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यशोधरा -मैथिलीशरण गुप्त Yashodhara -Maithilisharan Gupt

मैथिलीशरण गुप्त यशोधरा
Maithilisharan Gupt Yashodhara

मंगलाचरण-मैथिलीशरण गुप्त

राम, तुम्हारे इसी धाम में
नाम-रूप-गुण-लीला-लाभ,
इसी देश में हमें जन्म दो,
लो, प्रणाम हे नीरजनाभ ।
धन्य हमारा भूमि-भार भी,
जिससे तुम अवतार धरो,
भुक्ति-मुक्ति माँगें क्या तुमसे,
हमें भक्ति दो, ओ अमिताभ !

सिद्धार्थ 

1

घूम रहा है कैसा चक्र !
वह नवनीत कहां जाता है, रह जाता है तक्र ।

पिसो, पड़े हो इसमें जब तक,
क्या अन्तर आया है अब तक ?
सहें अन्ततोगत्वा कब तक-
हम इसकी गति वक्र ?
घूम रहा है कैसा चक्र !

कैसे परित्राण हम पावें ?
किन देवों को रोवें-गावें ?
पहले अपना कुशल मनावें
वे सारे सुर-शक्र !
घूम रहा है कैसा चक्र !

बाहर से क्या जोड़ूँ-जाड़ूँ ?
मैं अपना ही पल्ला झाड़ूँ ।
तब है, जब वे दाँत उखाड़ूँ,
रह भवसागर-नक्र !
घूम रहा है कैसा चक्र !
Yashodhara-Maithilisharan-Gupt
2
देखी मैंने आज जरा !
हो जावेगी क्या ऐसी ही मेरी यशोधरा?

हाय ! मिलेगा मिट्टी में यह वर्ण-सुवर्ण खरा?
सूख जायगा मेरा उपवन, जो है आज हरा?

सौ-सौ रोग खड़े हों सन्मुख, पशु ज्यों बाँध परा,
धिक्! जो मेरे रहते, मेरा चेतन जाय चरा!

रिक्त मात्र है क्या सब भीतर, बाहर भरा-भरा?
कुछ न किया, यह सूना भव भी यदि मैंने न तरा ।
3
मरने को जग जीता है !
रिसता है जो रन्ध्र-पूर्ण घट,
भरा हुआ भी रीता है ।

यह भी पता नहीं, कब, किसका
समय कहाँ आ बीता है ?
विष का ही परिणाम निकलता,
कोई रस क्या पीता है ?

कहाँ चला जाता है चेतन,
जो मेरा मनचीता है?
खोजूंगा मैं उसको, जिसके
बिना यहाँ सब तीता है ।

भुवन-भावने, आ पहुंचा मैं,
अब क्यों तू यों भीता है ?
अपने से पहले अपनों की
सुगति गौतमी गीता है ।
4
कपिलभूमि-भागी, क्या तेरा
यही परम पुरुषार्थ हाय !
खाय-पिये, बस जिये-मरे तू,
यों ही फिर फिर आय-जाय ?
अरे योग के अधिकारी, कह,
यही तुझे क्या योग्य हाय !
भोग-भोग कर मरे रोग में,
बस वियोग ही हाथ आय ?

सोच हिमालय के अधिवासी,
यह लज्जा की बात हाय !
अपने आप तपे तापों से
तू न तनिक भी शान्ति पाय ?

बोल युवक, क्या इसी लिए है
यह यौवन अनमोल हाय !
आकर इसके दाँत तोड़ दे,
जरा भंग कर अंग-काय ?

बता जीव, क्या इसीलिए है
यह जीवन का फूल हाय !
पक्का और कच्चा फल इसका
तोड़-तोड़ कर काल खाय ?
एक बार तो किसी जन्म के
साथ मरण अनिवार हाय !
बार-बार धिक्कार, किन्तु यदि
रहे मृत्यु का शेष दाय !

अमृतपुत्र, उठ, कुछ उपाय कर,
चल, चुप हार न बैठ हाय !
खोज रहा है क्या सहाय तू?
मेट आप ही अन्तराय ।
5
पड़ी रह तू मेरी भव-भुक्ति
मुक्ति हेतु जाता हूँ यह मैं, मुक्ति, मुक्ति, बस मुक्ति !
मेरा मानस-हंस सुनेगा और कौन सी युक्ति हैं
मुक्ताफल निर्द्वन्द चुनेगा, चुन ले कोई शुक्ति ।

महाभिनिष्क्रमण -मैथिलीशरण गुप्त

आज्ञा लूँ या दूं मैं अकाम?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

रख अब अपना यह स्वप्न-जाल,
निष्फल मेरे ऊपर न डाल ।
मैं जागरुक हूं, ले संभाल-
निज राज-पाट, धन, धरणि, धाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !
रहने दे वैभव यश:शोभ,
जब हमीं नहीं, क्या कीर्तिलोभ?
तू क्षम्य, करूं क्यों हाय क्षोभ,
थम, थम अपने को आप थाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

क्या भाग रहा हूँ भार देख ?
तू मेरी और नेहार देख !
मैं त्याग चला निस्सार देख,
अटकेगा मेरा कौन काम ?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

रूपाश्रय तेरा तरुण गात्र,
कह, वह कब तक है प्राण-पात्र?
भीतर भीषण कंकाल मात्र,
बाहर बाहर है टीम-टाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

प्रच्छन्न रोग हैं, प्रकट भोग
संयोग मात्र भावी वियोग !
हा लोभ-मोह में लीन लोग,
भूले हैं अपना अपरिणाम !
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

यह आर्द्र-शुष्क, यह उष्ण शीत,
यह वर्तमान, यह तू व्यतीत है !
तेरा भविष्य क्या मृत्यु-भीत ?
पाया क्या तूने घूम-घाम ?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

मैं सूंघ चुका वे फुल्ल-फूल,
झड़ने को हैं सब झटित झूल ।
चख देख चुका हूं मैं, समूल-
सड़ने को हैं वे अखिल आम !
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

सुन-सुन कर, छू-धू कर अशेष,
मैं निरख चुका हूँ निर्निमेष,
यदि राग नहीं, तो हाय ! द्वेष,
चिर-निद्रा की सब झूम-झाम !
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !
उन विषयों में परितृप्त? हाय !
करते है हम उल्टे उपाय ।
खुजलाऊँ मैं क्या बैठ काय ?
हो जाय और भी प्रबल पाम?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

सब दे कर भी क्या आज दीन,
अपने या तेरे निकट हीन?
मैं हूँ अब अपने ही अधीन,
पर मेरा श्रम है अविश्राम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

इस मध्य निशा में ओ अभाग,
तुझको तेरे ही अर्थ त्याग,
जाता हूँ मैं यह वीतराग ।
दयनीय, ठहर तू क्षीण-क्षाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

तू दे सकता था विपुल वित्त,
पर भूलें उसमें भ्रान्त चित्त ।
जाने दे चिर जीवन निमित्त,
दूं क्या मैं तुझको हाड़-चाम?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

रह काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह,
लेता हूँ मैं कुछ और टोह ।
कब तक देखूँ चुपचाप ओह !
आने-जाने की धूमधाम?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

हे ओक, न कर तू रोक-टोक,
पथ देख रहा है आर्त्त लोक,
मेटूं मैं उसका दुख-शोक,
बस, लक्ष्य यही मेरा ललाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

मैं त्रिविध-दु:ख-विनिवृत्ति हेतु
बाँधूं अपना पुरुषार्थ-सेतु,
सर्वत्र उड़े कल्याण-केतु,
तब है मेरा सिद्धार्थ नाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

वह कर्म-काण्ड-तांडव-विकास,
वेदी पर हिंसा-हास-रास,
लोलुप-रसना का लोल-लास,
तुम देखो ॠग्, यजु और साम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !
आ मित्र-चक्षु के दृष्टि-लाभ,
ला, हृदय-विजय-रस-वृष्टि-लाभ ।
पा, हे स्वराज्य, बढ़ सृष्टि-लाभ
जा दण्ड-भेद, जा साम-दाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

तब जन्मभूमि, तेरा महत्त्व,
जब मैं ले आऊँ अमर-तत्त्व ।
यदि पा न सके तू सत्य-सत्व,
तो सत्य कहां? भ्रम और भ्राम !
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

हे पूज्य पिता, माता, महान्,
क्या माँगूँ तुमसे क्षमा दान ?
क्रन्दन क्यों ? गायो भद्र-गान,
उत्सव हो पुर-पुर, ग्राम-ग्राम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

हे मेरे प्रतिभू, तात नन्द,
पाऊँ यदि मैं आनन्द-कन्द
तो क्यों न उसे खाऊँ अमन्द?
तू तो है मेरे ठौर-ठाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

अयि गोपे, तेरी गोद पूर्ण,
तू हास-विलास-विनोद पूर्ण !
अब गौतम भी हो मोद पूर्ण,
क्या अपना विधि है आज वाम?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

क्या तुझे जगाऊँ एक बार?
पर है अब भी अप्राप्त सार,
सो, अभी स्वप्न ही तू निहार,
हे शुभे, श्वेत के साथ श्याम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

राहुल, मेरे ॠण-मोक्ष, माप !
लाऊँ मैं जब तक अमृत आप,
माँ ही तेरी माँ और बाप,
दुल, मातृ-हृदय के मृदुल दाम !
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !
यह घन तम, सन-सन पवन जाल,
भन-भन करता यह काल-व्याल,
मूर्च्छित विषाक्त वसुधा विशाल !
भय, कह, किस पर यह भूरिभाम?
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

छन्दक, उठ, ला निज वाजिराज,
तज भय-विस्मय, सज शीघ्र साज ।
सुन, मृत्यु-विजय-अभियान आज !
मेरा प्रभात यह रात्रि-याम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

वह जन्म-मरण का भ्रमण-भाण,
में देख चुका हूँ अपरिमाण ।
निर्वाण-हेतु मेरा प्रयाण,
क्या वात-वृष्टि, क्या शीत-घाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

हे राम, तुम्हारा वंशजात,
सिद्धार्थ, तुम्हारी भांति, तात,
घर छोड़ चला यह आज रात,
आशीष उसे दो, लो प्रणाम ।
ओ क्षणभंगुर भव, राम राम !

यशोधरा-मैथिलीशरण गुप्त

1
नाथ, कहाँ जाते हो?
अब भी यह अन्धकार छाया है।
हा ! जग कर क्या पाया,
मैंने वह स्वप्न भी गंवाया है!
2
सखि, वे कहाँ गये हैं?
मेरा बायाँ नयन फड़कता है।
पर मैं कैसे मानूँ?
देख; यहाँ यह हृदय धड़कता है।
3
आली वही बात हुई, भय जिसका था मुझे,
मानती हूँ उनको गहन-वन-गामी मैं,
ध्यान-मग्न देख उन्हें एक दिन मैंने कहा-
'क्यों जी, प्राणवल्लभ कहूँ या तुम्हें स्वामी मैं?'
चौंक, कुछ लज्जित से, बोले हंस आर्यपुत्र-
'योगेश्वर क्यों न होऊँ, गोपेश्वर नामी मैं !
किन्तु चिंता छोड़ो, किसी अन्य का विचार करूं
तो हूं जार पीछे, प्रिये! पहले हूँ कामी मैं !
4
कह आली, क्या फल है
अब तेरी उस अमूल्य सज्जा का?
मूल्य नहीं क्या कुछ भी
मेरी इस नग्न लज्जा का !
5
सिद्धि-हेतु स्वामी गये, यह गौरव की बात,
पर चोरी-चोरी गये, यही बड़ा व्याघात ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -
क्षात्र-धर्म के नाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते ?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
6
प्रियतम ! तुम श्रुति-पथ से आये ।
तुमहें हदय में रख कर मैंने अधर-कपाट लगाये ।

मेरे हास-विलास ! किन्तु क्या भाग्य तुम्हें रख पाये ?
दृष्टि मार्ग से निकल गये ये तुम रसमय मनभाये ।
प्रियतम ! तुम श्रुति-पथ से आये ।

यशोधरा क्या कहे और अब, रहो कहीं भी छाये,
मेरे ये नि:श्वास व्यर्थ, यदि तुमको खींच न लाये।
प्रियतम ! तुम श्रुति-पथ से आये ।

7
नाथ, तुम
जाओ, किन्तु लौट आओगे, आओगे, आओगे ।
नाथ, तुम
हमें बिना अपराध अचानक छोड़ कहाँ जाओगे?
नाथ, तुम
अपनाकर सम्पूर्ण सृष्टि को मुझे न अपनाओगे?
नाथ, तुम
उसमें मेरा भी कुछ होगा, जो कुछ तुम पाओगे ।
8
सास-ससुर पूछेंगे
तो उनसे क्या अभी कहूँगी मैं ?
हा ! गर्विता तुम्हारी
मौन रहूँगी, सहूँगी मैं ।

नन्द-मैथिलीशरण गुप्त

आर्य, यह मुझ पर अत्याचार !
राज्य तुम्हारा प्राप्य, मुझे ही था तप का अधिकार!

छोड़ा मेरे लिए हाय ! क्या तुमने आज उदार?
कैसे भार सहेगा सम्प्रति, राहुल है सुकुमार?
आर्य, यह मुझ पर अत्याचार !

नन्द तुम्हारी थाती पर ही देगा सब कुछ वार,
किन्तु करोगे कब तक आ कर तुम उसका उद्धार?
आर्य, यह मुझ पर अत्याचार !

महाप्रजावती-मैथिलीशरण गुप्त

मैंने दूध पिला कर पाला ।
सोती छोड़ गया पर मुझको वह मेरा मतवाला !

कहाँ न जाने वह भटकेगा,
किस झाड़ी में जा अटकेगा ।
हाय ! उसे कांटा खटकेगा,
वह है भोला-भाला ।
मैंने दूध पिला कर पाला ।

निकले भाग्य हमारे सूने,
वत्स, दे गया तू दुख दूने,
किया मुझे कैकेयी तूने,
हाँ कलंक यह काला ।
मैंने दूध पिला कर पाला ।

कह, मैं कैसे इसे सहूँगी?
मर कर भी क्या बची रहूँगी?
जीजी से क्या हाय ! कहूँगी?
जीते जी यह ज्वाला।
मैंने दूध पिला कर पाला ।

जरा आ गयी यह क्षण भर में,
बैठी हूँ मैं आज डगर में!
लकड़ी तो ऐसे अवसर में
देता जा, ओ लाला !
मैंने दूध पिला कर पाला ।

शुद्धोदन-मैथिलीशरण गुप्त

1
मैंने उसके अर्थ यह, रूपक रचा विशाल,
किन्तु भरी खाली गई, उलट गया वह ताल ।

चला गया रे, चला गया !
छला न जाय हाय! वह यह मैं
छला गया रे, छला गया !
चला गया रे, चला गया !

खींचा मैंने गुण-सा तान,
निकल गया वह बान समान !
ममते तेरा, मान महान्
दला गया रे, दला गया !
चला गया रे, चला गया !

स्वस्थ देह-सा था यह गेह,
गया प्राण-सा वह निस्स्नेह ।
अश्रु! व्यर्थ है अब यह मेह,
जला गया रे, जला गया !
चला गया रे, चला गया !

उसे फूल सा रक्खा पाल,
गया गंध-सा वह इस काल !
या विष-फल, कांटे-सा साल,
फला गया रे, फला गया !
चला गया रे, चला गया !

धिक्! सब राज-पाट, धन-धाम,
धन्य उसी का लक्ष्य ललाम ।
किन्तु कहूँ कैसे हे राम!
भला गया रे, भला गया !
चला गया रे, चला गया !
2
शुद्धोदन-
धीरा है यशोधरे, तू, धैर्य कैसे मैं धरुँ?
तू ही बता, उसके लिए मैं आज क्या करुँ?

यशोधरा-
उनकी सफलता मनायो तात मन से-
सिद्धि-लाभ करके वे लौटें शीघ्र वन से।

शुद्धोदन-
तू क्या कहती है बहु, पाऊँ मैं जहाँ कहीं,
चतुर चरों को भेज खोजूं भी उसे नहीं?
यशोधरा-
तात, नहीं !

शुद्धोदन-
कैसी बात? बेटी, यह भूल है!

यशोधरा-
किन्तु खोज करना उन्हीं के प्रतिकूल है।

शुद्धोदन-
कैसे ?

यशोधरा-
तात, सोचो, क्या गये वे इसी अर्थ हैं ?
खोज हम लावें उन्हें, क्या वे असमर्थ हैं?

शुद्धोदन-
बेटी, वह प्रौढ़ है क्या? वत्स भोला-भाला है ।

यशोधरा-
पा लिया उन्होंने किन्तु ज्ञान का उजाला है!

शुद्धोदन-
गोपे, या गर्व और मान क्या उचित है?

यशोधरा-
जो मैं कहती हूं तात, हाय वही हित है ।

शुद्धोदन-
जान पड़ती तू आज मुझको कठोर है ।

यशोधरा-
धर्म लिए जाता मुझे आज उसी ओर है ।

शुद्धोदन-
तू है सती, मान्य रहे इच्छा तुझे पति की,
मैं हूँ पिता, चिंता मुझे पुत्र की प्रगति की।
भूला वह भोला, उठा रक्खूँ क्या उपाय मैं?

यशोधरा-
उनसे भी भोला तुम्हें देखती हूँ हाय मैं!

पुरजन-मैथिलीशरण गुप्त

1
भाई रे ! हम प्रजाजनों का हाय! भाग्य ही खोटा!
दिखा-दिखा कर लाभ अन्त में आ पड़ता है टोटा!

रोते रहे सभी पुर-परिजन,
राज्य छोड़ कर राम गये वन,
पड़ा रहा वह धाम-धराधन,
खड़ा रहा परकोटा!
भाई रे ! हम प्रजाजनों का हाय! भाग्य ही खोटा!

गये अज सिद्धार्थ हमारे,
जो थे इन प्राणों के प्यारे ।
भार मात्र कोई अब धारे,
राज्य धूल में लोटा!
भाई रे ! हम प्रजाजनों का हाय! भाग्य ही खोटा!

हम हों कितने ही अनुरागी,
हुए आज वे सब कुछ त्यागी,
कैसे उस विभूति का भागी
होता यह घर छोटा ?
भाई रे ! हम प्रजाजनों का हाय! भाग्य ही खोटा!
2
लो, यह छन्दक आया,
पर कन्थक शून्यपृष्ठ क्यों आया?
हे भगवान्! न जानें,
कौन समाचार यह लाया ।

छन्दक-मैथिलीशरण गुप्त

1
कहूं और क्या भाई!
आना पड़ा मुझे, मैं आया, मुझको मृत्यु न आई!

मारो तुम्हीं मुझे, मर जाऊँ सुख से राम-दुहाई,
झूठ कहूं तो सुगति न देवे मुझको, गंगा माई ।

जोग-भ्रष्ट थे आर्य उसी की धुन थी उन्हें समाई,
राज्य छोड़ संन्यास ले गये, रज ही हाय रमाई!

सोने का सुमेरु भी उनके निकट हुआ था राई,
अस्त्र, वस्व-भूषण क्या, उनको नहीं शिखा भी भाई ।
2
हाय काट डाले वे केश!
चिकने-चुपड़े, कोमल-कच्चे, सच्चे सुरभि-निवेश ।

शोभित ही रहता है शोभन, रख ले कोई देश,
दिया समान उन्होंने सबको आशा का सन्देश ।

'करे न कोई मेरी चिंता, नहीं मुझे भय लेश,
सिद्धि-लाभ करके मैं फिर भी लौटूँगा निज देश ।

सह सकता मैं नहीं किसी का, जन्म-जन्म का क्लेश,
तुम अपने हो, जीव मात्र का हित मेरा उदेश्य?'

यशोधरा-मैथिलीशरण गुप्त

1
जाओ, मेरे सिर के बाल!
आलि, कर्त्तरी ला मैंने क्या पाले काले व्याल ?

उलझें यहाँ न वे आपस में सुलझें वे व्रत-पाल ।
डसें न हाय! मुझे एड़ी तक विस्तृत ये विकराल ।

कसें न और मुझे अब आकर हेमहीर, मणिमाल,
चार चूड़ियां ही हाथों में पड़ी रहें चिरकाल ।

मेरी मलिन गूदड़ी में भी है राहुल-सा लाल!
क्या है अंजन-अंगराग, जब मिली विभूति विशाल?

बस, सिन्दूर-बिन्दु से मेरा जगा रहे यह भाल,
वह जलता अंगार जला दे उनका सब जंजाल ।
2
आज नया उत्सव है,
धन्य अहा! इस उमंग का क्या कहना?
सूनी अँखियों ने भी
निरख सखि, क्या अपूर्व गहना पहना!
3
वर्त्तमान मेरा अहा! है अतीत का ध्यान,
किन्तु हाय! इस ज्ञान से अच्छा था अज्ञान!
4
यह जीवन भी यशोधरा का अंग हुआ,
हाय! मरण भी आज न मेरे संग हुआ!
सखि, वह था क्या सभी स्वप्न, जो भंग हुआ?
मेरा रस क्या हुआ और क्या रंग हुआ?
5
मिला न हा! इतना भी योग,
मैं हँस लेती तुझे वियोग!

देती उन्हें विदा मैं गाकर,
भार झेलती गौरव पाकर,
यह नि:श्वास न उठता हा कर,
बनता मेरा राग न रोग,
मिला न हा! इतना भी योग ।

पर वैसा कैसे होना था ?
वह मुक्तायों का बोना था?
लिखा भाग्य में तो रोना था-
या मेरे कर्मों का भोग!
मिला न हा! इतना भी योग ।

पहुंचाती मैं उन्हें सजा कर,
गये स्वयं वे मुझे लजा कर ।
लूँगी कैसे-वाद्य बजा कर
लेंगे जब उनको सब लोग ।
मिला न हा! इतना भी योग ।
6
दूं किस मुंह से तुम्हें उलहना ?
नाथ मुझे इतना ही कहना ।

हाय! स्वार्थिनी थी मैं ऐसी, रोक तुम्हें रख लेती?
जहाँ राज्य भी त्याज्य, वहाँ मैं जाने तुम्हें न देती?
आश्रय होता या वह बहना?
नाथ मुझे इतना ही कहना ।

विदा न लेकर स्वागत से भी वंचित यहाँ किया है,
हन्त! अन्त में यह अविनय भी तुमने मुझे दिया है।
जैसे रक्खो, वैसे रहना!
नाथ मुझे इतना ही कहना ।
ले न सकेगी तुम्हें वही बढ़ तुम सब कुछ हो जिसके,
यह लज्जा, या क्षोभ भाग्य में लिखा गया कब, किसके ?
मैं अधीन, मुझको सब सहना ।
नाथ मुझे इतना ही कहना ।
7
अब कठोर हो वज्रादपि ओ कुसुमादपि सुकुमारी!
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।

मेरे लिए पिता ने सबसे धीर-वीर वर चाहा,
आर्यपुत्र को देख उन्होंने सभी प्रकार सराहा ।
फिर भी हठ कर हाय! वृथा ही उन्हें उन्होंने थाहा,
किस योद्धा ने बढ़ कर उनका शौर्य-सिन्धु अवगाहा?
क्यों कर सिद्ध करूं अपने को मैं उन नर की नारी?
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।

देख करात काल-सा जिसको कांप उठे सब भय से,
गिरे प्रतिद्वन्दी नन्दार्जुन नागदत्त जिस हय से,
वह तुरंग पालित-कुरंग-मा नत हो गया विनय से,
क्यों न गूँजती रंगभूमि फिर उनके जय जय जय से?
निकला वहाँ कौन उन जैसा प्रबल पराक्रमकारी?
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।
सभी सुन्दरी बालायोँ में मुझे उन्होंने माना,
सबने मेरा भाग्य सराहा, सबने रुप बखाना,
खेद, किसी ने उन्हें न फिर भी ठीक-ठीक पहचाना,
भेद चुने जाने का अपने मैंने भी अब जाना ।
इस दिन के उपयुक्त पात्र की उन्हें खोज थी सारी!
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।

मेरे रूप-रंग, यदि तुझको अपना गर्व रहा है,
तो उसके झूठे गौरव का तूने भार सहा है ।
तू परिवर्तनशील उन्होंने कितनी बार कहा है-
'फूला दिन किस अन्धकार में डूबा और बहा है?'
किन्तु अन्तरात्मा भी मेरा था क्या विकृत-विकारी?
आर्यपुत्र है चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।

मैं अबला! पर वे तो विश्रुत वीर-बली थे मेरे,
मैं इन्द्रियासक्ति! पर वे कब थे विषयों के चेरे?
अयि मेरे अर्द्धांगि-भाव, क्या विषय मात्र थे तेरे?
हा ! अपने अंचल में किसने ये अंगार बिखेरे?
है नारीत्व मुक्ति में भी तो अहो विरक्ति विहारी!
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी जारी ।

सिद्धि-मार्ग की बाधा नारी! फिर उसकी क्या गति है ?
पर उनसे पूछूं क्या, जिनको मुझसे आज विरति है!
अर्द्ध विश्व में व्याप्त शुभाशुभ मेरी भी कुछ मति है!
मैं भी नहीं अनाथ जगत में, मेरा भी प्रभु पति है!
यदि मैं पतिव्रता तो मुझको कौन भार-भय भारी?
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।
यशोधरा के भूरि भाग्य पर ईर्ष्या करने वाली,
तरस न खायो कोयी उस पर, अच्छी भोली-भाली!
तुम्हें न सहना पड़ा दु:ख यह, मुझे यही सुख आली!
बधू-वंश की लाज दैव ने आज मुझी पर डाली ।
बस जातीय सहानुभूति ही मुझे पर रहे तुम्हारी ।
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।

जायो नाथ! अमृत लायो तुम, मुझमें मेरा पानी,
चेरी ही मैं बहुत तुम्हारी, मुक्ति तुम्हारी रानी।
प्रिय तुम तपो, सहूं मैं भरसक, देखूँ बस हे दानी-
कहाँ तुम्हारी गुण-गाथा में मेरी करुण कहानी ?
तुम्हें अप्सरा-विघ्न न व्यापे यशोधराकरधारी!
आर्यपुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी ।
8
सखि, प्रियतम हैं वन में?
किन्तु कौन इस मन में?

दिव्य-मूर्ति-वंचित भले चर्म-चक्षु गल जायँ,
प्रलय! पिघल कर प्रिय न जो प्राणों में ढल जायँ,
जैसे गन्ध पवन में!
सखि, प्रियतम हैं वन में?

नयन, वृथा व्याकुल न हो, नयी नहीं यह रीति,
रखते हो तुम प्रीति तो धारन करो प्रतीति।
यही बड़ा बल जन में,
सखि, प्रियतम हैं वन में?

भक्त नहीं जाते कहीं, आते हैं भगवान,
यशोधरा के अर्थ है अब भी यह अभिमान ।
मैं निज राज-भवन में,
सखि, प्रियतम हैं वन में?

उन्हें समर्पित कर दिये, यदि मैंने सब काम,
तो आवेंगे एक दिन, निश्चय मेरे राम ।
यहीं, इसी आंगन में,
सखि, प्रियतम हैं वन में?
9
मरण सुन्दर बन आया री!
शरण मेरे मन भाया री!

आली, मेरे मनस्ताप से पिघला वह इस बार,
रहा कराल कठोर काल सो हुआ सत्य सुकुमार ।
नर्म सहचर-सा छाया-री!
मरण सुन्दर बन आया री!

अपने हाथों किया विरह ने उसका सब शृंगार,
पहना दिया उसे उसने मृदु मानस-मुक्ता-हार ।
विरुद विहगों ने गाया री!
मरण सुन्दर बन आया री!

फूलों पर पद रख, कूलों पर रच लहरों से रास,
मन्द पवन के स्पन्दन पर चढ़-चढ़ आया सविलास ।
भाग्य ने अवसर पाया री!
मरण सुन्दर बन आया री!

फिर भी गोपा के कपाल में कहाँ आज यह भोग?
प्रियतम का क्या, यम का भी है दुर्लभ उसे सुयोग?
बनी जननी भी जाया री!
मरण सुन्दर बन आया री!

स्वामी मुझको मरणे का भी दे न गये अधिकार,
छोड़ गये मुझ पर अपने उस राहुल का सब भार ।
जिये जल-जल कर काया री!
मरण सुन्दर बन आया री!
10
जलने को ही स्नेह बना।
उठने को ही वाष्प बना है,
गिरने को ही मेह बना ।

जलता स्नेह जलावेगा ही,
फोले वाष्प फलावेगा ही,
मिट्टी मेह गलावेगा ही
सब सहने को देह बना!
जलने को ही स्नेह बना!

यही भला, आँसू बह जावें,
रक्त-बिन्दु कह किसको भावें ?
मैं उठ जाऊँ सखि, वे आवें,
बसने को ही गेह बना,
जलने को ही स्नेह बना।
11
सखि, वसन्त-से कहां गये वे,
मैं उष्मा-सी यहाँ रही ।
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही ।

तप मेरे मोहन का उद्धव धूल उड़ाता आया,
हा! विभूति रमाने का भी मैंने योग न पाया ।
सूखा कण्ठ, पसीना छूटा, मृगतृष्णा की माया,
झुलसी दृष्टि, अंधेरा दीखा, दूर गयी वह छाया ।
मेरा ताप और तप उनका,
जलती है हा! जठर मही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही ।
जागी किसकी वाष्पराशि, जो सूने में सोती थी ?
किसकी स्मृति के बीज उगे ये सृष्टि जिन्हें बोती थी?
अरी वृष्टि, ऐसी ही उनकी दया दृष्टि रोती थी,
विश्व वेदना की ऐसी ही चमक उन्हें होती थी ।
किसके भरे हदय की धारा,
शतधा हो कर आज बही?
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही ।

उनकी शान्ति-कान्ति की ज्योत्स्ना जगती है पल-पल में,
शरदातप उनके विकास का सूचक है थल-थल में,
नाच उठी आशा प्रति दल पर किरणों की झल-झल में,
खुला सलिल का हृदय-कमल खिल हंसों के क्ल-क्ल में ।
पर मेरे मध्याह्न! बता क्यों
तेरी मूर्च्छा बनी वही?
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही ।

हेमपुंज हेमन्तकाल के इस आतप पर वारूं,
प्रियस्पर्श की पुल्कावलि मैं कैसे आज बिसारूँ ?
किन्तु शिशिर, ये ठण्डी साँसें हाय! कहां तक धारूं ?
तन गारूं, मन मारूं, पर क्या मैं जीवन भी हारूं ?
मेरी बांह गही स्वामी ने,
मैंने उनकी छाँह गही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही ।
पेड़ों ने पत्ते तक, उनका त्याग देख कर, त्यागे,
मेरा धुँधलापन कुहरा यन छाया सबके आगे ।
उनके तप के अग्नि-कुण्ड से घर-घर में हैं जागे,
मेरे कम्प, हाय! फिर भी तुम नहीं कहीं से भागे ।
पानी जमा, परन्तु न मेरे
खट्टे दिन का दूघ-दही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही ।

आशा से आकाश थमा है, श्वास-तन्तु कब टूटे ?
दिन-मुख दमके, पल्लव चमके, भव ने नव रस लूटे!
स्वामी के सद्भाव फैल कर फूल-फूल में फूटे,
उन्हें खोजने को ही मानों नूतन निर्झर छूटे ।
उनके श्रम के फल सब भोगें,
यशोधरा की विनय यही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही ।
12
कूक उठी है कोयल काली।
यो मेरे वनमाली!

चक्कर काट रही है रह-रह, सुरभि मुग्ध मतवाली,
अम्बर ने गहरी छानी यह, भू पर दुगनी ढाली!
यो मेरे वनमाली!

समय स्वयं यह सजा रहा है डगर-डगर में डाली,
मृदु समीर-सह बजा रहा है नीर तीर पर ताली,
यो मेरे वनमाली!

लता कण्टकित हुई ध्यान से ले कपोल की लाली,
फूल उठी है हाय! मान से प्राण भरी हरियाली ।
यो मेरे वनमाली!

ढलक न जाय अर्घ्य आँखों का, गिर न जाय यह थाली,
उड़ न जाय पंछी पांखों का, आओ हे गुणशाली!
यो मेरे वनमाली!
13
उनका यह कुंज-कुटीर वही
झड़ता उड़ अंशु-अवीर जहाँ,
अलि, कोकिल, कीर, शिखी सब हैं
सुन चातक की रट "पीव कहाँ?"
अब भी सब साज समाज वही
तब भी सब आज अनाथ यहाँ,
सखि, जा पहुँचे सुध-संग कहीं
यह अन्ध सुगन्ध समीर वहाँ ।
14
दरक कर दिखा गया निज सार जो,
हंस दाड़िम, तू खिल खेल,
प्रकट कर सका न अपना प्यार जो,
रो कठिन हदय; सब झेल ।
15
बलि जाऊँ, बलि जाऊँ चातकि, बलि जाऊँ इस रट की!
मेरे रोम-रोम में आकर यह कांटे सी खटकी।
भटकी हाय कहाँ घन की सुध, तू आशा पर अटकी,
मुझसे पहले तू सनाथ हो, यही विनय इस घट की।
16
फलों के बीज फलों में फिर आये,
मेरे दिन फिरे न हाय !
गये घन कै कै बार न घिर आये ?
वे निर्झर झिरे न हाय !
17
मैं भी थी सखि, अपने
मानस की राजहंसनी रानी,
सपने की-सी बातें !
प्रिय के तप ने सुखा दिया पानी ।

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