इन्द्रधनु रौंदे हुये ये - 'अज्ञेय' | Indradhanu Raunde Hue Ye - 'Agyeya'

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Sachchidananda-Hirananda-Vatsyayan-Agyeya
इन्द्रधनु रौंदे हुये ये - 'अज्ञेय' | Indradhanu Raunde Hue Ye - 'Agyeya' (toc)

1. यही एक अमरत्व है - 'अज्ञेय'

ना, ना; फेर नहीं आतीं ये सुन्दर रातें, ना ये सुन्दर दिन!

नहीं बाँध कर रक्खा जाता, छोटा-सा पल-छिन।
चढ़ डोले पर चली जा रही, काल की दुलहिन।

साथी, उसी गैल में तुम स्वेच्छा से अपना घोड़ा डाल दो,
यह जो अप्रतिहत संगीत है तुम भी उस पर ताल दो।

यह सुन्दर है, यह शिव है,
यह मेरा हो, पर बँधा नहीं है मुझसे, निजी धर्म के मर्त्य है।
जीवन नि:संग समर्पण है, जीवन का एक यही तो सत्य है।

जो होता है जब होता है तब एक बार ही
सदा के लिए हो जाता है: यही एक अमरत्व है।
क्षण-क्षण जो मरता दिखता है अविरल अन्त:सत्त्व है।

जीवन की गति धारा है यह एक लड़ी है-क्रम तो अनवच्छिन्न है,
हर क्षण आगे-पीछे बँधा हुआ है, इसी लिए पर अद्वितीय है, भिन्न है।

पर मनुष्य से नहीं कहीं कुछ: इसी तर्क से जीवन स्वत: प्रमाण है।
दो, दो, खुले हाथ से दो: कि अस्मिता विलय एक मात्र कल्याण है।

ना, कुछ फेर नहीं आने का, साथी, ना ये दिन, ना रात,
फेर नहीं खिलने वाले हैं
एक अकेली सरसी के ये अद्वितीय जलजात।

इसे मान लो: तदनन्तर यदि रुकना चाहो रुक लो,
विलमाने में रस लो।
या फिर हँसने का ही मन हो तो वह हँसी दिव्य है:
हँस लो।

दिल्ली, 22 जनवरी, 1954

2. सत्य तो बहुत मिले - 'अज्ञेय'

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले ।

कुछ नये कुछ पुराने मिले
कुछ अपने कुछ बिराने मिले
कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले
कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले
कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले
कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।

कुछ ने लुभाया
कुछ ने डराया
कुछ ने परचाया-
कुछ ने भरमाया-
सत्य तो बहुत मिले
खोज़ में जब निकल ही आया ।

कुछ पड़े मिले
कुछ खड़े मिले
कुछ झड़े मिले
कुछ सड़े मिले
कुछ निखरे कुछ बिखरे
कुछ धुँधले कुछ सुथरे
सब सत्य रहे
कहे, अनकहे ।

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले
पर तुम
नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम
मोम के तुम, पत्थर के तुम
तुम किसी देवता से नहीं निकले:
तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले
मेरे ही रक्त पर पले
अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती
मेरी अशमित चिता पर
तुम मेरे ही साथ जले ।

तुम-
तुम्हें तो
भस्म हो
मैंने फिर अपनी भभूत में पाया
अंग रमाया
तभी तो पाया ।

खोज़ में जब निकल ही आया,
सत्य तो बहुत मिले-
एक ही पाया ।

काशी (रेल में), 15 फरवरी, 1954

3. पुनर्दर्शनीय - 'अज्ञेय'

कब, कहाँ, यह नहीं। जब भी जहाँ भी हो जाए मिलना।
केवल यह: कि जब भी मिलो तब खिलना।

दिल्ली, 6 मार्च, 1954

4. टेसू

ग्रीष्म तो न जाने कब आएगा!
लू के दुर्दम घोड़े पर वह अनलोद्भव अवतार-पुरुष
कब आ कर धरती को तपाएगा

उस ताप से जिस से वह तप:पूत, तप:कृशा
फिर माँग सके, सह सके वह पावस की मिलन-निशा
जिस में नव मेघ-दूत शावक-सा
आ कर अदम्य जीवन के द्रावक सँदेसे से उसे हुलसाएगा-
ग्रीष्म तो न जाने कब आएगा!

तब तक मैं उस का एक अकिंचन अग्रदूत
अपनी अखंड आस्था के साक्ष्य-रूप
मश्शाल जला दूँ-
न सही क्षयग्रस्त नगर में-
इस वनखंडी में आग लगा दूँ।

नागपुर-जबलपुर (मोटर में), 17 मार्च, 1954

5. मरु और खेत - 'अज्ञेय'

मरु बोला: हाय यह हास्यास्पद ममता!
ओ रे खेत, किस हेतु यह यत्न, यह उथल-पुथल,
यह-कह ही डालूँ-आडम्बर?
देखना-जब बहेगी लू, जब पड़ेगा पाला,
जब आएगी बर्फ की बर्छियों से हाड़ों को भेदती-सी
उत्तर की निष्ठुर हवा,
झुलसेंगे, पाले से मरेंगे तुम्हारे पात-पात अंकुर,
तब कैसे दर्द होगा!
मेरी-मुझ अचंचल को देखो; मेरी यह सीख है:
ममता की सर्वदु:ख-मूल है
बीज मात्र वेदना का बीज है!

हँसा खेत: मरु काका, ठीक है। होगा वही
लू बहेगी, पाला भी पड़ेगा-दु:ख होगा ही।
किन्तु जब मेरी छाती फोड़ कर अंकुर एक फूटेगा
और भोली गर्व-भरी आस्था से निहारेगा,
तब-उस एक मात्र क्षण में-किन्तु काका, आप से क्या कहूँ और...
नव-सर्जन में जो अपने को होम कर होते हैं आनन्दमग्न
उन की तो दृष्टि और होती है!

इलाहाबाद-दिल्ली (रेल में), 18 मार्च, 1954

6. इतिहास का न्याय - 'अज्ञेय'

जो जिये वे ध्वजा फहराते घर लौटे
जो मरे वे खेत रहे।

जो झूमते नगर लौटे, डूबे जय-रस में।
(खँडहरों के प्रेत और कौन हैं-
जिन के मुड़े हों पैर पीछे को?)

जो खेत रहे थे, वे अंकुरित हुए
इतिहासों की उर्वर मिट्टी में,
कुसुमित पल्लवित हुए स्वप्न-कल्पी लोक-मानस में।

दिल्ली, 18 मार्च, 1954

7. शाश्वत संबंध - 'अज्ञेय'

क्रमश: मृत्यु भी सत्य ही है; उसे हम छोड़ नहीं सकते।

हाँ, शिवता सुन्दरता हम उसे दे सकते हैं,
अभी किन्तु जीवन: अन्तहीन तपस्या जिस से हम
मुँह मोड़ नहीं सकते।

यह सम्बन्ध (या विपर्यास?) शाश्वत है क्यों कि इसे
हम चाहे अर्थ में ले सकते हैं।

दिल्ली, 19 मार्च, 1954

8. चातक पिउ बोलो - 'अज्ञेय'

चातक पिउ बोलो बोलो!

झम-झम-झम पानी सुन-सुन रात बिहानी
दिग्वधु! घूँघट खोलो खोलो!

नभ खुल-खुल खिल आया भू-पट हरियाया
मन-विहग! पंख तोलो तोलो!

दिल्ली, 10 मई, 1954

9. रेंक - 'अज्ञेय'

रेंक रे रेंक गधे रेंक रे रेंक!
कुटिया के पीछे का आँगन डेढ़ बित्ते का
छेंक ले छेंक गधे रेंक रे रेंक!

रेंक रे रेंक गधे रे रेंक
अपने ही रूप पर होता लोट-पोट, टाँगें
नभ ही ओर फेंक रे फेंक
गधे, ऊँट का साक्ष्य क्या? रेंक रे रेंक!

अन्योक्ति? ऊँह, होगी: गधा होगा सो होगा,
पर बोलिए, ऊँट क्या आप हैं?

दिल्ली, 13 जून, 1954

10. साँप - 'अज्ञेय'

साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ--(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना--
विष कहाँ पाया?

दिल्ली, 15 जून, 1954

11. शब्द - 'अज्ञेय'

किसी को शब्द हैं कंकड़:
कूट लो, पीस लो, छान लो, डिबियों में डाल दो
थोड़ी-सी सुगन्ध दे के कभी किसी मेले के रेले में
कुंकुम के नाम पर निकाल दो।

किसी को शब्द हैं सीपियाँ:
लाखों का उलट-फेर, कभी एक मोती मिल जाएगा:
दूसरे सराहेंगे-डाह भी करेंगे कोई
पारखी स्वयं को मान पाएगा।

किसी को शब्द हैं नैवेद्य।
थोड़ा-सा प्रसादवत्, मुदित, विभोर वह पाता है।
उसी में कृतार्थ, धन्य, सभी को लुटाता है
अपना हृदय
वह प्रेममय।

दिल्ली, 21 जून, 1954

12. एक रोगिणी बालिका के प्रति - 'अज्ञेय'

सीखा है तारे ने उमँगना जैसे धूप ने विकसना
हरी घास ने पैरों में लोट-लोट बिछलना-विलसना,
और तुम ने-पगली बिटिया-हँसना, हँसना, हँसना,
सीखा है मेरे भी मन ने उमसना, मेरी आँखों ने बरसना,
और मेरी भावना ने
आशीर्वाद के सुवास-सा तुम्हारे आस-पास बसना!

दिल्ली, सितम्बर, 1954

13. एक मंगलाचरण - 'अज्ञेय'

भावों का अनन्त क्षीरोदधि शब्द-शेष फैले सहस्र-फण,
एक अर्थ से तुम हो अच्युत, मुझ को भी दे दो करुणा-कण!

दिल्ली (बस में), 19 सितम्बर, 1954

14. मैं वहाँ हूँ - 'अज्ञेय'

दूर दूर दूर...मैं वहाँ हूँ!

यह नहीं कि मैं भागता हूँ:
मैं सेतु हूँ-जो है और जो होगा दोनों को मिलाता हूँ-
मैं हूँ, मैं यहाँ हूँ, पर सेतु हूँ इसलिए
दूर दूर दूर...मैं वहाँ हूँ!

यह जो मिट्टी गोड़ता है, कोदई खाता है और गेहूँ खिलाता है
उस की मैं साधना हूँ।

यह जो मिट्टी फोड़ता है, मडिय़ा में रहता है और महलों को बनाता है
उसी की मैं आस्था हूँ।

यह जो कज्जल-पुता खानों में उतरता है
पर चमाचम विमानों को आकाश में उड़ाता है,
यह जो नंगे बदन, दम साध, पानी में उतरता है
और बाज़ार के लिए पानीदार मोती निकाल लाता है,
यह जो कलम घिसता है, चाकरी करता है पर सरकार को चलाता है
उसी की मैं व्यथा हूँ।

यह जो कचरा ढोता है,
यह झल्ली लिये फिरता है और बेघरा घूरे पर सोता है,
यह जो गदहे हाँकता है, यह तो तन्दूर झोंकता है,
यह जो कीचड़ उलीचती है,
यह जो मनियार सजाती है,
यह जो कन्धे पर चूडिय़ों की पोटली लिये गली-गली झाँकती है,
यह जो दूसरों का उतारन फींचती है,
यह जो रद्दी बटोरता है,
यह जो पापड़ बेलता है, बीड़ी लपेटता है, वर्क कूटता है,
धौंकनी फूँकता है, कलई गलाता है, रेढ़ी ठेलता है,
चौक लीपता है, बासन माँजता है, ईंटें उछालता है,
रूई धुनता है, गारा सानता है, खटिया बुनता है
मशक से सड़क सींचता है,
रिक्शा में अपना प्रतिरूप लादे खींचता है,
जो भी जहाँ भी पिसता है पर हारता नहीं, न मरता है-
पीडि़त श्रमरत मानव
अविजित दुर्जेय मानव
कमकर, श्रमकर, शिल्पी, स्रष्टा-
उस की मैं कथा हूँ।

दूर दूर दूर...मैं वहाँ हूँ-
यह नहीं कि मैं भागता हूँ:
मैं सेतु हूँ-जो है और जो होगा, दोनों को मिलाता हूँ-
पर सेतु हूँ इस लिए
दूर दूर दूर...मैं वहाँ हूँ।

किन्तु मैं वहाँ हूँ तो ऐसा नहीं है कि मैं यहाँ नहीं हूँ।
मैं दूर हूँ, जो है और जो होगा उस के बीच सेतु हूँ
तो ऐसा नहीं है कि जो है उसे मैं ने स्वीकार कर लिया है।
मैं आस्था हूँ तो मैं निरन्तर उठते रहने की शक्ति हूँ,
मैं व्यथा हूँ तो मैं मुक्ति का श्वास हूँ,
मैं गाथा हूँ तो मैं मानव का अलिखित इतिहास हूँ,
मैं साधना हूँ तो मैं प्रयत्न में कभी शिथिल न होने का निश्चय हूँ,
मैं संघर्ष हूँ जिसे विश्राम नहीं,
जो है मैं उसे बदलता हूँ,
जो मेरा कर्म है, उस में मुझे संशय का नाम नहीं
वह मेरा अपनी साँस-सा पहचाना है,
लेकिन घृणा-घृणा से मुझे काम नहीं
क्यों कि मैं ने डर नहीं जाना है।
मैं अभय हूँ,
मैं भक्ति हूँ,
मैं जय हूँ।

दूर दूर दूर...मैं सेतु हूँ,
किन्तु शून्य से शून्य तक का सतंरगी सेतु नहीं,
वह सेतु, जो मानव से मानव का हाथ मिलने से बनता है,
जो हृदय से हृदय को, श्रम की शिखा से श्रम की शिखा को,
कल्पना के पंख से कल्पना के पंख को,
विवेक की किरण से विवेक की किरण को,
अनुभव के स्तम्भ से अनुभव के स्तम्भ को मिलाता है
जो मानव को एक करता है,
समूह का अनुभव जिस की मेहराबें हैं
और जन-जीवन की अजस्र प्रवाहमयी नदी जिसके नीचे से बहती है
मुड़ती, बल खाती, नये मार्ग फोड़ती, नये कगारे तोड़ती,
चिर परिवर्तनशीला, सागर की ओर जाती, जाती, जाती...
मैं वहाँ हूँ-दूर, दूर, दूर!

दिल्ली (बस में), 20 सितम्बर, 1954

15. इतिहास की हवा - 'अज्ञेय'

(1)
झरोखे में से बहती हवा का एक झोंका इतराता आता है
और इतिहास के पन्नों को उड़ाता चला जाता है
दिक्चक्रवाल से सिमट कर चाँदनी झरोखे से झरती हुई
बिल्लौर-सी जम जाती है।

जमी हुई चाँदनी के झलमलाते ताजमहल के नीचे
बागडिय़ों के झोंपड़ों के छप्पर उभर आते हैं
जिन के खर के आरी सरीखे किनारे मानो आँखों की कोरों को
चीर जाते हैं-
और छप्पर की छत पर बैठी एक भैंस पागुर कर रही है।

इतिहास के पन्नों पर पगुराती हुई भैंस की आँखों में
इतिहास के और पन्ने हैं।
और उन में इतराती हुई बहकी हवाओं के दूसरे झोंके।
बागडिय़ों के झोंपड़ों से झाँकते हैं जाने कितने चापहीन एकलव्य:
भैंस की आँखें मानो द्रोण की मिट्टी की मूरतें हैं।

ताजमहल के शिल्पियों के हाथ कटवा दिये गये थे,
द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अँगूठा माँग लिया था,
अभिनव द्रोण किन्तु कहता है:
'वत्स, वीर,
धरो चाप, साधो तीर, धरती को विद्ध करो-
अमृत-सा कूप-जल यहीं फूट निकले!'
और फिर चुपके से एकलव्य के नये कुएँ में भाँग डाल देता है।
(एकलव्य एक है
और आज आस्था भी उस में क्या जाने कहीं कम हो-
क्या जाने वह अँगूठा भी दे न दे-
पर कुएँ का पानी तो समाज पिएगा!)

असंख्य झोंपडिय़ों से असंख्य बागडिय़े एकलव्य
आते हैं, कमान तानते हैं, तीर साधते हैं,
कुएँ से पानी पीते हैं,
और फिर कहते हैं: धन्य, धन्य, गुरुदेव,
आपने अगूँठा नहीं माँगा जो:
पितरों को नहीं तो हम क्या दिखाते?
लीजिए: हमारे संस्कार हम देते हैं,
पुरखों के झोंपड़ों में आग हम लगाते हैं, घर-घर का भेद हम लाते हैं।
अपने को पराया नहीं, आप का!-बनाते हैं,
तनु हमें छोडि़ए, मन आप लीजिए,
आत्मा तो होती ही नहीं, धनु हमें दीजिए।
दिग्बोध हम मिटा देंगे, दिग्विजय आप कीजिए।

द्रोणचार्य आँखों में भाँग भर
झोंपड़े से ऊँचा उठाते हैं वरद कर,
भैंस भाँग खाती है
और सारे एकलव्य उस की आँखों में समा जाते हैं।

(2)
दिक्चक्रवाल से सिमट कर चाँदनी झरोखे से झरती हुई
बिल्लौर-सी जम जाती है:
बिल्लौर-सी, जिस में पहाड़ी झील का अपलक पानी है
नभ की ओर उठी हिमालय की अपलक गीली आँख का
जिस में मुनिवृन्द तपस्या में रत हैं
और उन की पोष्य राजहंसावलियाँ अविराम
नीर-क्षीर विविक्त करती विचरती हैं।

नहीं नहीं नहीं! ये हंसावलियाँ नहीं, ये ब्रह्मपुत्र की मछलियाँ हैं
जिन्हें चीनी सिपाहियों ने डायनामाइट लगा कर सन्न कर दिया है:
ये हज़ारों मछलियों की चिट्टी-चिट्टी पेटियाँ हैं जो धीरे-धीरे प्राणहीन
हो कर फूल जाएँगी
क्योंकि सिपाहियों को एक-आध मछली की भूख थी:
नहीं नहीं नहीं! ये हज़ारों मछलियों की हज़ारों उलटी हुई चिट्टी पेटियाँ
बिकिनी से बह कर आयी हुई प्रशान्त सागर की सम्पदा हैं
जिसे अमरीकियों ने विस्फोटित अणु की विकिरित शक्ति से
दूषित कर दिया है!
ये हंसावलियाँ नीर-क्षीर नहीं
अन्त-हीन सागर में विष-वपन कर रही हैं।

भैंस की आँखें-पहाड़ी झील का अपलक पानी-
हंसावलियाँ-मछलियाँ
इतिहास के धुँधुआते छप्परों और उड़ते हुए पन्नों पर
टाँके गये बिम्ब, प्रतीक, रूपक, संकेत!
क्योंकि ये झुंड के झुंड चिट्टे-चिट्टे गाले
वास्तव में हमारे उन किशोर शिक्षार्थी बालकों के विश्वास-भरे
चमकते चेहरों की
सहसा विजडि़त की गयी आँखें हैं
जिन के नैतिक मान हम ने आधुनिकता के विस्फोट में उड़ा दिये
और जिन के शिक्षा-स्रोत हम ने वशातीत विषों से दूषित कर दिये हैं।

क्या यह फूटा अणु हमारा व्यक्तित्व है?
हमारी आत्मा
हमारी इयत्ता है?

(3)
झरोखे में से बहकी हवा का एक झोंका इतराता हुआ आता है
और इतिहास के पन्नों को उड़ाता बिखेरता चला जाता है
दिक्चक्रवाल से सिमट कर चाँदनी झरोखे से झरती हुई
जम जाती है: वह एक स्फटिक का मुकुर है
जिस में मैं अपना चेहरा देख सकता हूँ।

मेरे चेहरे में बागडिय़ों के झोंपड़ों से झाँकता है एकलव्य,
द्रोणाचार्य अभिसन्धि करते हैं
मुनियों की व्याजहीन आँखों में पोष्य राजहंस-माला नीर-क्षीर करती है।
लाख-लाख मछलियाँ पेटियाँ उलट कर दम तोड़ देती हैं:
मेरे चेहरे में भोले बालकों का भवितव्य का विश्वास है।

स्फटिक के मुकुर में मैं अपना चेहरा देख सकता हूँ:
लेकिन क्या वह चेहरा माँगा हुआ चेहरा है
और क्या मुझे लौटा देना होगा?

क्या जीवन-पिंड और कीड़े-मकोड़े, केंचुए-केकड़े,
विषैले-वनैले हिंस्र जन्तु से मानव तक की विकास-परम्परा
माँगी हुई है और मुझे लौटा देनी होगी?
क्या यह भोले बालकों के भवितव्य का विश्वास माँगा हुआ विश्वास है?
क्या यह इतिहास माँगा हुआ इतिहास है
क्या यह विवेक का मुकुर लौटा देना होगा
इस से पहले कि वह टूट जाय?

मुकुर उत्तर नहीं देता:
न दे, मुकुर उत्तरदायी नहीं है।
इतिहास उत्तर नहीं देता, इतिहास भी उत्तरदायी नहीं है:
परम्परा भी उत्तरदायी नहीं है। चेहरा भी उत्तरदायी नहीं है।
पर झरोखे में से इतराता हुआ बहकी हवा का झोंका पूछता है:
मैं, मैं, क्या मैं भी उत्तरदायी नहीं हूँ?
इतिहास के प्रति, चेहरे के प्रति,
परम्परा के प्रति, मुकुर के प्रति-
बालकों के भवितव्य के भोले विश्वास के प्रति
क्या मैं उत्तरदायी नहीं हूँ?

दिल्ली (बस में), 6 अक्टूबर, 1954

16. क्योंकि तुम हो - 'अज्ञेय'

मेघों को सहसा चिकनी अरुणाई छू जाती है
तारागण से एक शान्ति-सी छन-छन कर आती है
क्यों कि तुम हो।

फुटकी की लहरिल उड़ान
शाश्वत के मूक गान की स्वर लिपि-सी संज्ञा के पट पर अँक जाती है
जुगनू की छोटी-सी द्युति में नये अर्थ की
अनपहचाने अभिप्राय-सी किरण चमक जाती है
क्यों कि तुम हो।

जीवन का हर कर्म समर्पण हो जाता है
आस्था का आप्लवन एक संशय के कल्मष धो जाता है
क्यों कि तुम हो।

कठिन विषमताओं के जीवन में लोकोत्तर सुख का स्पन्दन मैं भरता हूँ
अनुभव की कच्ची मिट्टी को तदाकार कंचन करता हूँ
क्यों कि तुम हो।

तुम तुम हो; मैं-क्या हूँ?
ऊँची उड़ान, छोटे कृतित्व की लम्बी परम्परा हूँ,
पर कवि हूँ स्रष्टा, द्रष्टा, दाता:
जो पाता हूँ अपने को भी कर उसे गलाता-चमकाता हूँ
अपने को मट्टी कर उस का अंकुर पनपाता हूँ
पुष्प-सा, सलिल-सा, प्रसाद-सा, कंचन-सा, शस्य-सा, पुण्य-सा,
अनिर्वच आह्वाद-सा लुटाता हूँ
क्यों कि तुम हो।

दिल्ली-इलाहाबाद (रेल में), 18 अक्टूबर, 1954

17. गोवर्धन - 'अज्ञेय'

कल जो जला रहे थे दीप
आज संलग्न-भाव से माँज रहे हैं फर्श
कि कैसे दा ग तेल के छूटें।

कल घर में दीवाली थी,
आज गली में छोकरे कर रहे विमर्श
कि कैसे गल कर बही मोम वे लूटें।

कल हम पुकार कर कहते थे: 'अरे, हमें भी कोई गलबहियाँ दो!'
आज यह रटना है: 'नहीं-नहीं, यह मार्ग रपटना है
राम रे, कैसे भव-बन्धन टूटें!'

दिल्ली, 27 अक्टूबर, 1954

18. सीढ़ियाँ - 'अज्ञेय'

अम्बार है जूठी पत्तलों का: निश्चय ही पाहुने आये थे।
बिखरी पड़ी हैं डालियाँ-पत्तियाँ: किसी ने तोरण सजाये थे।

गली में मचा है कोहराम भारी: मुफ़्त का पैसा किसी ने पाया था।
उठती है आवाज तीखे क्रन्दन की: निश्चय ही कोई बहू लाया था।

दिल्ली, 27 अक्टूबर, 1954

19. अतिथि सब गए - 'अज्ञेय'

अतिथि सब गये: सन्नाटा
ज्वार आया था, गया: अब भाटा।

कुछ काम, दोस्त? हाँ, बैठो, देखो,
किस कुत्ते ने कौन पत्तल चाटा!

नयी दिल्ली, 27 अक्टूबर, 1954

20. विपर्यय - 'अज्ञेय'

जो राज करें उन्हें गुमान भी न हो
कि उनके अधिकार पर किसी को शक है,
और जिन्हें मुक्त जीना चाहिए
उन्हें अपनी कारा में इसकी ख़बर ही न हो
कि उनका यह हक़ है।

दिल्ली, 1 नवम्बर, 1954

21. हम ने पौधे से कहा - 'अज्ञेय'

हमने पौधे से कहा: मित्र, हमें फूल दो।
उस की फुनगी से चिनगियाँ दो फूटीं।
डाली से उस ने फुलझड़ी छोड़ दी:
हम मुग्ध देखते रहे कि कब कली फूटे-
कि कायश्री उस की समीरण में झूम गयी,
हमें जान पड़ा, कहीं गन्ध की फुहारें झर रही हैं
और देखा सहसा:
लच्छा-सा डोंडियों का, गुच्छा एक फूल का
हम मुग्ध ताका किये।

किन्तु हम जो देखते थे क्या वह निर्माण था?
गुच्छे हम नोच लें परन्तु वही क्या सृष्टि है?
मिट्टी के नीचे, जहाँ एक बुदबुदाता अन्धकार था
कीड़े आँख-ओट कुलबुलाते थे
रिसता था जिस की नस-नस में
मैल किस-किस का और कब-कब का
(काल की तो सीमा नहीं, देश की अगर हो
हम नहीं जानते:
और मैल दोनों का-
सीमाहीन काल का, व्यासहीन देश का-
माटी में रिसता है, मिसता है,
सोखता ही रहता है)-
मिट्टी के नीचे बुदबुदाते अन्धकार में
पौधे की जड़ क्रियमाण थी:
पौधे का हाथ? आँख? जीभ? त्वचा?
पौधे का हाथ? प्राण? चेतना?
मिट्टी के नीचे क्रियमाण थी:
पौधे की जड़: सृष्टि-शक्ति: आद्य मातृका।

ऊपर वह हँसता-सिहरता था
और हम देख-देख खिलते विहरते थे
किन्तु वह अनुपल, अनुक्षण, और और गहरे
टोहता था बुदबुदाते उस अन्धकार में:
सड़ा दे दो, गला दे दो, पचा दे दो,
कचरा दो राख दो अशुच दो उच्छिष्ट दो-
वह तो है सृजन-रत: उसे सब रस है।
उसे सब रस है
और इस हेतु (हम जानें या न जानें यही
हमें सारे फूल हैं,
घास-फूस, डाल-पात, लता-क्षुप,
ओषधि-वनस्पति, द्रुमाली, वन-वीथियाँ।
रूप-सत्य, रस-सत्य, गन्ध-सत्य,
रूप-शिव।

मित्र, हमें फूल दो-
हमने पौधे से कहा:
बन्धु, हमें काव्य दो।
किन्तु तुम (नभचारी!) मिट्टी की ओर मत देखना,
किन्तु तुम (गतिशील!) जड़ें मत छोडऩा,
किन्तु तुम (प्रकाश-सुत!) टोहना न कभी अन्धकार को,
किन्तु तुम (रससिद्ध!) कर्दम से नाता मत जोडऩा,
किन्तु तुम (स्वयम्भू!) पुष्टि की अपेक्षा मत रखना!
गहरे न जाना कहीं, आँचल बचाना सदा, दामन हमेशा पाक रखना,
पंकज-सा पंक में, कंज-पत्र में सलिल-सा
तुहिन की बूँद में प्रकम्प हेम-शिरा-सा असम्पृक्त रहना।
धाक रखना।
लाज रखना, नाम रखना, नाक रखना।

बन्धु, हमें काव्य दो,
सुन्दर दो, शिव दो, सार-सत्य दो,
किन्तु किन्तु
किन्तु किन्तु
किन्तु किन्तु-
हमने कवि से कहा।

दिल्ली, 23 नवम्बर, 1954

22. मेरे विचार हैं दीप - 'अज्ञेय'

मेरे विचार हैं दीप
मेरा प्यार? वह आकाश है ।

वे नहीं देते उसे आलोक
वह भी स्नेह उनको नहीं देता ।
अलग दोनों की इयत्ता है ।
किन्तु उन की ओट ही
गहराइयाँ उसकी झलकती हैं
और उसके सामने ही सत्य उन का रूप
दिखता है विशद
सहसा अनिर्वचनीय!

मेरा प्यार? वह आकाश है ।

दिल्ली, 21 दिसम्बर, 1954

23. तुम कदाचित न भी जानो - 'अज्ञेय'

तुम कदाचित् न भी जानो
मंजरी की गन्ध भारी हो गयी है
अलस है गुंजार भौंरे की-अलस और उदास।
क्लान्त पिक रह-रह तड़प कर कूकता है। जा रहा मधु-मास।
मुस्कराते रूप!
तुम कदाचित् न भी जानो-यह विदा है।

ओस-मधुकण: वस्त्र सारे सीझ कर श्लथ हो गये हैं।
रात के सहमे चिहुँकते बाल-खग अब निडर हो चुप हो गये हैं।
अटपटी लाली उषा की हुई प्रगल्भ, विभोर।
उमड़ती है लौ दिये की जा रहा है भोर।
ओ विहँसते रूप!
तुम कदाचित् न भी जानो-यह विदा है।

दिसम्बर, 1954

24. घुमड़न के बाद - 'अज्ञेय'

घुमड़न के बाद
अब हम फिर साथ हैं।

न जाने कैसे, प्रमादवश, थोड़ा भटक गये थे।
तभी चुपके से ऊपर काले बादल लटक गये थे।
हमारे तारे-स्थिर निष्ठावान्-कुहासे में अटक गये थे।
इतनी तो बात है।

तारे दूर हैं, बादल है चंचल: झट से घेर लेते हैं।
इसी भ्रम में हम इस गहरी सचाई से मुँह फेर लेते हैं।
कि तारे स्पर्श से भरे हैं,
ओझल हों, पर हीरे से वहीं पर धरे हैं,
और वज्र-से अमिट हैं लेखे जो उन्होंने हमारे ह्रत्पट पर उकेरे हैं
(भाग्य के नहीं, प्रत्ययों के, जो मार्ग-संगी तेरे-मेरे हैं)
यों ही हमें लगता है कि बड़ी डरावनी रात है।

मार्ग कभी धुँधला हो, दिक्चक्र थोड़े ही खो जाता है
ज्ञान अधूरा है, सही, विवेक थोड़े ही सो जाता है!
आस्था न काँपे, मानव फिर मिट्टी का भी देवता हो जाता है।
तेरा वरद, मेरा अभयद, यों हमारे साथ है।
अब हम फिर साथ हैं।

1955

25. नई कविता : एक संभाव्य भूमिका - 'अज्ञेय'

आप ने दस वर्ष हमें और दिये
बड़ी आप ने अनुकम्पा की। हम नत-शिर हैं।
हम में तो आस्था है: कृतज्ञ होते
हमें डर नहीं लगता कि उखड़ न जावें कहीं।
दस वर्ष और! पूरी एक पीढ़ी!
कौन सत्य अविकल रूप में जी सका है अधिक?

अवश्य आप हँस लें:
हँस कर देखें फिर साक्ष्य इतिहास का जिस की दुहाई आप देते हैं।
बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण को कितने हुए थे दिन
थेर महासभा जब जुटी यह खोजने कि सत्य तथागत का
कौन-कौन मत-सम्प्रदायों में बिला गया!

और ईसा-(जिन का कि एक पट्ट शिष्य ने
मरने से कुछ क्षण पूर्व ही था कर दिया प्रत्याख्यान)
जिस मनुपुत्र के लिए थे शूल पर चढ़े-
उसे जब होश हुआ सत्य उन का खोजने का
तब कोई चारा ही बचा न था
इस के सिवा कि वह खड्गहस्त दसियों शताब्दियों तक
अपने पड़ोसियों के गले काटता चले!
('प्यार करो अपने पड़ोसियों को आत्मवत्'-कहा था मसीहा ने!)

'सत्य क्या है?' बेसिनी में पानी मँगा लीजिए:
सूली का सुना के हुक्म हाथ धोये जाएँगे!
बुद्ध: ईसा: दूर हैं।

जिस का थपेड़ा स्वयं हम को न लगे वह कैसा इतिहास है?
ठीक है। आप का जो 'गाँधीयन' सत्य है
उस को क्या यही सात-आठ वर्ष पहले
गाँधी पहचानते थे?

तुलना नहीं है यह। हम को चर्राया नहीं शौ क मसीहाई का।
सत्य का सुरभि-पूत स्पर्श हमें मिल जाय क्षण-भर:
एक क्षण उस के आलोक से सम्पृक्त हो विभोर हम हो सकें-
और हम जीना नहीं चाहते:
हमारे पाये सत्य के मसीहा तो
हमारे मरते ही, बन्धु, आप बन जाएँगे!
दस वर्ष! दस वर्ष और! वह बहुत है।

हमें किसी कल्पित अमरता का मोह नहीं।
आज के विविक्त अद्वितीय इस क्षण को
पूरा हम जी लें, पी लें, आत्मसात् कर लें-
उस की विविक्त अद्वितीयता आप को, कमपि को, कखग को
अपनी-सी पहचनवा सकें, रसमय कर के दिखा सकें-
शाश्वत हमारे लिए वही है। अजर अमर है
वेदितव्य अक्षर है।

एक क्षण: क्षण में प्रवहमान व्याप्त सम्पूर्णता।
इस से कदापि बड़ा नहीं था महाम्बुधि जो पिया था अगस्त्य ने।
एक क्षण। होने का, अस्तित्व का अजस्र अद्वितीय क्षण!
होने के सत्य का, सत्य के साक्षात् का, साक्षात् के क्षण का-
क्षण के अखंड पारावार का
आज हम आचमन करते हैं। और मसीहाई?
संकल्प हम उस का करते हैं आप को:
'जम्बूद्वीपे भरतखंडे अमुक शर्मणा मया।'

इलाहाबाद, 6 फरवरी, 1955

26. साँझ : मोड़ पर विदा - 'अज्ञेय'

हाँ, यह मोड़ आ गया।
जाओ पथ के साथी,
और न बिलमो।
मेरी मंजिल अनजानी है
दूर तुम्हारी क्या कम होगी?
और न बिलमो,
जाओ पथ के साथी।

हाँ, उस आद्र भाव को रहने दो वाष्पाकुल
वह मेरा पहचाना है।
धन्यवाद का पात्र? मैं नहीं, पथ है।
पथ ने ही मुझ को प्रतिभा दी-
यह मोड़ कसक अब देगा।
और न बिलमो
जाओ, पथ के साथी।

और तुम्हारी यह अनकही आद्रता-
(इसी नदी पर तिर आती है नौका सरस्वती की)-
मुझ को देगी वाणी
और न बिलमो
जाओ।

कोई पथ का मोड़ किसी को अलग नहीं करता है
जैसे पथ का संगम मन का घटक नहीं है
और तुम्हारे लिए? धार तीक्ष्ण हो संवेदन की-
नये अरुण पथ लहरावेंगे:
किन्तु न बिलमो-
ये अनकहनी और न अब मुझ से कहलाओ-
पथ के साथी
जाओ।

रीवाँ, 21 फरवरी, 1955

27. मुझे तीन दो शब्द - 'अज्ञेय'

मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।

एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ,

और दूसरा: जिसे कह सकूँ
किन्तु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।

और तीसरा: खरा धातु, पर जिस को पा कर पूछूँ-
क्या न बिना इस के भी काम चलेगा? और मौन रह जाऊँ।

मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।

रीवाँ, 21 फरवरी, 1955

28. मैं तुम्हारा प्रतिभू हूँ - 'अज्ञेय'

मेरे आह्वान से अगर प्रेत जागते हैं, मेरे सगो, मेरे भाइयो,
तो तुम चौंकते क्यों हो? मुझे दोष क्यों देते हो?
वे तुम्हारे ही तो प्रेत हैं
तुम्हें किसने कहा था, मेरे भाइयो, कि
तुम अधूरे और अतृप्त मर जाओ?

मैं तुम्हारे साथ जिया हूँ, तुम्हारे साथ मैं ने कष्ट पाया है,
यातनाएँ सही हैं,
किन्तु तुम्हारे साथ मैं मरा नहीं हूँ
क्योंकि तुम ने तुम्हारा शेष कष्ट भोगने के लिए मुझे चुना:
मैं अपने ही नहीं, तुम्हारे भी सलीब का वाहक हूँ
जिस के आसपास तुम्हारे प्रेत मँडराते हैं
और मेरे उस प्रयास पर चौंकते हैं जिसे उन्होंने अधूरा छोड़ दिया था।

पर डरो मत, मैं मरूँगा नहीं
क्योंकि मैं अधूरा नहीं मरूँगा, अतृप्त नहीं मरूँगा।
तुम मर कर प्रेत हो सकते हो क्यों कि तुम अपने हो,
मैं नहीं मर सकता क्यों कि मैं तुम्हारा हूँ,
मैं प्रतिभू हूँ, मैं प्रतिनिधि हूँ, मैं सन्देशवाहक हूँ
मैं सम्पूर्णता की ओर उठा हुआ तुम्हारा दुर्दमनीय हाथ हूँ।

मैं तुम्हें उलाहना नहीं देता क्यों कि तुम मेरे भाई हो
पर बोलो, मेरे भाईयो, मेरे सगो, तुम अधूरे और अतृप्त क्यों मर गये
जब कि मैं तुम्हारे भी अधूरेपन और अतृप्ति को ले कर जी सका हूँ
और तुम्हारी पूर्णता और तृप्ति के लिए जीता रह सकूँगा?

मेरे आह्वान से अगर प्रेत जगते हैं
तो चौंको मत, पहचानो कि वे तुम्हारे प्रेत हैं:
उन्हें अपलक देख सकोगे तो पहचानोगे
और जानोगे कि तुम भी अभी मरे नहीं हो,
कि पाप ने तुम्हें अभिभूत किया है, जड़ किया है,
पर तुम्हारी आत्मा क्षरित नहीं हुई है।

अपने प्रेत के साथ हाथ मिला कर
तुम उस विकिरित शक्ति को फिर सम्पुंजित कर सकोगे:
वही संजीवन है
वही सम्पृक्ति है
वही मुक्ति है।

मेरे भाइयो, मेरे सगो, मेरे आह्वान से चौंको मत,
मैं तुम्हारा प्रतिभू हूँ
मुझ में जिस दायित्व का तुमने न्यास किया था
उस से मुझे मुक्त करो, और मेरे साथ मुक्त हो जाओ, मेरे भाइयो!

दिल्ली (बस में), 19 मार्च, 1955

29. ओ लहर - 'अज्ञेय'

जिधर से आ रही है लहर
अपना रुख़ उधर को मोड़ दो
तट से बाँधती हैं जो शिराएँ मोह उन का छोड़ दो,
वक्ष सागर का नहीं है राजपथ:
लीक पकड़े चल सकोगे तुम उसे धीमे पदों से रौंदते-
यह दुराशा छोड़ दो!

आह, यह उल्लास, यह आनन्द वह जाने कि जिस से
अनगिनत बाँहें बढ़ा कर ढीठ याचक-सा लिपटता अंग से
माँगता ही माँगता सागर रहा है
और जिस ने जोड़ कर कुछ नहीं रक्खा-
सदा बढ़-चढ़ कर दिया है-
जो सदा उन्मुक्त हाथों, मुक्त मन, देता रहा है,
अन्तहीन अकूल अथाह सागर का थपेड़ा
सदा जिस ने समुद्र छाती पर सहा है
आह! यह उल्लास, यह आनन्द, वह जाने
बहा है
सनसनाता पवन जिस की लटों से छन कर,
थम गयी है तारिका जिस के लिए
व्योमपट पर जड़ी हरि की कनी-सी ज्वलित जय-संकेत-सी बन कर
हर लहर ने शोर कर जिस को
अनागत ज्योति का स्पन्दित सँदेसा भर
कहा है।

जिधर से आ रही है लहर
अपना रुख़ उधर को मोड़ दो:
तरी सागर की सुता है, संगिनी है पवन की,
उसे मिलने दो ललक कर लहर से:
वहीं उस को जय मिलेगी तो मिलेगी
या, मिलेगी लय; असंशय
तुम तरी तो छोड़ दो बढ़ती लहर पर!
डर?
कौन? किसका? हरहराती आ, लहर, मेरी लहर
फेन के अनगिन किरीटों को झुका कर
तू मुखर आह्वान कर मेरा, मुझे वर
जिधर से आ रही है तू!

जिधर से मुझ पर थपेड़े पडेंग़े अविराम
उधर ही तो मुक्त पारावार है।
दुर्द्धर लहर
तू आ!
ओ दुर्दान्त अथाह सागर की लहर,
दूर पर धु्रव, अजाने पर प्रेय
मेरे ध्येय
मेरे लक्ष्य की गम्भीर अर्थवती डगर
ओ लहर!

जिधर से आ रही है लहर
अपना रुख़ उधर को मोड़ दो
तरी अपनी चिर असंशय
लहर ही पर छोड़ दो!

दिल्ली (कनाट प्लेस में खड़े-खड़े), 3 अप्रैल, 1955

30. देना जीवन - 'अज्ञेय'

जीवन,
देना ऐसा सुख जो सहा न जाय,
इतना दर्द कि कहा न जाय।

ताप कृच्छ्रïतम मेरा हो, अनुभूति तीव्रतम-
मैं अपना मत होऊँ!
मुझ से स्नेह झरे जिस में मैं सब को दे आलोक अमलतर
ऐसा दिया सँजोऊँ!

देना जीवन, सुख, दुख, तड़पन
जो भी देना, इतना भर-भर, एक अहं में वह न समाय-
एक जिंदगी एक मरण का घेरा जिस को बाँध न पाय,
बच रहने की प्यास मिटा दे जो इसलिए अमर कर जाय।

किन्तु साथ ही / देना साहस
हो अन्याय किसी के भी प्रति पर मुझ से चुप रहा न जाय,
आस्था जिस के सुख का प्लावन ज्वार व्यथा का बहा न पाय।

आकांक्षा का मधुर कुहासा, संशय का तम, करे न ओझल
वह पैना विवेक जिस को दुश्चिन्ता कोई करे न बोझल
सच का आग्रह, निष्ठा की हठ,
अग-जग के विरोध का धक्का जिस को ढहा न पाय।
देना, जीवन, देना।

दिल्ली, 22 अप्रैल, 1955

31. महानगर : रात - 'अज्ञेय'

धीरे धीरे धीरे चली जाएँगी सभी मोटरें, बुझ जाएँगी
सभी बत्तियाँ, छा जाएगा एक तनाव-भरा सन्नाटा
जो उस को अपने भारी बूटों से रौंद-रौंद चलने वाले
वर्दीधारी का
प्यार नहीं, किन्तु वाञ्छित है।

तब जो पत्थर-पिटी पटरियों पर इन
अपने पैर पटकता और घिसटता
टप्-थब्, टप्-थब्, टप्-थब्
नामहीन आएगा...
तब जो ओट खड़ी खम्भे के अँधियारे में चेहरे की मुर्दनी छिपाये
थकी उँगलियों से सूजी आँखों से रूखे बाल हटाती
लट की मैली झालर के पीछे से बोलेगी:
'दया कीजिए, जैंटिलमैन...'
और लगेगा झूठा जिस के स्वर का दर्द
क्यों कि अभ्यास नहीं है अभी उसे सच के अभिनय का,
तब जो ओठों पर निर्बुद्धि हँसी चिपकाये
नो सीलन से विवर्ण दीवार पर लगा किसी पुराने
कौतुक-नाटक का फटियल-सा इश्तहार हो,
कुत्तों के कौतूहल के प्रति उदासीन
उस के प्रति भी जिस को तुम ने सन्नाटे की रक्षा पर तैनात किया है,
धुआँ-भरी आँखों से अपनी परछाईं तक बिन पहचाने,
तन्मय-हाँ, सस्ती शराब में तन्मय-
चला जा रहा होगा धीरे-धीरे-
बोलो, उस को देने को है
कोई उत्तर?
होगा?
होगा?
क्या? ये खेल-तमाशे, ये सिनेमाघर और थियेटर?
रंग-बिरंगी बिजली द्वारा किये प्रचारित
द्रव्य जिन्हें वह कभी नहीं जानेगा?

यह गलियों की नुक्कड़-नुक्कड़ पर पक्के पेशाबघरों की सुविधा,
ये कचरा-पेटियाँ सुघड़
(आह कचरे के लिए यहाँ कितना आकर्षण!)
असन्दिग्ध ये सभी सभ्यता के लक्षण हैं
और सभ्यता बहुत बड़ी सुविधा है सभ्य, तुम्हारे लिए!
किन्तु क्या जाने ठोकर खा कहीं रुके वह,
आँख उठा कर ताके और अचानक तुम को ले पहचान-
अचानक पूछे धीरे-धीरे-धीरे
'हाँ, पर मानव
तुम हो किस के लिए?'

स्ट्रैट फर्ड, ऐवन, जून, 1955

32. हवाई यात्रा : ऊँची उड़ान - 'अज्ञेय'

यह ऊपर आकाश नहीं,
है रूपहीन आलोक मात्र। हम अचल-पंख तिरते जाते हैं भार-मुक्त।

नीचे यह ता जी धुनी रुई की उजली बादल-सेज बिछी है
स्वप्न-मसृण: या यहाँ हमीं अपना सपना है?

लेकिन उतरो:
इस झीनी चादर में है जो घुटन, भेद कर आओ।

दीखीं क्या वे दूर लकीरें-धुँधली छायाएँ-कुछ काली, कुछ चमकीली
मुग्धकारी कुछ, कुछ जहरीली?

होती मूत्र्त महानगरी है: संसृति के अवतंस मनुज की कृति वह
अविश्राम उद्यम ही कीर्तिपताका।

उतरो थोड़ा और:
घनी कुछ हो आने दो
रासायनिक धुन्ध के इस चीकट कम्बल की नयी घुटन को:
मानव का समूह-जीवन इस झिल्ली में ही पनप रहा है!

उतरो थोड़ा और: धरा पर
हाँ, वह देखा, लगते ही आघात ठोस धरती का
धमनी में भारी हो आया मानव-रक्त और कानों में
गूँजा सन्नाटा संसृति का!

उतरो थोड़ा और: साँस ले गहरी
अपने उडऩखटोले की खिड़की को खोलो और पैर रक्खो मिट्टी पर:
खड़ा मिलेगा वहाँ सामने तुम को
अनपेक्षित प्रतिरूप तुम्हारा
नर, जिस की अनझिप आँखों में नारायण की व्यथा भरी है!

लन्दन-पैरिस-विएना (विमान में), जून, 1955

33. रूप की प्यास - 'अज्ञेय'

दृश्य के भीतर से सहसा कुछ उमड़ कर बोला:
सुन्दर के सम्मुख तुम्हारी जो उदासी है-
वह क्या केवल रूप, रूप, रूप की प्यासी है
जिस ने बस रूप देखा है उस ने बस
भले ही कितनी भी उत्कट लालसा से केवल कुछ चाहा है
जिस ने पर दिया अपना है दान
उस ने अपने को, अपने साथ सब को, अपनी सर्वमयता को निबाहा है।

मैं गिरा: पराजय से, पीड़ा से लोचन आये भर-से
पर मैं ने मुँह नहीं खोला।

मेल्क मठ (आस्ट्रिया), 19 जून, 1955

34. धूप-बत्तियाँ - 'अज्ञेय'

ये तुम्हारे नाम की दो बत्तियाँ हैं धूप की।
डोरियाँ दो गन्ध की
जो न बोलें किन्तु तुम को छू सकें।

जो विदेही स्निग्ध बाँहों से तुम्हें वलयित किये रह जाएँ
क्या है और मेरे पास?

हाँ, आस:
मैं स्वयं तुम तक पहुँच सकता नहीं
पर भाव के कितने न जाने सेतु अनुक्षण बाँधता हूँ-
आस!

तुम तक
और तुम तक
और
तुम तक!

स्टॉकहोम, 23 जून, 1955

35. सूर्यास्त - 'अज्ञेय'

धूप
माँ की हँसी के प्रतिबिम्ब-सी शिशु-वदन पर-
हुई भासित

नये चीड़ों से कँटीली पार की गिरि-शृंखला पर:
रीति:
मन पर वेदना के बिना,
तर्कातीत, बस स्वीकार से ही सिहर कर
बोला:
'नहीं, फिर आना नहीं होगा।'

सिग्तुना (स्वीडन), 24 जून, 1955

36. एक दिन जब - 'अज्ञेय'

एक दिन जब
सिवा अपनी व्यथा के कुछ याद करने को नहीं होगा-
क्यों कि कृतियाँ दूसरों के याद करने के लिए हैं:

एक दिन जब
दे न पाया जो, उसी की नोक बेबस सालती रह जाएगी-
क्यों कि दे पाया अगर कुछ, याद उस को आज
मैं करता नहीं हूँ, और, जीवन! शक्ति दो
उस दिन न चाहूँ याद करना:

एक दिन जब
प्यार से, संघर्ष से, आक्रोश से, करुणा-घृणा से, रोष से,
विद्वेष से, उल्लास से,
निविड सब संवेदनाओं की सघन अनुभूति से
बँधा वेष्टित, विद्ध जीवन की अनी से-स्वयं अपने प्यार से-

एक दिन जब
हाय! पहली बार!-
जानूँगा कि जीवन
जो कभी हारा नहीं था, हारता ही किसी से जो नहीं,
अपने से चला अब हार:
एक दिन-उस दिन-जिसे अपनी पराजय भी
दे सकूँगा समुद, नि:संकोच
उसी को आज अपना गीत देता हूँ।

आबिस्को (उत्तरी स्वीडन), 4 जुलाई, 1955

37. बर्फ की झील - 'अज्ञेय'

चट-चट-चट कर सहसा तड़क गये हिमखंड जमे सरसी के
तल पर:
लुढ़क-लुढ़क कर स्थिर...वसन्त का आना
यद्यपि पहले नहीं किसी ने जाना-
होता रहा अलक्षित।

नयी किरण ने छुए श्रृंग: हो गये सुनहले
बहते सारे हिमद्वीप। हाँ, गाओ,
'हेम-किरीटी राजकिशोरों का दल
नव-वसन्त के अभिनन्दन को मचल रहा है।'

गाओ, गाओ, गान नहीं झूठा हो सकता!
गाओ! पर ये हेम-मुकुट हैं केवल:
दूर सूर्य के लीला-स्मित से शोभन कौतुक-पुतले।

नीचे की हिमशिला पिघल कर जिस दिन स्वयं मिलेगी सरसी जल में
नव-वसन्त को उस दिन, उस दिन मेरा शीश झुकेगा!
क्योंकि तपस्या चमक नहीं है: वह है गलना:
गल कर मिट जाना-मिल जाना-
पाना।

कोपेन हागेन, 17 जुलाई, 1955

38. पश्चिम के समूह-जन - 'अज्ञेय'

पश्चिम के समूह-जन
एक मृषा जिस में सब डूबे हुए हैं-
क्यों कि एक सत्य जिस से सब ऊबे हुए हैं।

एक तृषा जो मिट नहीं सकती इस लिए मरने नहीं देती;
एक गति जो विवश चलाती है इसलिए कुछ करने नहीं देती।

स्वातन्त्र्य के नाम पर मारते हैं मरते हैं
क्यों कि स्वातन्त्र्य से डरते हैं।

डार्टिंगटन हॉल, टॉटनेस, 18 अगस्त, 1955

39. एक छाप - 'अज्ञेय'

एक छाप रंगों की एक छाप ध्वनि की
एक सुख स्मृति का-एक व्यथा मन की।

डार्टिंगटन हॉल, टॉटनेस, 18 अगस्त, 1955

40. बार-बार अथ से - 'अज्ञेय'

आँखें देखेंगी तो आकृति अन्धकार में सोयी
कान सुनेंगे लय नि:स्वप्न में खोयी।

याद करेगा मन तो स्तम्भित चिन्तन का पल
आत्मा पकड़ेगी तो निराकार का आँचल।

बार-बार अथ से ही यह पूरा होगा जीवन
सब कुछ दे कर ही तो कह पाऊँगा: ओ धन!
ओ धन, ओ मेरे धन!

डार्टिंगटन हॉल, टॉटनेस, 18 अगस्त, 1955

41. आगंतुक - 'अज्ञेय'

आँख ने देखा पर वाणी ने बखाना नहीं।
भावना से छुआ पर मन ने पहचाना नहीं।

राह मैं ने बहुत दिन देखी, तुम उस पर से आये भी, गये भी,
-कदाचित्, कई बार-
पर हुआ घर आना नहीं।

डार्टिंगटन हॉल, टॉटनेस, 18 अगस्त, 1955

42. भर गया गगन में धुआँ - 'अज्ञेय'

जो था, सब हम ने मिटा दिया
इस आत्मतोष से भरे कि उस के हमीं बनाने वाले हैं
भर गया गगन में धुआँ हमारे कहते-कहते:
'स्वर्ग धरा पर हम ले आने वाले हैं!'

टॉटनेस, लंदन, 19 अगस्त, 1955

43. जितना तुम्हारा सच है - 'अज्ञेय'

(1)
कहा सागर ने: चुप रहो!
मैं अपनी अबाधता जैसे सहता हूँ, अपनी मर्यादा तुम सहो।
जिसे बाँध तुम नहीं सकते
उस में अखिन्न मन बहो।
मौन भी अभिव्यंजना है: जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो।

कहा नदी ने भी: नहीं, मत बोलो,
तुम्हारी आँखों की ज्योति से अधिक है चौंध जिस रूप की
उस का अवगुंठन मत खोलो
दीठ से टोह कर नहीं, मन के उन्मेष से
उसे जानो: उसे पकड़ो मत, उसी के हो लो।

कहा आकाश ने भी: नहीं, शब्द मत चाहो
दाता ही स्पद्र्धा हो जहाँ, मन होता है मँगते का।
दे सकते हैं वही जो चुप, झुक कर ले लेते हैं।
आकांक्षा इतनी है, साधना भी लाये हो?
तुम नहीं व्याप सकते, तुम में जो व्यापा है उसी को निबाहो।

(2)
यही कहा पर्वत ने, यही घन-वन ने,
यही बोला झरना, यों कहा सुमन ने।

तितलियाँ, पतंगे, मोर और हिरने,
यही बोले सारस, ताल, खेत, कुएँ, झरने।

नगर के राज-पथ, चौबारे, अटारियाँ,
चीख़्ती-चिल्लाती हुई दौड़ती जनाकुल गाडिय़ाँ।

अग-जग एकमत! मैं भी सहमत हूँ।
मौन, नत हूँ।

तब कहता है फूल: अरे, तुम मेरे हो।
वन कहता है: वाह, तुम मेरे मित्र हो।
नदी का उलाहना है: मुझे भूल जाओगे?
और भीड़-भरे राज-पथ का: बड़े तुम विचित्र हो!

सभी के अस्पष्ट समवेत को
अर्थ देता कहता है नभ: मैंने प्राण तुम्हें दिये हैं
आकार तुम्हें दिया है, स्वयं भले मैं शून्य हूँ।
हम सब सब-कुछ, अपना, तुम्हारा, दोनों दे रहे हैं तुम को
अनुक्षण;
अरे ओ क्षुद्र-मन!
और तुम हम को एक अपनी वाणी भी तो
सौंप नहीं सकते?
सौंपता हूँ।

एडिनबरा, लन्दन (रेल में), 28 अगस्त, 1955

44. क्यों आज - 'अज्ञेय'

हम यहाँ आज बैठे-बैठे
हैं खिला रहे जो फूल खिले थे कल, परसों, तरसों-नरसों।
यों हमें चाहते बीत गये दिन पर दिन, मास-मास, बरसों।

जो आगे था वह हमने कभी नहीं पूछा:
वह आगे था, हम बाँध नहीं सकते थे उस सपने को
और चाहते नहीं बाँधना।

अन्धकार में अनपहचाने धन की
हम को टोह नहीं थी, हम सम्पन्न समझते थे अपने को।
जो पीछे था वह जाना था, वह धन था।

पर आकांक्षा-भरी हमारी अँगुलियों से हटता-हटता
चला गया वह दूर-दूर
छाया में, धुँधले में, धीरे-धीरे अन्धकार में लीन हुआ।
यों वृत्त हो गया पूर्ण: अँधेरा हम पर जयी हुआ।

क्यों कि हमारी अपनी आँखों का आलोक नहीं हम जान सके,
क्यों कि हमारी गढ़ी हुई दो प्राचीरों के बीच बिछा
उद्यान नहीं पहचान सके-
चिर वर्तमान की निमिष, प्रभामय,
भोले शिशु-सा किलक-भरा निज हाथ उठाये स्पन्दनहीन हुआ।

क्यों आज समूची वनखंडी का चकित पल्लवन सहज स्वयं हम जी न सके
क्यों उड़ता सौरभ खुली हवा का फिर जड़-जंगम को लौटे-हम पी न सके?
क्यों आज घास की ये हँसती आँखें हम अन्धे रौंद सके
इस लिए कि बरसों पहले कल वह जो फूला था
फूल अनोखा
अग्निशिखा के रंग का सूरजमुखी रहा?

जेनेवा, 12 सितम्बर, 1955

45. योगफल - 'अज्ञेय'

सुख मिला:
उसे हम कह न सके।
दुख हुआ:
उसे हम सह न सके।
संस्पर्श बृहत का उतरा सुरसरि-सा:
हम बह न सके ।
यों बीत गया सब: हम मरे नहीं, पर हाय! कदाचित
जीवित भी हम रह न सके।

जेनेवा, 12 सितम्बर, 1955

46. आदम को एक पुराने ईश्वर का शाप - 'अज्ञेय'

जाओ
अब रोओ-
जाओ!

सोओ
और पाओ
जागो
और खोओ
स्मृति में अनुरागो
वास्तव में
ख़ून के आँसू रोओ।

बार-बार
निषिद्ध फल खाओ
बार-बार
शत्रु का प्रलोभन तुम जानो
आँसू में, खून में, पसीने में
हार-हार
मुझे पहचानो।

मृषा को वरना
तृषा से मरना
लौट-लौट आना
मार्ग कहाँ पाना?

रोओ, रोओ, रोओ-
जाओ!

पूर्वी बर्लिन, 4 अक्टूबर, 1955

47. जिस दिन तुम - 'अज्ञेय'

जिस दिन तुम मार्ग पूछने निकले, उसी दिन
तुम तीर्थाटक से निरे बेघरे हो गये; तुम्हारा पथ खो गया।

जिस दिन तुम ने कहा, विवेक तो नाम है श्रद्धा के
अस्वीकार का, उस दिन तुम हुए तर्कना के: विवेक तुम्हारा सो गया।

फिर भी तुम मरे नहीं: तुम से तुम्हारी सम्भावनाएँ बड़ी हैं।
वही, ओ आलोक-सुत, पिता तम-भ्रान्ति के,
आज भी तुम्हारा दीपस्तम्भ बन खड़ी हैं।

चलो: अभी आस है
कितना बड़ा सम्बल तुम्हारे पास है कि तुम में कहीं पहुँचने की चाह है।

यह तुम छटपटाते हो कि काँटों में उलझ गये,
चट्टान से टकराये, बीहड़ में फँस गये,
फिसलन थी, रपटे; गिरे खड्ग-खाई में; कहीं कीच-दलदल में
धँस गये,
लम्बी अँधियाली किसी घाटी में
टेढे-मेढ़े कोस पर कोस नापते रहे,
लम्बी अँधियाली शीत रात में
बिना दूर दीप तक के सहारे के ठिठुरते-काँपते रहे
गिरते, पड़ते, मुड़ते, पलटते, कभी पैर सहलाते, कभी माथा पोंछते
चले तुम जा रहे हो खीझते, झींकते, सोचते
कि लक्ष्य जाने कहाँ है, किधर है, (है भी या कि भ्रम है?)-
बीहड़ में अकेले भी निश्चिन्त रहो!
स्थिर जानो:
अरे यही तो सीधी क्या, एक मात्र राह है!

पेरिस, 26 अक्टूबर, 1955

48. मैं-मेरा, तू-तेरा - 'अज्ञेय'

जो मेरा है वह बार-बार मुखरित होता है
पर जो मैं हूँ उसे नहीं वाणी दे पाता।

जो तेरा है पल्लवित हुआ है रंग-रूप धर शतधा
पर जो तू है नहीं पकड़ में आता।

जो मैं हूँ वह एक पुंज है दुर्दम आकांक्षा का
पर उस के बल पर जो मेरा है मैं बार-बार देता हूँ।

जो तू है वह अनासक्ति पारमिता पर उसके वातायन से
जो तेरा है तू मुझ से, इस से, उस से, सब से फिर-फिर भर-भर
स्मित, निर्विकल्प ले लेता है।

पेरिस, 27 अक्टूबर, 1955

49. कोई कहे या न कहे - 'अज्ञेय'

यह व्यथा की बात कोई कहे या न कहे।

सपने अपने झर जाने दो, झुलसाती लू को आने दो
पर उस अक्षोभ्य तक केवल मलय समीर बहे।
यह बिदा का गीत कोई सुने या सुने।

मेरा पथ अगम अँधेरा हो, अनुभव का कटु फल मेरा हो
वह अक्षत केवल स्मृति के फूल चुने!

फिरेंज (इटली), दिसम्बर, 1955

50. सागर और गिरगिट - 'अज्ञेय'

सागर भी रंग बदलता है, गिरगिट भी रंग बदलता है।
सागर को पूजा मिलती है, गिरगिट कुत्सा पर पलता है।
सागर है बली: बिचारा गिरगिट भूमि चूमता चलता है।
या यह: गिरगिट का जीवनमय होना ही हम मनुजों को खलता है?

नैपोली-पोर्ट सईद (जहाज में), 1 फरवरी, 1956

51. खुल गई नाव - 'अज्ञेय'

खुल गई नाव
घिर आई संझा, सूरज
डूबा सागर-तीरे।

धुंधले पड़ते से जल-पंछी
भर धीरज से
मूक लगे मंडराने,
सूना तारा उगा
चमक कर
साथी लगा बुलाने।

तब फिर सिहरी हवा
लहरियाँ काँपीं
तब फिर मूर्छित
व्यथा विदा की
जागी धीरे-धीरे।

स्वेज अदन (जहाज में), 5 फरवरी, 1956

52. तुम हँसी हो - 'अज्ञेय'

तुम हँसी हो-जो न मेरे ओठ पर दीखे,
मुझे हर मोड़ पर मिलती रही है।

धूप-मुझ पर जो न छायी हो,
किन्तु जिस की ओर
मेरे रुद्ध जीवन की कुटी की खिड़कियाँ खुलती रही हैं।

तुम दया हो जो मुझे विधि ने न दी हो,
किन्तु मुझ को दूसरों से बाँधती है
जो कि मेरी ही तरह इनसान हैं,
आँख जिन से न भी मेरी मिले,
जिन को किन्तु मेरी चेतना पहचानती है।

धैर्य हो तुम: जो नहीं प्रतिबिम्ब मेरे कर्म के धुँधले मुकुर में पा सका,
किन्तु जो संघर्ष-रत मेरे प्रतिम का, मनुज का,
अनकहा पर एक धमनी में बहा सन्देश मुझ तक ला सका,
व्यक्ति की इकली व्यथा के बीज को
जो लोक-मानस की सुविस्तृत भूमि में पनपा सका।

हँसी ओ उच्छल, दया ओ अनिमेष,
धैर्य ओ अच्युत, आप्त, अशेष।

जहाज 'आसिया' में (लालसागर), 6 फरवरी, 1956

53. आखेटक - 'अज्ञेय'

कई बार आकर्ण तान धनु
लक्ष्य साध कर
तीर छोड़ता हूँ मैं-
कोई गिरता नहीं, किन्तु सद्य: उपलब्धि मुझे होती है:
आखेटक का रस सत्वर मुझ को मिल जाता है।

कभी-कभी पर निरुद्देश्य, निर्लक्ष्य,
तीर से रहित धनुष की प्रत्यंचा को
देता हूँ टंकार अनमना:
मेरे हाथ कुछ नहीं आता, दूर कहीं, पर
हाय! मर्म में कोई बिंध जाता है!

दिल्ली, होली, 1956

54. पुरुष और नारी - 'अज्ञेय'

सूरज ने खींच लकीर लाल नभ का उर चीर दिया।
पुरुष उठा, पीछे न देख मुड़ चला गया!
यों नारी का जो रजनी है; धरती है, वधुका है, माता है,
प्यार हर बार छला गया।

नयी दिल्ली, अप्रैल, 1956

55. साधुवाद - 'अज्ञेय'

उसे नहीं जो सरसाता है
स्वाति-बूँद, जो हरसाता है
सागर-तट की सीपी की, तल पर ला सरसाता है।
ताकि सहज मुक्ता वह दे दे-सीपी सोती।

नहीं! साधुवाद उस को जो कहीं अनवरत
भर कौशल से हाथ अनमने
निर्मम बल से एक-एक सीपी का मुख खोला करता है
और मर्म में रख देता है कनी रेत की, एक अनी-सी
कसके जो, पर रक्खे अक्षत, मिले दर्द से जिस के कर से
सीपी का उर जिस के वर से
रच ले मोती!

दिल्ली, 1 मई, 1956

56. वैशाख की आँधी - 'अज्ञेय'

नभ अन्तर्ज्योतित है पीत किसी आलोक से
बादल की काली गुदड़ी का मोती
टोह रही है बिजली ज्यों बरछी की नोक से।

कुछ जो घुमड़ रहा है क्षिति में
उसे नीम के झरते बौर रहे हैं टोक से;
'ठहरो-अभी झूम जाएगा अगजग
बरबस तीखे मद की झोंक से।'

हहर-हहर घहराया काला बद्दल
लेकिन पहले आया झक्कड़; जाने कहाँ-कहाँ की धूल का:
स्वर लाया सरसर पीपल का, मर्मर कछार के झाऊ का,
खड़खड़ पलास का, अमलतास का,
और झरा रेशम शिरीष के फूल का!

आयी पानी:
अरी धूल झगडै़ल, चढ़ी
पछवा के कन्धों पर तू थी इतराती,
ले काट चिकोटी अब भी:
बस एक स्नेह की बूँद और तू हुई पस्त-
पैरों में बिछ-बिछ जाती,
सोंधी महक उड़ाती!
सह सकें स्नेह, वह और रूप होते हैं, अरी अयानी!
नाच, नाच मन, मुदित, मस्त:
आया पानी!

दिल्ली, मई, 1956

57. सागर-तट की सीपियाँ - 'अज्ञेय'

सीपियाँ
ये शुभ्र-नीलम: दर्द की आँखें फटी-सी
जो कभी अब नहीं मोती दे सकेंगी।

यह गन्ध-दूषित: मुख-विवर जो किरकिराते रेत-कन से
अचकचा कर अधखुला ही रह गया है।

ये बन्द, बाहर खुरदरी, छेदों-भरी:
हाय रे, अपनी घुटन का ले सहारा मुक्त होना चाहना
नि:सीम सागर से-
उसी के उच्छिष्ट का!

ये टूटी हुई रंगीन:
इन्द्र-धनु रौंदे हुए ये-
रेत से मिस चले से भी स्निग्ध, रंगारंग-
जैसे प्यार।

और यह, जो-
चलो, यह अच्छा हुआ जो लह उस को कोख में लेती गयी-
न जाने क्यों मुझे उस के कँटीले रूप से संकोच होता था।

देहरादून, मई, 1956

58. कवि के प्रति कवि - 'अज्ञेय'

कवि के प्रति कवि
दर्प किया: शक्ति नहीं मिली।

सुख लिया-छीन-छीन कर भर-भर सुख लिया:
अभिव्यक्ति नहीं मिली।

दु:ख दिया, दु:ख पिया, दु:ख जिया: मुक्ति नहीं मिली।

कुछ लिखा: वह हाट-हाट बिका
फूले हम, सफल हुए: मोह पर झरा नहीं, टँगा-सा रहा टिका
हृदय की कली नहीं खिली।

बँधते हम रूप के दाम में रहे,
स्रजते पर सृष्टि से चिपटते,
आलोक-प्रभव पर लय की लहर से लिपटते
रमते हम काम में, राम में, नाम में रहे:
अनासक्ति नहीं मिली।

नम: कवि, जो भी तुम नाम ही नाम छोड़ गये;
जो जब-जब हम शास्त्र रच मुदित हुए
संचित हमारा अहंकार स्मित-भर से तोड़ गये;
मरु की ओर अदृश्य बढ़ी अन्त:सलिला को
सहज, कुछ कहे बिन फिर भीतर को मोड़ गये।

दिल्ली, 15 मई, 1956

59. सर्जना के क्षण - 'अज्ञेय'

एक क्षण भर और
रहने दो मुझे अभिभूत
फिर जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं
ज्योति शिखायें
वहीं तुम भी चली जाना
शांत तेजोरूप!

एक क्षण भर और
लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते!
बूँद स्वाती की भले हो
बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से
वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को
भले ही फिर व्यथा के तम में
बरस पर बरस बीतें
एक मुक्तारूप को पकते!

दिल्ली, 17 मई, 1956

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