नारी - अभिषेक मिश्र | Naari - Abhishek Mishra

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"नारी"

क्या है नारी ? मोह या माया ,
कोई इसको समझ न पाया ।
ममता है या फिर अनुराग,
या किसी का है ये विराग।
है धूप या फिर है ये छाँव,
मिलेगी हमें हर शहर और गांव।
उठने पर सुगन्धित धूप है,
उदारता का एक प्रतिरूप है।
कण-कण पुलकित हो धरा का,
इस नारी के उत्थान पर।
 मही का मस्तक हो विदीर्ण,
नारी के अपमान पर।
जब जब पुरुषों ने इसको,
अपने पैरों की जूती समझा।
तब तब काली के कराल का,
अकाण्ड तांडव उसने समझा।
पर दानवी इस समाज में,
उसको अबला समझा जाता।
नारी से ही नर होता है,
किसी से न देखा जाता।
त्याग,समर्पण के उसके,
यदि मूल्य चुकाने जाओगे।
सम्पूर्ण अपने जीवनभर में ,
चुका नहीं तुम पाओगे।

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