अब हमें चलना ही होगा - सुव्रत शुक्ल | Ab Hame Chalna hi Hoga - Suvrat Shukla

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"अब हमें चलना ही होगा"

भूलकर हम हार को अब,
जीत के सपने सजाएं,
होंठ पर रख मुस्कराहट,
आंखें कितनी ही भर आए,
हाथों की घिसकर लकीरें,
अब हमें चलना ही होगा,
यह सफर करना ही होगा।

कुछ हंसा, कुछ रो लिया,
कुछ मिल गया, कुछ खो दिया,
पर जो मिला पर्याप्त न था,
 कुछ रहा सम्पूर्ण ना था,
 उसको पाने के लिए,
 रातों से अब लड़ना ही होगा,
 अब हमें चलना ही होगा,
 यह सफर करना ही होगा।

कोई पूछेगा हमीं से,
क्या दिया और क्या कमाया,
क्या रहेगा पास उत्तर,
काटकर जीवन बिताया,
ना... कभी ऐसा न होगा,
जब तलक सांसे चलेगी,
बस विजय के ख्वाब लेकर,
कर्म की आंधी बहेंगी,
श्वास फिर भी यदि बची तो,
जीत कदमों में रहेगी,
प्राण निकले यदि हमारे,
पीढ़ियां हमको पढ़ेंगी,
सूर्य बनने के लिए अब,
सूर्य सा जलना ही होगा,
अब हमें चलना ही होगा,
यह सफर करना ही होगा।।

            - सुव्रत शुक्ल

Suvrat-Shukla


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