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Kavi Pradeep Selected Desh Bhakti Geeta

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कवि प्रदीप की चुनिंदा गीत आपके(toc)

ऐ मेरे वतन के लोगों - कवि प्रदीप

ऐ मेरे वतन के लोगों
तुम खूब लगा लो नारा
ये शुभ दिन है हम सब का
लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर
वीरों ने हैं प्राण गँवाए
कुछ याद उन्हें भी कर लो -२
जो लौट के घर न आये -२
 
ऐ मेरे वतन के लोगों
ज़रा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी
 
जब घायल हुआ हिमालय
खतरे में पड़ी आज़ादी
जब तक थी साँस लड़े वो
फिर अपनी लाश बिछा दी
संगीन पे धर कर माथा
सो गये अमर बलिदानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी
 
जब देश में थी दीवाली
वो खेल रहे थे होली
जब हम बैठे थे घरों में
वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो अपने
थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी
 
कोई सिख कोई जाट मराठा
कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पर मरनेवाला
हर वीर था भारतवासी
जो खून गिरा पर्वत पर
वो खून था हिंदुस्तानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी
 
थी खून से लथ-पथ काया
फिर भी बन्दूक उठाके
दस-दस को एक ने मारा
फिर गिर गये होश गँवा के
जब अन्त-समय आया तो
कह गये के अब मरते हैं
खुश रहना देश के प्यारों
अब हम तो सफ़र करते हैं
क्या लोग थे वो दीवाने
क्या लोग थे वो अभिमानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी
 
तुम भूल न जाओ उनको
इसलिये कही ये कहानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी
 
जय हिन्द...
जय हिन्द की सेना -२
जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द
 

हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के-कवि प्रदीप

हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के
पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के
मंजिल पे आया मुल्क हर बला को टाल के
सदियों के बाद फ़िर उड़े बादल गुलाल के
 
हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
 
देखो कहीं बरबाद न होवे ये बगीचा
इसको हृदय के खून से बापू ने है सींचा
रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
 
दुनियाँ के दांव पेंच से रखना न वास्ता
मंजिल तुम्हारी दूर है लंबा है रास्ता
भटका न दे कोई तुम्हें धोखे में डाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
 
एटम बमों के जोर पे ऐंठी है ये दुनियाँ
बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनियाँ
तुम हर कदम उठाना जरा देखभाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
 
आराम की तुम भूल-भुलैया में न भूलो
सपनों के हिंडोलों में मगन हो के न झूलो
अब वक़्त आ गया मेरे हंसते हुए फूलों
उठो छलांग मार के आकाश को छू लो
तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
 

आज हिमालय की चोटी से फिर हम ने ललकरा है कवि प्रदीप

आज हिमालय की चोटी से फिर हम ने ललकरा है
दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है
 
जहाँ हमारा ताज-महल है और क़ुतब-मीनारा है
जहाँ हमारे मन्दिर मस्जिद सिखों का गुरुद्वारा है
इस धरती पर क़दम बढ़ाना अत्याचार तुम्हारा है
 
शुरू हुआ है जंग तुम्हारा जाग उठो हिन्दुस्तानी
तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी
आज सभी के लिये हमारा यही क़ौमी नारा है
 

चल अकेला चल अकेला चल अकेला - कवि प्रदीप

चल अकेला चल अकेला चल अकेला
तेरा मेल पीछे छूटा राही चल अकेला
 
हजारों मील लम्बे रस्ते तुझको बुलाते
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते
है कौन सा वो इन्सान यहाँ पे
जिसने दुःख ना झेला
चल अकेला चल अकेला चल अकेला...
 
तेरा कोई साथ न दे तो
तू खुद से प्रीत जोड़ ले
बिचौना धरती को करके
अरे आकाश ओढ़ ले
पूरा खेल अभी जीवन का
तूने कहाँ है खेला
चल अकेला चल अकेला चल अकेला
तेरा मेल पीछे छूटा राही चल अकेला
 

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झाँकी हिंदुस्तान की - कवि प्रदीप

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम ...
 
उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है
दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है
जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है
बाट-बाट पे हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है
देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,
इस मिट्टी से ...
 
ये है अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्‍मिनियाँ अंगारों पे
बोल रही है कण कण से कुरबानी राजस्थान की
इस मिट्टी से ...
 
देखो मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुग़लों की ताकत को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पावत पे आग लगी थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
यहाँ शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से ...
 
जलियाँ वाला बाग ये देखो यहाँ चली थी गोलियाँ
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियाँ
एक तरफ़ बंदूकें दन दन एक तरफ़ थी टोलियाँ
मरनेवाले बोल रहे थे इनक़लाब की बोलियाँ
यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाजी अपनी जान की
इस मिट्टी से ...
 
ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है
यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है
ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है
मुट्ठी में तूफ़ान बंधा है और प्राण में ज्वाला है
जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की
इस मिट्टी से ...
 

चल चल रे नौजवान - कवि प्रदीप

दूर तेरा गाँव
और थके पाँव
फिर भी तू हरदम
आगे बढ़ा क़दम
रुकना तेरा काम नहीं
चलना तेरी शान चल-चल रे नौजवान
चल-चल रे नौजवान
 
तू आगे बढ़े जा
आफ़त से लड़े जा
आँधी हो या तूफ़ान
फटता हो आसमान
रुकना तेरा काम नहीं
चलना तेरी शान
चल-चल रे नौजवान
चल-चल रे नौजवान
 
ये है ज़िन्दगी का कारवाँ
आज यहाँ और कल वहाँ
(फिर क्यों तेरा दिल हुआ अधीर
फिर क्यों तेरे नैनों में नीर) – 2
फिर क्यों तेरे प्राणों में पीर
तू न सुना मन की बात कौन सुनेगा
कौन सुनेगा
बन्द कर ज़बान
बन्द कर ज़बान
रुकना तेरा काम नहीं
चलना तेरी शान
चल-चल रे नौजवान
चल-चल रे नौजवान
चल-चल रे नौजवान
चलो चलें माँचलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छाओं में
 

चलो चले माँ - कवि प्रदीप

हो राहें इशारे रेशमी घटाओं में
चलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छाओं में
चलो चलें माँ
 
आओ चलें हम एक साथ वहाँ
दुःख ना जहाँ कोई ग़म ना जहाँ
आओ चलें हम एक साथ वहाँ
दुःख ना जहाँ कोई ग़म ना जहाँ
आज है निमंत्रण सन सन हवाओं में
चलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छाओं में
चलो चलें माँ
 
रहना मेरे संग माँ हरदम
ऐसा ना हो के बिछड़ जाएँ हम
रहना मेरे संग माँ हरदम
ऐसा ना हो के बिछड़ जाएँ हम
घूमना है हमको दूर की दिशाओं में
चलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छांव में
चलो चलें माँ
 

बिगुल बज रहा आज़ादी का - कवि प्रदीप

बिगुल बज रहा आज़ादी का
गगन गूँजता नारों से
मिला रही है आज हिन्द की
मिट्टी नज़र सितारों से
 
एक बात कहनी है लेकिन
आज देश के प्यारों से
जनता से नेताओं से
फ़ौज़ों की खड़ी क़तारों से
 
कहनी है इक बात हमें इस
देश के पहरोदारों से
सम्भल के रहना अपने घर में
छिपे हुये ग़द्दारों से
 
झाँक रहे हैं अपने दुश्मन
अपनी ही दीवारों से
सम्भल के रहना अपने घर में
छिपे हुये ग़द्दारों से
 
ऐ भारत माता के बेटो -२
सुनों समय की बोली को
फैलाती जो फूट यहाँ पर
दूर करो उस टोली को
 
ऐ भारत माता के बेटो
सुनों समय की बोली को
फैलाती जो फूट यहाँ पर
दूर करो उस टोली को
 
कभी न जलने देना फिर से
भेद-भाव की होली को
जो गाँधी को चीर गई थी
याद करो उस गोली को
 
सारी बस्ती जल जाती है
मुट्ठी भर अंगारों से
सम्भल के रहना अपने घर में
छिपे हुये ग़द्दारों से
 
जागो तुमको बापू की
जागीर की रक्षा करनी है
जागो तुमको बापू की
जागीर की रक्षा करनी है
 
जागों लाखों लोगों की
तक़दीर की रक्षा करनी है
जागों लाखों लोगों की
तक़दीर की रक्षा करनी है
 
अभी-अभी जो बनी है उस
तसवीर की रक्षा करनी है
अभी-अभी जो बनी है उस
तसवीर की रक्षा करनी है
 
होशियार
होशियार
 
होशियार तुमको अपने
कश्मीर की रक्षा करनी है
होशियार तुमको अपने
कश्मीर की रक्षा करनी है
आती है आवाज़ यही
मन्दिर मसजिद गुरुद्वारों से
सम्भल के रहना अपने घर में
छिपे हुये ग़द्दारों से
 

जन्मभूमि माँ - कवि प्रदीप

जन्मभूमि माँ
मैं यहाँ तू वहाँ
तुझसे दूर जा रहा मैं जाने कहाँ
जन्मभूमि माँ ...
 
ये जो अपने बीच है दूरी
ये है माँ किस्मत की मजबूरी
तू तो है जननी, मेरी आत्मा
जन्मभूमि माँ
मैं यहाँ तू वहाँ ...
 
तुझसे शायद अब ना मिल पाऊँ
रोना मत माँ जो न घर आऊँ
है अभी बाकी मेरा इम्तेहान
जन्मभूमि माँ
मैं यहाँ तू वहाँ
 

सुनो सुनो देशके हिन्दू - मुस्लमान - कवि प्रदीप

सुनो रे सुनो देश के
हिन्दू मुसलमान
अरे सुनो बहन भाई सुनो
सुनो नौजवान
ये सुभाष की कथा
इसमें है बड़ी वृथा
इसमें कहीं आग हैं ऐ
और कहीं तूफान
सुनो रे सुनो सुनो रे
सुनो देश के हिन्दू मुसलमान
अरे सुनो बहिन भाई सुनो
सुनो नौजवान ये
सुभाष की कथा सुनो रे
 
अपनी साड़ी का एक बड़ा
चमत्कार था सुभाष
परदेसी हुकूमत का
बहिष्कार था सुभाष
अपने गुलाम देश की
ललकार था सुभाष
माँ के चरण का पुण्य
नमस्कार था सुभाष अरे सुनो देशवासियो
सुनो देशवासियो
हिन्द के निवासियो
उसने तो ग़ज़ब किया
भाग्य ही पलट दिया
सुनो देशवासियों
हिन्द के निवासियों
उसने तो ग़ज़ब किया
भाग्य ही पलट दिया
भर दिया जय हिंद के
नारे से आसमान
सुनो रे सुनो सुनो रे सुनो
देश के हिन्दू मुसलमान
अरे सुनो रे
 
उसने सिखाया देश को
अंगार पे चलना
लोहे की दहकती हुई
दीवार पे चलना
उसने सिखाया बिजलियों
के तार पे चलना
तलवार सामने हो
तो तलवार पे चलना
अरे नर वो लाजवाब था
नर वो लाजवाब था
ज़िंदा इनकुलाब था
काम उसने वो किया
हिल गया ब्रितानिआं
नर वो लाजवाब था ज़िंदा इनकुलाब था
काम उसने वो किया
हिल गया ब्रितानिआं
उसकी वो आज़ाद
हिन्द फौज़ थी महान
सुनो रे सुनो सुनो रे
सुनो देश के हिन्दू मुसलमान
अरे सुनो बहिन भाई
सुनो सुनो नौजवान
ये सुभाष की कथा सुनो रे
ये सुभाष की कथा सुनो रे
 

पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द ना जाने कोए - कवि प्रदीप

पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द ना जाने कोए
 
कह ना सके तू, अपनी कहानी
तेरी भी पंछी, क्या ज़िंदगानी रे
विधि ने तेरी कथा लिखी आँसू में कलम डुबोए
तेरा दर्द ना जाने कोए
 
चुपके चुपके, रोने वाले
रखना छुपाके, दिल के छाले रे
ये पत्थर का देश हैं पगले, यहाँ कोई ना तेरा होए
तेरा दर्द ना जाने कोए
 

सुख दुःख दोनों रहते जिसमें, जीवन है वो गाँव - कवि प्रदीप

सुख दुःख दोनों रहते जिसमें, जीवन है वो गाँव
कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव
 
भले भी दिन आते जगत में, बुरे भी दिन आते
कड़वे मीठे फल करम के यहाँ सभी पाते
कभी सीधे कभी उल्टे पड़ते अजब समय के पाँव
कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव
सुख दुःख दोनों रहते जिसमें, जीवन है वो गाँव
 
क्या खुशियाँ क्या गम, यह सब मिलते बारी बारी
मालिक की मर्ज़ी पे चलती यह दुनिया सारी
ध्यान से खेना जग नदिया में बन्दे अपनी नाव
कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव
सुख दुःख दोनों रहते जिसमें, जीवन है वो गाँव

गा रही है ज़िंदगी हर तरफ़ बहार में किस लिये - कवि प्रदीप

गा रही है ज़िंदगी हर तरफ़ बहार में किस लिये
चार चांद लग गये हैं तेरे मेरे प्यार में इस लिये
 
आ गया आँचल किसी का आज मेरे हाथ में
है चकोरी आज अपने चँद्रमा के साथ में
चल पडी दो किश्तीयाँ आज एक धार में किस लिये
चार चांद लग गये हैं तेरे मेरे प्यार में इस लिये
गा रही है ज़िंदगी हर तरफ़ बहार में किस लिये
चार चांद लग गये हैं तेरे मेरे प्यार में इस लिये
 
छू रही तन मन को मेरे प्रीत की पुर्वाईयाँ
दूर की अम्ब्राईओं में गुँजती शेहनाईयाँ
सौ गुना निखार है आज तो सिंगार में किस लिये
चार चांद लग गये हैं तेरे मेरे प्यार में इस लिये
गा रही है ज़िंदगी हर तरफ़ बहार में किस लिये
चार चांद लग गये हैं तेरे मेरे प्यार में इस लिये
 
ज़िंदगी भर के लिये तू बाँह मेरी थाम ले
जब तलक ये साँस है हर साँस तेरा नाम ले
इक नयी दुनिया खडी अपने इंतेज़ार में किस लिये
चार चांद लग गये हैं तेरे मेरे प्यार में इस लिये
गा रही है ज़िंदगी हर तरफ़ बहार में किस लिये
चार चांद लग गये हैं तेरे मेरे प्यार में इस लिये
 

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान् - कवि प्रदीप

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान्
कितना बदल गया इंसान कितना बदल गया इंसान
सूरज न बदला चाँद न बदला न बदला रे आसमान
कितना बदल गया इंसान कितना बदल गया इंसान
 
राम के भक्त रहीम के बन्दे
रचते आज फरेब के फंदे
कितने ये मक्कार ये अंधे
देख लिए इनके भी फंदे
इन्ही की काली करतूतों से
बना ये मुल्क मसान
कितना बदल गया इंसान
 
क्यूँ ये नर आपस में झगड़ते
काहे लाखों घर ये उजड़ते
क्यूँ ये बच्चे माँ से बिछड़ते
फूट फूट कर क्यूँ रो
ते प्यारे बापू के प्राण
कितना बदल गया इंसान
कितना बदल गया इंसान
 

हमने जग की अजब तस्वीर देखी - कवि प्रदीप

हमने जग की अजब तस्वीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
ये प्रभु की अद्भुत जागीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
 
हमे हँसते मुखड़े चार मिले
दुखियारे चेहरे हज़ार मिले
यहाँ सुख से सौ गुनी पीड़ देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
हमने जग की अजब तस्वीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
 
दो एक सुखी यहाँ लाखों में
आंसू है करोड़ों आँखों में
हमने गिन गिन हर तकदीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
हमने जग की अजब तस्वीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
 
कुछ बोल प्रभु ये क्या माया
तेरा खेल समझ में ना आया
हमने देखे महल रे कुटीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
हमने जग की अजब तस्वीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
 

अमृत और ज़हर दोनों हैं सागर में एक साथ - कवि प्रदीप

अमृत और ज़हर दोनों हैं सागर में एक साथ
मंथन का अधिकार है सबको फल प्रभु तेरे हाथ
 
तेरे फूलों से भी प्यार
तेरे काँटों से भी प्यार
जो भी देना चाहे देदे करतार
दुनिया के तारनहार
तेरे फूलों से भी प्यार
 
चाहे सुख दे या दुःख, चाहे ख़ुशी दे या गम
मालिक जैसे भी रखेगा वैसे रह लेंगे हम
चाहे हंसी भरा संसार दे या आंसुओं की धार
दो भी देना चाहे देदे करतार
दुनिया के तारनहार
 
हमको दोनों हैं पसंद तेरी धूप और छाँव
दाता किसी भी दिशा में ले चल ज़िन्दगी की नाव
चाहे हमें लगा दे पार डूबा दे चाहे हमे मझधार
दो भी देना चाहे देदे करतार
दुनिया के तारनहार
 

मेरे मन हँसते हुए चल - कवि प्रदीप

आज नहीं तो कल बिखर जायेंगे ये बादल
हँसते हुए चल
मेरे मन हँसते हुए चल
बीती हुई बातों पे
बीती हुई बातों पे अब रोने से क्या फल
हँसते हुए चल
मेरे मन हँसते हुए चल
 
गुज़र चुका है जो ज़माना
गुज़र चुका है जो ज़माना
तू भूल जा उसकी धुन
जो आनेवाले दिन हैं
उनकी आवाज़ को सुन
मुझे पता है बड़े बड़े
तूफ़ान हैं तेरे सामने
खुशी खुशी तू सहता जा
जो कुछ भी दिया है राम ने
अपनी तरह कितनों के
यहाँ टूट चुके हैं महल
हँसते हुए चल
मेरे मन हँसते हुए चल
 
फूलों का सेहरा बाँधनेवाले
इस दुनिया में अनेक
जो काँटों का ताज पहन ले
वो लाखों में एक
मेरे मन वो लाखों में एक
गिरे बिजलियां गिरे बिजलियां
गिरे बिजलियां फिर भी अपनी
टेक से तू मत टल
हँसते हुए चल
मेरे मन हँसते हुए चल
 
मेरी मुहब्बत आज जलाना
सम्भल के ज़रा चिराग
मेरी मुहब्बत आज जलाना
सम्भल के ज़रा चिराग
मैं काग़ज़ के घर में बैठी
लग न जाये आग
लग न जाये आग मेरी क़िस्मत में
लग न जाये दाग मेरी इज़्ज़त में
इस देश की नारी को
इस देश की नारी को
कोई कह न दे दुरबल
हँसते हुए चल
मेरे मन हँसते हुए चल
 

हम तो अलबेले मज़दूर - कवि प्रदीप

हम तो अलबेले मज़दूर गज़ब हमारी जादूगरी
जादूगरी भाई जादूगरी गज़ब हमारी जादूगरी
हम तो अलबेले मज़दूर गज़ब हमारी जादूगरी
 
कहो तो फ़ौरन महल बना दें
पास में बढ़िया बाग़ लगा दें
जहाँ पे छम-छम नाचे सलोनी
कोई छबीली परी राम हो जादूगरी
हम तो अलबेले मज़दूर गज़ब हमारी जादूगरी
 
हम पत्थर में प्राण जगा दें
हम मिट्टी में जीवन ला दें
नखरे वाली डलिया मोरी
नखरे वाली डलिया मोरी
नखरे वाली डलिया मोरी
बडी गुमान भरी
राम हो जादूगरी
हम तो अलबेले मज़दूर गज़ब हमारी जादूगरी
 

अरे ओ रौशनी वालो - कवि प्रदीप

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम
जिधर भी देखूं मैं
अंधकार अंधकार
 
अँधेरे में जो बैठे हैं
नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रौशनी वालो
बुरे इतने नहीं हैं हम
जरा देखो हमे भालो
अरे ओ रौशनी वालो
 
कफ़न से ढँक कर बैठे हैं
हम सपनो की लाशो को
जो किस्मत ने दिखाए
देखते हैं उन उन तमाशों को
हमे नफरत से मत देखो
जरा हम पर रहम खालो
अरे ओ रौशनी वालो
 
हमारे भी थे कुछ साथी
हमारे भी थे कुछ सपने
सभी वो राह में छूटे
वो सब रूठे जो थे अपने
जो रोते हैं कई दिन से
जरा उनको भी समझा लो
अरे ओ रौशनी वालो
अँधेरे में जो बैठे हैं
नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रौशनी वालो
 

मैं एक नन्हा सा मैं एक छोटा सा बच्चा हूँ - कवि प्रदीप

मैं एक नन्हा सा मैं एक छोटा सा बच्चा हूँ
तुम हो बड़े बलवान
प्रभु जी मेरी लाज रखो
मैं एक नन्हा सा
 
मैंने सुना है तुमने यहाँ पे
लाखों के दुःख टाले
मेरा दुःख भी टालो तो जानूं
चक्र सुदर्शन वाले
मैं एक नन्हा सा मैं एक छोटा सा बच्चा हूँ
मुझपे धरो कुछ ध्यान
प्रभु जी मेरी लाज रखो
मैं एक नन्हा सा
 
तुमको दयालु अपना समझके मैंने आज पुकारा
मुझ निर्बल के हाथ पकड़ लो
दे दो नाथ सहारा
मैं एक नन्हा सा मैं एक छोटा सा बच्चा हूँ
मैं भी तुम्हारी संतान
प्रभु जी मेरी लाज रखो
मैं एक नन्हा सा
 
मैं आया हूँ आज तुम्हारे द्वार पे आस लगाये
ऐसा कोई जतन करो प्रभु
सांच को आंच ना आये
मैं एक नन्हा सा मैं एक छोटा सा बच्चा हूँ
बिगड़ी बनादो भगवान
प्रभु जी मेरी लाज रखो
प्रभु जी मेरी लाज रखो
प्रभु जी मेरी लाज रखो
 

एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो - कवि प्रदीप

किस बाग़ में मैं जन्मा खेला
मेरा रोम रोम ये जानता है
तुम भूल गए शायद माली
पर फूल तुम्हे पहचानता है
जो दिया था तुमने एक दिन
मुझे फिर वो प्यार दे दो
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो
 
तुम छोड़ गए थे जिसको
एक धूल भरे रस्ते में
वो फूल आज रोता है
एक अमीर के गुलदस्ते में
मेरा दिल तड़प रहा है मुझे फिर दुलार दे दो
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो...
 
मेरी उदास आँखों को है याद वो वक़्त सलोना
जब झूला था बांहों में मैं बन के तुम्हारा खिलौना
मेरी वो ख़ुशी की दुनिया फिर एक बार दे दो
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो...
 
तुम्हे देख उठते हैं
मेरे पिछले दिन वो सुनहरे
और दूर कहीं दिखते हैं
मुझसे बिछड़े दो चेहरे
जिसे सुनके घर वो लौटे मुझे वो पुकार दे दो
एक क़र्ज़ मांगता हूँ बचपन उधार दे दो...
 

भारत के लिए भगवन का एक वरदान है गंगा - कवि प्रदीप

भारत के लिए भगवन का
एक वरदान है गंगा
सच पूछो तो इस देश की
पहचान है गंगा
हर हर गंगे …………..
 
गिरिराज हिमालय की बेटी
ये महान है गंगा
भारत माता के मस्तक का
अभिमान है गंगा
 
इस धरती के बेटो पर
एक अहसान है गंगा
लाखो करोडो होठो की
मुस्कान है गंगा
 
गंगा ही हिंदुस्तान
हिंदुस्तान है गंगा
सच पूछो तो इस देश की
पहचान है गंगा
हर हर गंगे …………..
 
है कोटि कोटि देवों के मंदिर
इसके किनारे
मंगल ध्वनियां होती है
जहा पर सांझ सतरे
जुग जुग से इस माता ने
हमारे भाग्य सवेरे
ये जहा गयी बन गए
वह पर तीरथ प्यारे
 
इस अपनी प्यारी जन्म भूमि
की जान है गंगा
सच पूछो तो इस देश की
पहचान है गंगा
हर हर गंगे …………..
 
भारत के लिए भगवन का
एक वरदान है गंगा
सच पूछो तो इस देश की
पहचान है गंगा
हर हर गंगे …………..
 

सूरज रे जलते रहना  - कवि प्रदीप

जगत भर की रोशनी के लिये
करोड़ों की ज़िंदगी के लिये
 
सूरज रे जलते रहना
सूरज रे जलते रहना ...
 
जगत कल्याण की खातिर तू जन्मा है
तू जग के वास्ते हर दुःख उठा रे
भले ही अंग तेरा भस्म हो जाये
तू जल जल के यहँ किरणें लुटा रे
 
लिखा है ये ही तेरे भाग में
कि तेरा जीवन रहे आग में
सूरज रे ...
 
करोड़ों लोग पृथ्वी के भटकते हैं
करोड़ों आँगनों में है अँधेरा
अरे जब तक न हो घर घर में उजियाला
समझ ले अधूरा काम है तेरा
 
जगत उद्धार में अभी देर है
अभी तो दुनियाँ मैं अन्धेर है
सूरज रे ...

Jane Mane Kavi (medium-bt) Hindi Kavita (medium-bt) Kavi Pradeep (medium-bt)

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