न मेरी आरजू लेकिन
जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है
 
कहीं परदेस की रंगीनियों में खो नहीं जाना
किसी ने घर से चलते वक्त ये वादा कराया है
 
खुदा महफूज रखे मेरे बच्चों को सियासत से
ये वो औरत है जिसने उम्र भर पेशा कराया है

जुदा रहता हूँ मैं तुझ से तो दिल बे-ताब रहता है - मुनव्वर राना

जुदा रहता हूँ मैं तुझ से तो दिल बे-ताब रहता है
चमन से दूर रह के फूल कब शादाब रहता है
 
अँधेरे और उजाले की कहानी सिर्फ़ इतनी है
जहाँ महबूब रहता है वहीं महताब रहता है
 
मुक़द्दर में लिखा कर लाए हैं हम बोरिया लेकिन
तसव्वुर में हमेशा रेशम-ओ-कम-ख़्वाब रहता है
 
हज़ारों बस्तियाँ आ जाएँगी तूफ़ान की ज़द में
मिरी आँखों में अब आँसू नहीं सैलाब रहता है
 
भले लगते हैं स्कूलों की यूनिफार्म में बच्चे
कँवल के फूल से जैसे भरा तालाब रहता है
 
ये बाज़ार-ए-हवस है तुम यहाँ कैसे चले आए
ये सोने की दुकानें हैं यहाँ तेज़ाब रहता है
 
हमारी हर परेशानी इन्ही लोगों के दम से है
हमारे साथ ये जो हल्क़ा-ए-अहबाब रहता है
 
बड़ी मुश्किल से आते हैं समझ में लखनऊ वाले
दिलों में फ़ासले लब पर मगर आदाब रहता है

तुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती है - मुनव्वर राना

तुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती है
ख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है
 
हमीं अकेले नहीं जागते हैं रातों में
उसे भी नींद बड़ी मुश्किलों से आती है
 
हमारी आँखों को मैला तो कर दिया है मगर
मोहब्बतों में चमक आँसुओं से आती है
 
इसी लिए तो अँधेरे हसीन लगते हैं
कि रात मिल के तिरे गेसुओं से आती है
 
ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया मोहब्बत ने
कि तेरी याद भी अब कोशिशों से आती है

थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए - मुनव्वर राना

थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए
हम अपनी क़ब्र-ए-मुक़र्रर में जा के लेट गए
 
तमाम उम्र हम इक दूसरे से लड़ते रहे
मगर मरे तो बराबर में जा के लेट गए
 
हमारी तिश्ना-नसीबी का हाल मत पूछो
वो प्यास थी कि समुंदर में जा के लेट गए
 
न जाने कैसी थकन थी कभी नहीं उतरी
चले जो घर से तो दफ़्तर में जा के लेट गए
 
ये बेवक़ूफ़ उन्हें मौत से डराते हैं
जो ख़ुद ही साया-ए-ख़ंजर में जा के लेट गए
 
तमाम उम्र जो निकले न थे हवेली से
वो एक गुम्बद-ए-बे-दर में जा के लेट गए
 
सजाए फिरते थे झूटी अना जो चेहरों पर
वो लोग क़स्र-ए-सिकंदर में जा के लेट गए
 
सज़ा हमारी भी काटी है बाल-बच्चों ने
कि हम उदास हुए घर में जा के लेट गए

थकी-मांदी हुई बेचारियाँ आराम करती हैं - मुनव्वर राना

थकी-मांदी हुई बेचारियाँ आराम करती हैं
न छेड़ो ज़ख़्म को बीमारियाँ आराम करती हैं
 
सुलाकर अपने बच्चे को यही हर माँ समझती है
कि उसकी गोद में किलकारियाँ आराम करती हैं
 
किसी दिन ऎ समुन्दर झांक मेरे दिल के सहरा में
न जाने कितनी ही तहदारियाँ आराम करती हैं
 
अभी तक दिल में रोशन हैं तुम्हारी याद के जुगनू
अभी इस राख में चिन्गारियाँ आराम करती हैं
 
कहां रंगों की आमेज़िश की ज़हमत आप करते हैं
लहू से खेलिये पिचकारियाँ आराम करती हैं

दरिया-दिली से अब्र-ए-करम भी नहीं मिला - मुनव्वर राना

दरिया-दिली से अब्र-ए-करम भी नहीं मिला
लेकिन मुझे नसीब से कम भी नहीं मिला
 
फिर उँगलियों को ख़ूँ में डुबोना पड़ा हमें
जब हम को माँगने पे क़लम भी नहीं मिला
 
सच बोलने की राह में तन्हा हमीं मिले
इस रास्ते में शैख़-ए-हरम भी नहीं मिला
 
मैं ने तो सारी उम्र निभाई है दोस्ती
वो मुझ से खा के मेरी क़सम भी नहीं मिला
 
दिल को ख़ुशी भी हद से ज़ियादा नहीं मिली
कासे के ए'तिबार से ग़म भी नहीं मिला

दुनिया तिरी रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ - मुनव्वर राना

दुनिया तिरी रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ
तू चाँद मुझे कहती थी मैं डूब रहा हूँ
 
अब कोई शनासा भी दिखाई नहीं देता
बरसों मैं इसी शहर का महबूब रहा हूँ
 
मैं ख़्वाब नहीं आप की आँखों की तरह था
मैं आप का लहजा नहीं उस्लूब रहा हूँ
 
रुस्वाई मिरे नाम से मंसूब रही है
मैं ख़ुद कहाँ रुस्वाई से मंसूब रहा हूँ
 
सच्चाई तो ये है कि तिरे क़र्या-ए-दिल में
इक वो भी ज़माना था कि मैं ख़ूब रहा हूँ
 
उस शहर के पत्थर भी गवाही मिरी देंगे
सहरा भी बता देगा कि मज्ज़ूब रहा हूँ
 
दुनिया मुझे साहिल से खड़ी देख रही है
मैं एक जज़ीरे की तरह डूब रहा हूँ
 
शोहरत मुझे मिलती है तो चुप-चाप खड़ी रह
रुस्वाई मैं तुझ से भी तो मंसूब रहा हूँ
 
फेंक आए थे मुझ को भी मिरे भाई कुएँ में
मैं सब्र में भी हज़रत-ए-अय्यूब रहा हूँ

दोहरा रहा हूँ बात पुरानी कही हुई - मुनव्वर राना

दोहरा रहा हूँ बात पुरानी कही हुई
तस्वीर तेरे घर में थी मेरी लगी हुई
 
इन बद-नसीब आँखों ने देखी है बार बार
दीवार में ग़रीब की ख़्वाहिश चुनी हुई
 
ताज़ा ग़ज़ल ज़रूरी है महफ़िल के वास्ते
सुनता नहीं है कोई दोबारा सुनी हुई
 
मुद्दत से कोई दूसरा रहता है हम नहीं
दरवाज़े पर हमारी है तख़्ती लगी हुई
 
जब तक है डोर हाथ में तब तक का खेल है
देखी तो होंगी तुम ने पतंगें कटी हुई
 
जिस की जुदाई ने मुझे शाइर बना दिया
पढ़ता हूँ मैं ग़ज़ल भी उसी की लिखी हुई
 
लगता है जैसे घर में नहीं हूँ मैं क़ैद हूँ
मिलती हैं रोटियाँ भी जहाँ पर गिनी हुई
 
साँसों के आने जाने पे चलता है कारोबार
छूता नहीं है कोई भी हाँडी जली हुई
 
ये ज़ख़्म का निशान है जाएगा देर से
छुटती नहीं है जल्दी से मेहंदी लगी हुई

 
Jane Mane Kavi (medium-bt) Hindi Kavita (medium-bt) Munawwar Rana(link)

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