आनन्द मंजरी (मुकरी संग्रह) - त्रिलोक सिंह ठकुरेला | Aanand Manajri - Trilok Singh Thakurela

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आनन्द मंजरी (मुकरी संग्रह) - त्रिलोक सिंह ठकुरेला | Aanand Manajri - Trilok Singh Thakurela

समर्पण

परम पूज्य पिताजी
श्री खमानी सिंह जी
को
सादर समर्पित

अपनी बात

हिन्दी काव्य रूपों में ‘मुकरी’ का अपना महत्व है। मुकरी बहुत ही पुरातन एवं विरल काव्य विद्या है। मुकरी को कह-मुकरी के नाम से भी जाना जाता है। कह-मुकरी अर्थात् कहकर मुकर जाना।
Trilok-Singh-Thakurela


अधिकांश विद्वान मुकरी को पहेली का ही एक प्रकार मानते है। पहेली की ही तरह मुकरी भी श्रोता के बुद्धि विकास के साथ उसका मनोरंजन करती है। पुरातन मुकरियाँ देखने पर स्वतः स्पष्ट होता है कि मुकरी दो अंतरंग सखियों के बीच हुआ संवाद है, जिसमें पहली सखी अपनी दूसरी सखी के सामने अपनी बात कुछ इस प्रकार रखती है कि उसे अर्थ-भ्रम हो जाता है। श्रोता सखी ज्यों ही अर्थ-ग्रहण करना चाहती है, त्यों ही वक्ता सखी दूसरा अर्थ करके उसे हतप्रभ कर देती है। यद्यपि यह दो पुरुष मित्रों या स्त्री-पुरुष का संवाद भी हो सकता है।

मुकरी या कह मुकरी चार पदों का सममात्रिक छंद है। मुकरी के प्रत्येक पद या चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार एक आदर्श मुकरी में कुल 64 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में 8वीं मात्रा पर यति होना उत्तम माना गया है। हालांकि कई मुकरीकारों ने अपवादस्वरूप उक्त विधान से इतर भी मुकरियाँ लिखी हैं किन्तु मुकरी में अपनी बात से मुकरने या नटने का भाव निहित होता है।

मुकरी ऐसी काव्य संरचना है, जिसमें प्रारम्भिक तीन चरणों में पहेली की तरह ‘बूझो तो जानें’ वाली बात छिपी होती है, जबकि अंतिम चरण में इसके दो उत्तर निहित होते हैं। मुकरी की विशेषता है कि इसमें श्रोता के पहले उत्तर से असहमति जताते हुए वक्ता द्वारा दूसरा उत्तर प्रस्तुत कर उसे सही ठहराया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि हिन्दी साहित्य में मुकरी की परम्परा की शुरूआत अमीर खुसरो से होती है। मुकरीकारों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने नये जमाने की मुकरियाँ लिखीं। राजनैतिक मुकरियाँ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अभिनव प्रयोग हैं।

नागार्जुन ने भी परम्परागत विषयों से हटकर मुकरियाँ लिखीं हैं। अपने छात्र जीवन में मैंने कुछ मुकरियाँ पढ़ी जरूर थीं किन्तु मैं स्वयं कभी मुकरियाँ लिखूँगा, मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था ।

हिन्दी एवं अंगिका भाषा के साहित्यकार श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’ से मेरा मित्र-भाव है। उनसे मेरा परिचय हिन्दी भाषा साहित्य परिषद, खगड़िया (बिहार) के एक साहित्य सम्मेलन में हुआ। चलभाष पर एक-दूसरे की कुशलता एवं साहित्य सृजन के सम्बन्ध में संवाद प्रायः होता ही रहता है। एक दिन श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’ ने बताया कि तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के हिन्दी विभाग अध्यक्ष डॉ. बहादुर मिश्र एक मुकरी संकलन का सम्पादन कर रहे हैं। श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’ ने मुझे भी इस संकलन के लिए मुकरियाँ भेजने एवं डॉ. बहादुर मिश्र से सम्पर्क करने हेतु कहा।

मैंने तब तक कोई मुकरी नहीं लिखी थी, किन्तु फिर भी डॉ. बहादुर मिश्र से बात करने का मन हुआ। चलभाष पर उनसे सम्पर्क हुआ तो उन्होंने बताया कि मुकरी संकलन शीघ्र ही प्रेस में जा रहा है। आप दो दिन में अपनी मुकरियाँ भेज दें। जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैंने उस समय तक कोई मुकरी नहीं लिखी थी फिर भी मैंने उन्हें कहा कि मैं प्रयास करूंगा। परिणामस्वरूप मैंने बाईस मुकरियाँ लिखीं एवं दो दिन बाद उन्हें डॉ. बहादुर मिश्र के पास भेज दिया। मेरी मुकरियाँ उन्हें पसंद आयीं। उन्होंने मुझे और मुकरियाँ लिखने की सलाह दी। मुकरी जैसे काव्य रूप में लिखना मुझ जैसे साधारण व्यक्तित्व के लिए असाधारण बात ही थी, फिर भी मैंने एक सौ एक मुकरियाँ लिखकर इसे संग्रह का रूप देने का प्रयास किया है।

मेरी सभी रचनाओं की प्रथम श्रोता मेरी जीवन संगिनी श्रीमती साधना ठकुरेला ही होती हैं। कई बार उनके परामर्श पर मैं रचनाओं में अपेक्षित बदलाव भी करता हूँ।

डॉ. बहादुर मिश्र ने इस कृति के बारे में दो शब्द लिखकर इसकी महत्ता बढ़ा दी है।

मैं डॉ. बहादुर मिश्र, श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, जीवन संगिनी साधना ठकुरेला सहित उन सभी का हृदय से आभारी हूँ, जिनका इस कृति के सृजन में परोक्ष अपरोक्ष रूप से मुझे सहयोग मिला है। राजस्थानी ग्रन्थागार के श्री राजेन्द्र सिंघवी ने मेरे सृजन को पुस्तक रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया, इस हेतु उनका आभार प्रकट करना मैं अपना कर्तव्य समझाता हूँ।

यदि ‘आनन्द मंजरी’ पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होती है तो मैं अपना श्रम सार्थक समझूँगा।

आपके सुझावों का सदैव स्वागत है।

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
बंगला संख्या-99,
रेलवे चिकित्सालय के सामने
आबू रोड़-307026 (राजस्थान)
मो. 9460714267

आत्मानन्द को जगदानन्द से जोड़ने वाली पुस्तक

‘आनन्द मंजरी’ त्रिलोक सिंह ठकुरेला का प्रथम मुकरी-संग्रह है। इसके पूर्व इनकी कई काव्य-कृतियाँ (मौलिक/संपादित) प्रकाशित होकर प्रशंसित हो चुकी हैं, प्रस्तुत पुस्तक ठकुरेला जी की सर्वथा मौलिक प्रस्तुति है।

‘आनन्द मंजरी’ कुल एक सौ एक मुकरियों का संकलन है, जिसकी पहली बाईस मुकरियाँ प्रकाशित हैं। ये मुकरियाँ (डॉ.) बहादुर मिश्र द्वारा संपादित ‘मुकरियाँ’ (अतुल्य प्रकाशन, दिल्ली, 2017) तथा ‘क्या सखि साजन?’ (संवेद-115 नई किताब, दिल्ली, 2018) में देखी जा सकती हैं।

जैसा कि आपको पता है, मुकरी द्विपक्षीय संलाप-शैली में रचित लोकप्रिय लोककाव्य-रूप है जिसमें भणिता शैली का प्रयोग होता है। भारतीय आचायोँ ने पहेली के सोलह प्रकार माने हैं। उनमें एक प्रकार ‘मुकरी’ से मिलता-जुलता है। पाश्चात्य विद्वान टिलियर्ड ने इसे ‘डिसगाइस्ड स्टेटमेंट’ नामक काव्य-कोटि के अंतर्गत रखा है। जैसा कि ऊपर निवेदित किया गया है कि मुकरी द्विपक्षीय वार्तालाप-शैली में निबद्ध काव्य-रूप है, इसमें एक वक्ता और एक श्रोता होता है। अधिकांश कथन वक्ता की तरफ से आता है। किन्तु, इसका अंतिम हिस्सा श्रोता की ओर से। इस तरह, वक्ता-श्रोता की भूमिका परस्पर बदल जाती है। इसका मूल उद्देश्य मनोरंजन और गौण उद्देश्य बुद्धि-परीक्षण या सूचनात्मक ज्ञान होता है।

मुकरी के आविष्कार का श्रेय अमीर खुसरो को दिया गया हैं। कालान्तर में भारतेन्दु, नागार्जुन, विजेता मुद्गलपुरी दिनेश तपन, हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, सुधीर कुमार ‘प्रोग्रामर’, आमोद कुमार मिश्र, रामविलास प्रगृति ने इसे गति और ऊर्जा प्रदान की।

अमीर खुसरो तथा अन्य मुकरीकारों ने परंपरित शैली का प्रयोग किया है। इसमें वक्ता-श्रोता की भूमिका में स्त्रियाँ ही होती हैं। किन्तु, विजेता मुदगलपुरी प्रभृति कुछ मुकरीकारों ने इस परंपरा को तोड़ा है। उनकी मुकरियों में स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं। एक महत्वपूर्ण परिवर्तन इस रूप में देखा जा सकता है कि आज के दौर में लिखी जा रही मुकरियों में श्रृंगारिक विषय के अलावा देश-विदेश की विभिन्न समस्याएँ भी स्थान पा रही हैं। यद्यपि इसकी शुरूआत भारतेन्दु और नागार्जुन ने ही कर रखी थी, यथा - महँगाई, बेरोजगारी, पुलिसिया, दमन इत्यादि। जहाँ तक ठकुरेला जी की मुकरियों के ‘विषय-चयन और शैलीगत प्रयोग’ का प्रश्न है, शैली की दृष्टि से जहाँ इन्होंने परंपरा का दामन पकड़ रखा है, वहाँ विषय की दृष्टि से लोक छोड़ना ही उचित समझा। इनकी मुकरियों में वक्ता-श्रोता दोनों की भूमिका का निर्वाह दो सखियाँ करती हैं। यहाँ किसी पुरुष मित्र के प्रवेश की अनुमति नहीं है। और जहाँ तक विषय का प्रश्न है तो इन्होंने बयासी-तिरासी विषयों को आधार बनाकर मुकरियाँ रची हैं, यथा - डंडा (3 बार), तोता (3 बार), चंदा, ताला, माला, झुमका, मच्छर, दर्पण, साड़ी, सोना, भौर, पैसा, हाथी, सपना, सावन इत्यादि दो-दो बार विषय बने हैं। इन विषयों को कई श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। उदाहरणार्थ - (क)प्राकृतिक विषयाधारित मुकरियाँ, (ख)जीव-जगत से संबंधित, (ग)स्त्री के श्रृंगार और परिधान से संबंधित, (घ)रसोई और खान-पान से संबंधित, (ड़) राजनीति से संबंधित तथा (च)अन्य।

चंदा, तारा, फुलवारी, सावन, सवेरा, जाड़ा इत्यादि को आधार बनाकर रचित मुकरियाँ एक दर्जन से अधिक हैं। संकलन की पहली मुकरी ‘चंदा’ पर आधारित हैं, यथा -

जब भी देखूँ, आतप हरता ।
मेरे मन में सपने भरता।
जादूगर है, डाले फंदा। ।
क्या सखि साजन? ना सखि चंदा ।

इसी तरह, मच्छर-विषयक मुकरी देखिए -

बिना बुलाये, घर आ जाता ।
अपनी धुन में गीत सुनाता ।
नहीं जानता ढाई अक्षर /
क्या सखि साजन ? ना सखि, मच्छर ।

नारी के कर्णाभूषण झुमका पर केन्द्रित मुकरी देखिए -

मैं झूमूँ तो वह भी झूमे ।
जब चाहे गालों को चूमे ।
खुश होकर नाचूँ दे ठुमका ।
क्या सखि, साजन ? ना सखि, झुमका ।

अब महँगाई से जुड़ी मुकरी पर गौर फरमाइए -

जब-जब आती दुःख से भरती ।
पति के रुपये-पैसे हरती ।
उसकी आवक रास न आई ।
क्या सखि सौतन? ना महँगाई ।

देखा न, अंतिम मुकरी का रंग-ढंग बदल गया है।

ठकुरेला जी की ये मुकरियाँ 16-16 मात्राओं के क्रम-विधान से कुल 64 मात्राओं में रचित विशुद्ध मुकरियाँ हैं, जिनमें नियमपूर्वक चरणान्तर्गत आठवीं मात्रा पर यति का विधान किया गया है।

इस तरह ठकुरेला जी न केवल विषय की दृष्टि से बल्कि रूप और व्याकरण की दृष्टि से भी हिन्दी के महत्वपूर्ण मुकरीकार ठहरते हैं। विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों का मनोरंजन के साथ-साथ मनः प्रबोधन भी करेगी। इस तरह यह अपने शीर्षक ‘आनन्द मंजरी’ को सार्थकता प्रदान करेगी। यह पुस्तक हिन्दी में एक बड़े विधागत अभाव की पूर्ति में भी सहायक सिद्ध होगी। शुभास्ते पन्थानः ।

18 अक्टूबर, 2019
-बहादुर मिश्र
प्रोफेसर: हिन्दी विभाग
ति. माँ. भागलपुर विश्विद्यालय
भागलपुर - 812007 (बिहार)

जाके राधाकांत हैं, ताके पूरे काम।
सारी ही माया मिले, सारे ही आराम।।

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

आनन्द मंजरी (मुकरी संग्रह)

जब भी देखूं, आतप हरता।
मेरे मन में सपने भरता।
जादूगर है, डाले फंदा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, चंदा।

लंबा कद है, चिकनी काया।
उसने सब पर रौब जमाया।
पहलवान भी पड़ता ठंडा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, डंडा।

उससे सटकर, मैं सुख पाती।
नई ताजगी मन में आती।
कभी न मिलती उससे झिड़की।
क्या सखि, साजन? ना सखि, खिड़की।

जैसे चाहे वह तन छूता।
उसको रोके, किसका बूता।
करता रहता अपनी मर्जी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्जी।

कभी किसी की धाक न माने।
जग की सारी बातें जाने।
उससे हारे सारे ट्यूटर।
क्या सखि, साजन? ना, कंप्यूटर।

यूँ तो हर दिन साथ निभाये।
जाड़े में कुछ ज्यादा भाये।
कभी कभी बन जाता चीटर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, हीटर।

देख देख कर मैं हरषाऊँ।
खुश होकर के अंग लगाऊं।
सीख चुकी मैं सुख-दुख सहना
क्या सखि, साजन? ना सखि, गहना।

दिन में घर के बाहर भाता।
किन्तु शाम को घर में लाता।
कभी पिलाता तुलसी काढ़ा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, जाड़ा।

रात दिवस का साथ हमारा।
सखि, वह मुझको लगता प्यारा।
गाये गीत कि नाचे पायल।
क्या सखि, साजन? ना, मोबाइल।

मन बहलाता जब ढिंग होती।
खूब लुटाता खुश हो मोती।
फिर भी प्यासी मन की गागर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सागर।

बार बार वह पास बुलाता।
मेरे मन को खूब रिझाता।
खुद को उस पर करती अर्पण।
क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्पण।

बड़ी अकड़ से पहरा देता।
बदले में कुछ कभी न लेता।
चतुराई से खतरा टाला।
क्या सखि, साजन? ना सखि, ताला।

दाँत दिखाए, आँखें मींचे।
जब चाहे तब कपड़े खींचे।
डरकर भागूं घर के अंदर।
क्या सखि, गुंडा? ना सखि, बंदर।

वादे करता, ख्वाब दिखाये।
तरह तरह से मन समझाये।
मतलब साधे, कुछ ना देता।
क्या सखि, साजन? ना सखि, नेता।

रस लेती मैं उसके रस में।
हो जाती हूँ उसके वश में।
मैं खुद उस पर जाऊँ वारी।
क्या सखि, साजन? ना, फुलवारी।

बल उससे ही मुझमें आता।
उसके बिना न कुछ भी भाता।
वह न मिले तो व्यर्थ खजाना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, खाना।

चमक दमक पर उसकी वारी।
उसकी चाहत सब पर भारी।
कभी न चाहूँ उसको खोना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सोना।

उस से ही यह धरा सुहानी।
वह न रहे तो खत्म कहानी।
तू भी कब है, कम दीवानी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, पानी।

रात हुई तो घर में आया।
सुबह हुई तब कहीं न पाया।
कभी न वह हो पाया मेरा।
क्या सखि, साजन? नहीं, अँधेरा।

तन से लिपटे, मन को भाये।
मन में अनगिन खुशियाँ लाये।
उसके बिना न चलती गाड़ी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, साड़ी।

खरी खरी वह बातें करता।
सच कहने में कभी न डरता।
सदा सत्य के लिए समर्पण।
क्या सखि, साधू? ना सखि, दर्पण।

हाट दिखाये, सैर कराता।
जो चाहूँ वह मुझे दिलाता।
साथ रहे तो रहूँ सहर्ष।
क्या सखि, साजन? ना सखि, पर्स।

जब देखूं तब मन हरसाये।
मन को भावों से भर जाये।
चूमूँ, कभी लगाऊँ छाती।
क्या सखि, साजन? ना सखि, पाती।

रातों में सुख से भर देता।
दिन में नहीं कभी सुधि लेता।
फिर भी मुझे बहुत ही प्यारा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, तारा।

मुझे देखकर लाड़ लड़ाये।
मेरी बातों को दोहराये।
मन में मीठे सपने बोता।
क्या सखि, साजन? ना सखि, तोता।

सबके सन्मुख मान बढ़ाये।
गले लिपटकर सुख पंहुचाये।
मुझ पर जैसे जादू डाला।
क्या सखि, साजन? ना सखि, माला।

जब आये तब खुशियाँ लाता।
मुझको अपने पास बुलाता।
लगती मधुर मिलन की बेला।
क्या सखि, साजन? ना सखि, मेला।

पाकर उसे फिरूँ इतराती।
जो मन चाहे सो मैं पाती।
सहज नशा होता अलबत्ता ।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सत्ता।

मैं झूमूँ तो वह भी झूमे।
जब चाहे गालों को चूमे।
खुश होकर नाचूँ दे ठुमका।
क्या सखि, साजन? ना सखि, झुमका।

वह सुख की डुगडुगी बजाये।
तरह तरह से मन बहलाये।
होती भीड़ इकट्ठी भारी।
क्या सखि, साजन? नहीं, मदारी।

जब आये, रस-रंग बरसाये।
बार बार मन को हरसाये।
चलती रहती हँसी-ठिठोली।
क्या सखि, साजन? ना सखि, होली।

मेरी गति पर खुश हो घूमे।
झूमे, जब जब लहँगा झूमे।
मन को भाये, हाय, अनाड़ी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, साड़ी।

बिना बुलाये, घर आ जाता।
अपनी धुन में गीत सुनाता।
नहीं जानता ढाई अक्षर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, मच्छर।

रंग-रूप पर वह बलिहारी।
प्रेम लुटाता बारी बारी।
रस का लोभी करता दौरा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, भौंरा।

उससे जीवन सुखमय चलता।
वह न रहे तो जीवन खलता।
कैसे कहूँ कि रिश्ता कैसा।
क्या सखि, प्रेमी? ना सखि, पैसा।

करता हरित, लुटा खुशहाली।
भरता मन की गागर खाली।
मेरे लिए बहुत मनभावन।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सावन।

मेरे आगे पीछे फिरता।
जैसा चाहूँ, वैसा करता।
मेरा मन मोहे, मृदुभाषी।
क्या सखि, साजन? ना, चपरासी।

गले लिपट अतिशय सुख देती।
तन-मन खुशबू से भर देती।
रूप सुहावन, भोला भाला।
क्या सखि, बिटिया? ना सखि, माला।

करता रहता काम अमानी।
जब माँगूँ तब लाये पानी।
चिकना सिर है, मुख है छोटा।
क्या सखि, नौकर? ना सखि, लोटा।

आलिंगन में वह भर लेती।
तन मन दोनों को सुख देती।
रहती है बनकर हमजोली।
क्या सखि, माँ है? ना सखि, चोली।

जब जब आती दुःख से भरती।
पति के रुपये पैसे हरती।
उसकी आवक रास न आई।
क्या सखि, सौतन? ना, महँगाई।

उस पर मोहित दुनिया सारी।
उस बिन चले न दुनियादारी।
उससे मिलती, हिम्मत भारी।
क्या प्रिय, रुपया? ना प्रिय, नारी।

गोल गोल है, सबका प्यारा।
जो भी देखे लगे दुलारा।
जिसे न भाये, मूरख बंदा।
क्या सखि, सिक्का? ना सखि, चंदा।

दुनिया भर में मान बढ़ाये।
भाग्यवान ही उसको पाये।
मन्दभाग्य जो करे अनिच्छा।
क्या सखि, कुर्सी? ना सखि, शिक्षा।

साथ मिले तो साथी झूमे।
पागल करके धरती चूमे।
और अकल पर डाले ताला।
क्या सखि, जोकर? ना सखि, हाला।

जब भी चाहूँ, हाट कराता।
सारी चीजें खुद ही लाता।
हाथ पकड़कर चलता छैला।
क्या सखि, साजन? ना सखि, थैला।

सखि, उसका तन बड़ा गठीला।
पर अंदर से बड़ा रसीला।
सिर पर पगड़ी, हाथ न पन्ना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, गन्ना।

जब जब उसको विरह सताये।
पी, पी कहकर वह चिल्लाये।
सखि, न लगाना उसको पातक।
क्या सखि, विरहिन? ना सखि, चातक।

भ्रम में डाले, कुछ उलझाये।
खुशियाँ बाँटे, मन बहलाये।
क्या बतलाऊँ तुम्हें, सहेली।
क्या सखि, छलिनी? नहीं, पहेली।

उसको ऊँचा रहना भाये।
पिट कर भी मृदु बोल सुनाये।
किया न अब तक झगड़ा-टंटा।
क्या सखि, मुर्गा? ना सखि, घंटा।

जो पा जाते भाग्य सराहें।
बालक-वृद्ध, रंक-नृप चाहें।
शादी हो या मातमपुर्सी।
क्या सखि, खाना? ना सखि, कुर्सी।

मुझे देखकर सैन चलाता।
इत उत गर्दन को मटकाता।
तब भागे जब आये गुल्लू।
क्या सखि, साजन? ना सखि, उल्लू।

सखि, वह रहता मस्त मलंगा।
साथ निभाए जब हो दंगा।
गाड़े सदा विजय का झंडा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, डंडा।

गर्मी हो या धूप सताये।
उसका संग साथ मन भाये।
बन जाता वह सुख का दाता।
क्या सखि, शर्बत? ना सखि, छाता।

आती पास और पग छूती।
सखि, उससे मिलती मजबूती।
फिर भी कभी न कीमत कूती।
क्या सखि, वधु है? ना सखि, जूती।

लम्बा-चैड़ा, दृढ़, मस्ताना।
खूब घूमना, जमकर खाना।
बस, अमीर का बनता साथी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, हाथी।

घर की पहरेदारी करता।
कोई आये, कभी न डरता।
कभी न रखता डंडा-भाला।
क्या सखि, कुत्ता? ना सखि, ताला।

जो मैं देती, वह रख लेती।
जब भी मांगूँ, वापिस देती।
लम्बी चैड़ी, फिर भी प्यारी।
क्या सखि, दासी? ना, अलमारी।

भूख लगे स्मृति में आता।
जो कुछ चाहो वही पकाता।
बना रसोईघर का दूल्हा।
क्या बाबर्ची, ना सखि, चूल्हा।

चिकना है वह मन को भाये।
रोज काम में हाथ बटाये।
किन्तु सहेली, वह है टकला।
क्या सखि, साजन? ना सखि, चकला।

जैसा बोलूँ वैसा बोले।
मेरे मन में मिश्री घोले।
प्यार नहीं कम उससे होता।
क्या सखि, बेटा? ना सखि, तोता।

हर दिन आकर मुझे जगाता।
मैं निःशब्द कि इतना भाता।
ख्वाबों से भरता मन मेरा।
क्या सखि, प्रियतम? नहीं, सवेरा।

धन, आभूषण, सुख से भरता।
मुझको मन की रानी करता।
मुझ पर करता जादू अपना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सपना।

द्वारे आकर नित्य पुकारे।
मैं भी दौड़ी आऊँ द्वारे।
प्रेम-पयोधर, परम वियोगी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, जोगी।

होठों को छू मान बढ़ाये।
भरी सभा में प्यार जताये।
गुड़-गुड़-गुड़-गुड़ मारे तुक्का।
क्या सखि, साजन? ना सखि, हुक्का।

कमर पकड़ता, टाँगे छूता।
घूमे चारों ओर निपूता।
रूठे छूटे, पड़ता मँहगा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, लहँगा।

उसको पाना कौन न चाहे।
जो भी पाये, भाग्य सराहे।
पाकर कभी न चाहे खोना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सोना।

गोरी चिट्टी या हो काली।
नखरे करे कि भोली भाली।
मन में भरती वह खुशहाली।
क्या वह पत्नी? ना रे साली।

यौवन के सारे रस लेता।
चूम चूम पागल कर देता।
प्रेम-पिपासा, करता दौरा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, भौंरा।

दुनिया भर की बात बताये।
तरह तरह से वह समझाये।
उसके बिना जिंदगी थोथी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, पोथी।

उसके आते रौनक आये।
वह जाये तो कुछ न सुहाये।
उससे सर्दी गर्मी टली।
क्या सखि, साजन? ना सखि, बिजली।

जो मैं बोलूँ वैसा बोले।
मुझे देखकर खुश हो डोले।
घर छोड़े पर सगा न होता।
क्या सखि, प्रेमी? ना सखि, तोता।

तन को मन को ताकत देती।
बहु बाधाएँ झट हर लेती।
हुलसाती मन हुलसी हुलसी।
क्या सखि, माता? ना सखि, तुलसी।

वह आये तो तन मन हरसे।
चारों ओर रंग रस बरसे।
सबको भाती हँसी-ठिठोली।
क्या सखि, जोकर? ना सखि, होली।

लोहू-प्यासा, दुःख का दाता।
मौका पाकर खूब सताता।
हिंसक बातें अक्षर अक्षर।
क्या सखि, कातिल? ना सखि, मच्छर।

धूप देखकर रूप दिखाता।
संग साथ में दौड़ लगाता।
गायब होता पाकर छाया।
सखी, पसीना? ना सखि, साया।

कातर स्वर में माँगे खाना।
हर दिन आना, हर दिन जाना।
दुःख देती उसकी लाचारी।
क्या सखि, पशुधन? नहीं, भिखारी।

उसकी काठी भय से भरती।
देह छरहरी करतब करती।
उसने गाड़ा अपना झंडा।
क्या सखि, पट्ठा? ना सखि, डंडा।

उन्हें देख सब जय जय बोलें।
अपने मन की गठरी खोलें।
दर्शन कर मन होता चंगा।
क्या सखि, राजा? ना सखि, गंगा।

मेरे तन की भूख मिटाये।
मेरी खातिर जल जल जाये।
किन्तु नहीं बन पाया दूल्हा।
क्या सखि, प्रेमी? ना सखि, चूल्हा।

बिठा पीठ पर सुख पहुँचाता।
मुझको लेकर दौड़ लगाता।
ना शर्माता, ना डर थोड़ा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, घोड़ा।

क्या बतलाऊँ सखि उसके ढंग।
निर्भय लेटे वह प्रियतम संग।
कभी न खाती माल-मिठाई।
क्या सखि, सौतन? नहीं, चटाई।

कभी पकड़ता वह बालों को।
कभी चूम लेता गालों को।
मैं खुश होकर देती ठुमका।
क्या सखि, साजन? ना सखि, झुमका।

मैं उसकी बाँहों में सोती।
मीठे मीठे स्वप्न सँजोती।
सखी, अधूरा बिन उसके घर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, बिस्तर।

दिन या रात कभी आ जाता।
मेरे मन को पंख लगाता।
मुझ पर करता जादू अपना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सपना।

आग ताप से कभी न डरता।
सास बहू के मन की करता।
दृढ़ शरीर पर रहता सिमटा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, चिमटा।

गर्मी हो या बारिश आये।
हाथ पकड़ कर साथ निभाये।
मेरे सुख दुःख सहता जाता।
क्या सखि, साजन? ना सखि, छाता।

जब चाहूँ तब सैर कराती।
गाने गाकर मन बहलाती।
कभी न मांगे गहने साड़ी।
क्या सखि, दासी? ना सखि, गाड़ी।

जल ले घूमे निपट अनाड़ी।
कभी भिगोये चोली-साड़ी।
लगता फिर भी वह मनभावन।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सावन।

रूप रंग की बोले तूती।
मीठी लगती जब मुँह छूती।
सुख से भरती उसकी टक्कर।
क्या सखि, गणिका? ना सखि, शक्कर।

चमकीले मुख का आकर्षण।
करे दूर से सुख का वर्षण।
कभी न होगा मिलन हमारा।
क्या सखि, प्रेमी? ना सखि, तारा।

कभी बने वह शहद सरीखी।
कभी जहर सी लगाती तीखी।
वह दुःखदाता, वह कल्याणी।
क्या सखि, औषधि? ना सखि, वाणी।

जहाँ चलूँ मैं साथ घूमता।
चाटुकार सा पैर चूमता।
छोड़ूँ उसे न मेरा बूता।
क्या प्रिय, नौकर? ना प्रिय, जूता।

देह विशाल समुन्नत माथा।
मस्त चाल अचरज सी गाथा।
साथ निभाये बनकर साथी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, हाथी।

मोटा पेट, गला है छोटा।
पानी देता भर भर लोटा।
परिचित हो या भूला भटका।
क्या सखि, साजन? ना सखि, मटका।

नजर गिरे तब नजर मिलाये।
कान पकड़ संसार दिखाये।
उसका होना एक करिश्मा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, चश्मा।

उसके बिना लगे जग सूना।
मन में जोश भरे वह दूना।
नहीं किसी में बल उस जैसा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, पैसा।

घर आँगन में चहक महक कर।

मन में मोद भरे रह रह कर ।
प्यारी, सुखद, खुशी की पेटी।
क्या सखि, चिड़िया? ना सखि, बेटी।
काला है पर फिर भी भाता।
वह आँखों में बस बस जाता।
आह भरें जन, होते पागल।
क्या सखि, साजन? ना सखि, काजल।

गोल मटोल बहुत ही प्यारा।
भर देता मन में उजियारा।
उसको साथ देख खुश होती।
क्या सखि, साजन? ना सखि, मोती।

उसके बल पर मैं सब करती।
सच कहने से कभी न डरती।
वह अपना है उससे क्या डर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, ईश्वर।


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