ज़िन्दगी - अभिषेक मिश्र | Zindagee - Abhishek Mishra

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"ज़िन्दगी"

परिस्थितियों के आलिंगन में बीतती है ज़िन्दगी,
कभी हंसाती तो कभी रुलाती है ज़िंदगी।
सचमुच क्या एक किताब है ज़िन्दगी?
या फिर हमारा सुनहरा  ख्वाब है ज़िन्दगी।

सोचा तो था कि संवारेंगे ज़िन्दगी,
भरेंगे इसमें खुशियों के कुछ रंग।
पर निखारने और संवारने में इसको,
आ गए हम तो अब खुद से ही तंग।

चलती रहेगी निरन्तर ये ज़िन्दगी,
गर्मी के दिन कभी सर्दी की रातें।
आएगा मौसम बदल बदल के,
ऋतुएं करेंगी आपस मे बातें।

ईश्वर की तुम हो एक अनूठी कृति,
करो प्रबल तुम अपनी श्रुति।
क्या खोया और क्या तुमने पाया,
क्या कभी तुम्हें ये समझ आया।

नहीं रहो तुम तिथियों के परिचर,
बिखरे सपनों को अरमानों में सजाकर।
हटा दो सारे अवगुंठन को ऐसे,
अभी मिला हो नवजीवन जैसे।

स्थिर बनो तो जीवन है ऐसा गान,
जिसमें है समाये सारे वेद और पुराण।
कौन कर सकता है विदीर्ण तुमको,
यदि तुम पाषाण बना लो खुदको।

चलो ज़िन्दगी को ऐसे मोड़ पे लाओ,
क्यों हो तुम आहत कुछ पल तो मुस्कुराओ।
स्वीकारो,सम्भालो,करो तुम बन्दगी,
कभी न कभी फिर मुस्कुराएगी ज़िन्दगी।।
                        
अभिषेक मिश्र -

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