Lava - Javed Akhtar लावा - जावेद अख़्तर

Hindi Kavita

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हिंदी कविता

Lava Javed Akhtar
लावा जावेद अख़्तर

1. ज़बान - Javed Akhtar Lava

कोई ख़याल
और कोई भी जज़्बा
कोई भी शय हो
जाने उसको
पहले-पहल आवाज़ मिली थी
या उसकी तस्वीर बनी थी
सोच रहा हूँ

कोई भी आवाज़
लकीरों में जो ढली
तो कैसे ढली थी
सोच रहा हूँ
ये जो इक आवाज़ अलिफ़ है
सीधी लकीर में
ये आिख़र किसने भर दी थी
क्यों सबने ये मान लिया था
सामने मेरी मेज़ पे इक जो फल रक्खा है

इसको सेब ही क्यों कहते हैं
सेब तो इक आवाज़ है
इस आवाज़ का इस फल से
जो अनोखा रिश्ता बना है
कैसे बना था
और ये टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें
जिनको हर्फ़ कहा जाता है
ये आवाज़ों की तस्वीरें
कैसे बनी थीं
आवाज़ें तस्वीर बनीं
या तस्वीरें आवाज़ बनी थीं
सोच रहा हूँ

सारी चीज़ें
सारे जज़्बे
सारे ख़याल
और उनका तआरूफ़
उनकी ख़बर और
उनके हर पैग़ाम को देने पर फ़ाइज़
सारी आवाज़ें
इन आवाज़ों को अपने घर में ठहराती
अपनी अमान में रखती
टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें
किस ने ये कुनबा जोड़ा है
सोच रहा हूँ।
javed-akhtar

2. जिधर जाते हैं सब, जाना उधर अच्छा नहीं लगता (ग़ज़ल) - Javed Akhtar Lava

जिधर जाते हैं सब, जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना, हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ायदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर, क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

बुलंदी पर इन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
ये वो शाखें हैं जिनको अब शजर अच्छा नहीं लगता

ये क्यों बाक़ी रहे आतिश-ज़नो, ये भी जला डालो
कि सब बेघर हों और मेरा हो घर, अच्छा नहीं लगता

3. कभी-कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यों है (ग़ज़ल) - Javed Akhtar Lava

कभी-कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यों है
कि जब हैं सारे ही तार टूटे तो साज़ में इरतेआश क्यों है

कोई अगर पूछता ये हमसे, बताते हम गर तो क्या बताते
भला हो सब का कि ये न पूछा कि दिल पे ऐसी ख़राश क्यों है

उठाके हाथों से तुमने छोड़ा, चलो न दानिस्ता तुमने तोड़ा
अब उल्टा हमसे तो ये न पूछो कि शीशा ये पाश-पाश क्यों है

अजब दोराहे पे ज़िंदगी है कभी हवस दिल को खींचती है
कभी ये शर्मिंदगी है दिल में कि इतनी फ़िक्रे-मआश क्यों है

न फ़िक्र कोई न जुस्तुजू है, न ख्वाब कोई न आरज़ू है
ये शख्स तो कब का मर चुका है, तो बेकफ़न फिर ये लाश क्यों है

4. ये खेल क्या है - Javed Akhtar Lava

मिरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है
और अब
मेरी चाल के इंतेज़ार में है
मगर मैं कब से
सæफेद ख़ानों
सियाह ख़ानों में रक्खे
काले-सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ
मैं सोचता हूँ
ये मोहरे क्या हैं

अगर मैं समझूँ
कि ये जो मोहरे हैं
सिर्फ़ लकड़ी के हैं खिलौने
तो जीतना क्या है हारना क्या
न ये ज़रूरी
न वो अहम है
अगर ख़ुशी है न जीतने की
न हारने का ही कोई ग़म है
तो खेल क्या है
मैं सोचता हूँ
जो खेलना है
तो अपने दिल में यक़ीन कर लूँ
ये मोहरे सचमुच के बादशाहो -वज़ीर
सचमुच के हैं प्यादे
और इनके आगे है
दुश्मनों की वो फ़ौज
रखती है जो कि मुझको तबाह करने के
सारे मनसूबे
सब इरादे
मगर मैं ऐसा जो मान भी लूँ
तो सोचता हूँ
ये खेल कब है
ये जंग है जिसको जीतना है
ये जंग है जिसमें सब है जायज़
कोई ये कहता है जैसे मुझसे
ये जंग भी है ये खेल भी है
ये जंग है पर खिलाड़ियों की
ये खेल है जंग की तरह का
मैं सोचता हूँ
जो खेल है
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है
कि कोई मोहरा रहे कि जाए
मगर जो है बादशाह
उसपर कभी कोई आँच भी न आए
वज़ीर ही को है बस इजाज़त
कि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए

मैं सोचता हूँ
जो खेल है
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है
प्यादा जो अपने घर से निकले
पलट के वापस न जाने पाए
मैं सोचता हूँ
अगर यही है उसूल
तो फिर उसूल क्या है
अगर यही है ये खेल
तो फिर ये खेल क्या है
मैं इन सवालों से जाने कब से उलझ रहा हूँ
मिरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है
और अब मेरी चाल के इंतेज़ार में है।

5. कल जहाँ दीवार थी, है आज इक दर देखिए (ग़ज़ल) - Javed Akhtar Lava

कल जहाँ दीवार थी, है आज इक दर देखिए
क्या समाई थी भला दीवाने के सर, देखिए

पुर-सुकूँ लगती है कितनी झील के पानी पे बत
पैरों की बेताबियाँ पानी के अंदर देखिए

छोड़कर जिसको गये थे आप कोई और था
अब मैं कोई और हूँ वापस तो आकर देखिए

छोटे-से घर में थे देखे ख्वाब महलों के कभी
और अब महलों में हैं तो ख्वाब में घर देखिए

ज़हने-इंसानी इधर, आफ़ाक़ की वुसअत उधर
एक मंज़र है यहाँ अंदर कि बाहर देखिए

अक्ल ये कहती है दुनिया मिलती है बाज़ार में
दिल मगर ये कहता है कुछ और बेहतर देखिए

6. हमने ढूँढे भी तो ढूँढे हैं सहारे कैसे (ग़ज़ल) - Javed Akhtar Lava

हमने ढूँढे भी तो ढूँढे हैं सहारे कैसे
इन सराबों पे कोई उम्र गुज़ारे कैसे

हाथ को हाथ नहीं सूझे, वो तारीकी थी
आ गये हाथ में क्या जाने सितारे कैसे

हर तरफ़ शोर उसी नाम का है दुनिया में
कोई उसको जो पुकारे तो पुकारे कैसे

दिल बुझा जितने थे अरमान सभी ख़ाक हुए
राख में फिर ये चमकते हैं शरारे कैसे

न तो दम लेती है तू और न हवा थमती है
ज़िंन्दगी ज़ुल्फ़ तिरी कोई सँवारे कैसे

7. आँसू - Javed Akhtar Lava

किसी का ग़म सुन के
मेरी पलकों पे
एक आँसू जो आ गया है
ये आँसू क्या है

ये आँसू क्या इक गवाह है
मेरी दर्द-मंदी का मेरी इंसान-दोस्ती का
ये आँसू क्या इक सुबूत है
मेरी ज़िंदगी में ख़ुलूस की एक रौशनी का
ये आँसू क्या ये बता रहा है
कि मेरे सीने में एक हस्सास दिल है
जिसने किसी की दिलदोज़ दास्ताँ जो सुनी
तो सुनके तड़प उठा है
पराये शोलों में जल रहा है
पिघल रहा है
मगर मैं फिर ख़ुद से पूछता हूँ
ये दास्ताँ तो अभी सुनी है
ये आँसू भी क्या अभी ढला है
ये आँसू
क्या मैं ये समझूँ
पहले कहीं नहीं था
मुझे तो शक है कि ये कहीं था
ये मेरे दिल और मेरी पलकों के दरमियाँ
इक जो फ़ासला है
जहाँ ख़यालों के शहर ज़िंन्दा हैं
और ख्वाबों की तुर्बतें हैं
जहाँ मुहब्बत के उजड़े बागों में
तलि्ख़यों के बबूल हैं
और कुछ नहीं है
जहाँ से आगे हैं
उलझनों के घनेरे जंगल

ये आँसू
शायद बहुत दिनों से
वहीं छिपा था
जिन्होंने इसको जनम दिया था
वो रंज तो मसलेहत के हाथों
न जाने कब क़त्ल हो गये थे
तो करता फिर किसपे नाज़ आँसू
कि हो गया बेजवाज़ आँसू
यतीम आँसू, यसीर आँसू
न मोतबर था
न रास्तों से ही बाख़बर था
तो चलते चलते
वो थम गया था
ठिठक गया था
झिझक गया था

इधर से आज इक किसी के ग़म की
कहानी का कारवाँ जो गुज़रा
यतीम आँसू ने जैसे जाना
कि इस कहानी की सरपरस्ती मिले
तो मुम्किन है
राह पाना
तो इक कहानी की उंगली थामे
उसी के ग़म को रूमाल करता
उसी के बारे में
झूठे-सच्चे सवाल करता
ये मेरी पलकों तक आ गया है।

8. यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा - Javed Akhtar Lava

यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा
तो शुक्र कीजिए, कि अब कोई गिला नहीं रहा

न हिज्र है न वस्ल है अब इसको कोई क्या कहे
कि फूल शाख़ पर तो है मगर खिला नहीं रहा

ख़ज़ाने तुमने पाए तो ग़रीब जैसे हो गए
पलक पे अब कोई भी मोती झिलमिला नहीं रहा

बदल गई है ज़िंदगी, बदल गये हैं लोग भी
ख़ुलूस का जो था कभी वो अब सिला नहीं रहा

जो दुश्मनी बख़ील से हुई तो इतनी ख़ैर है
कि ज़हर उस के पास है मगर पिला नहीं रहा

लहू में जज़्ब हो सका न इल्म तो ये हाल है
कोई सवाल ज़हन को जो दे जिला, नहीं रहा

9. बज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है - Javed Akhtar Lava

बज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है
मगर ये तो मिरी मंज़ल नहीं है

ये तोदा रेत का है, बीच दरिया
ये बह जाएगा ये साहिल नहीं है

बहुत आसान है पहचान इसकी
अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है

मुसाफ़र वो अजब है कारवाँ में
कि जो हमराह है शामिल नहीं है

बस इक मक़तूल ही मक़्तूल कब है
बस इक क़ातिल ही तो क़ातिल नहीं है

कभी तो रात को तुम रात कह दो
ये काम इतना भी अब मुश्किल नहीं है

10. कायनात - Javed Akhtar Lava

मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ
ये कायनात और इसकी वुस्अत
तमाम हैरत तमाम हैरत
ये क्या तमाशा ये क्या समाँ है
ये क्या अयाँ है ये क्या निहाँ है
अथाह सागर है इक ख़ला का
न जाने कब से न जाने कब तक
कहाँ तलक है
हमारी नज़रों की इंतेहा है
जिसे समझते हैं हम फ़लक है

ये रात का छलनी-छलनी-सा काला आस्माँ है
कि जिसमें जुगनू की शक्ल में
बेशुमार सूरज पिघल रहे हैं
शहाबे-साक़ब हैं
या हमेशा की ठंडी-काली फ़िज़ाओं में
जैसे आग के तीर चल रहे हैं
करोड़हा नूरी बरसों के फ़ासलों में फैली
ये कहकशाएँ
ख़ला को घेरे हैं
या ख़लाओं की क़ैद में हैं
ये कौन किसको लिए चला है
हर एक लम्हा
करोड़ों मीलों की जो मुसाफ़त है
इनको आिख़र कहाँ है जाना
अगर है इनका कहीं कोई आिख़री ठिकाना
तो वो कहाँ है

जहाँ कहीं है
सवाल ये है
वहाँ से आगे कोई ज़मीं है
कोई फ़लक है
अगर नहीं है
तो ये ‘नहीं’ कितनी दूर तक है

मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ
ये कायनात और इसकी वुस्अत
तमाम हैरत तमाम हैरत
सितारे जिनकी सफ़ीर किरनें
करोड़ों बरसों से राह में हैं
ज़मीं से मिलने की चाह में हैं
कभी तो आके करेंगी ये मेरी आँखें रौशन
कभी तो आएगा मेरे हाथों में रौशनी का एक ऐसा दामन
कि जिसको थामे मैं जाके देखूंगा इन ख़लाओं के
फैले आँगन
कभी तो मुझको ये कायनात अपने राज़ खुलके
सुना ही देगी
ये अपना आग़ाज़ अपना अंजाम
मुझको इक दिन बता ही देगी

अगर कोई वाइज़ अपने मिम्बर से
नख़वत-आमेज़ लहजे में ये कहे
कि तुम तो कभी समझ ही नहीं सकोगे
कि इस क़दर है ये बात गहरी
तो कोई पूछे
जो मैं न समझा
तो कौन समझेगा
और जिसको कभी न कोई समझ सके
ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी।

11. जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो - Javed Akhtar Lava

जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो

फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सरे-मिम्बर है
किसके है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो

ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुमने
क्यों पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो

इन चिराग़ों के तले ऐसे अंधेरे क्यों हैं
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो

तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो

ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो

12. तू किसी पे जाँ को निसार कर दे कि दिल को क़दमों में डाल दे - Javed Akhtar Lava

तू किसी पे जाँ को निसार कर दे कि दिल को क़दमों में डाल दे
कोई होगा तेरा यहाँ कभी ये ख़याल दिल से निकाल दे

मिरे हुक्मरां भी अजीब हैं कि जवाब लेके वो आए हैं
मुझे हुक्म है कि जवाब का हमें सीधा-सीधा सवाल दे

रगो-पै में जम गया सर्द ख़ूँ न मैं चल सकूँ न मैं हिल सकूँ
मिरे ग़म की धूप को तेज़ कर, मिरे ख़ून को तू उबाल दे

वो जो मुस्कुरा के मिला कभी तो ये फ़िक्र जैसे मुझे हुई
कहूँ अपने दिल का जो मुद्दआ, कहीं मुस्कुरा के न टाल दे

ये जो ज़हन दिन की है रौशनी तो ये दिल है रात में चाँदनी
मुझे ख्वाब उतने ही चाहिएं ये ज़माना जितने ख़याल दे

13. एतेराफ़ - Javed Akhtar Lava

सच तो ये है क़ुसूर अपना है
चाँद को छूने की तमन्ना की
आस्मां को ज़मीन पर माँगा
फूल चाहा कि पत्थरों पे खिले
काँटों में की तलाश ख़ुशबू की
आग से माँगते रहे ठंडक
ख्वाब जो देखा
चाहा सच हो जाए
इसकी हमको सज़ा तो मिलनी थी ।

14. मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में - Javed Akhtar Lava

मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाए हमने पाने में

वो शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

जो मुंतिज़र न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलटके आने में

लतीफ़ था वो तख़य्युल से, ख्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में

समझ लिया था कभी इक सराब को दरिया
पर इक सुकून था हमको फ़रेब खाने में

झुका दरख़्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज़्यादा फ़र्क़ नहीं झुकने-टूट जाने में

15. यही हालात इब्तेदा से रहे - Javed Akhtar Lava

यही हालात इब्तेदा से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे

इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला हमको फिर हवा से रहे

बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी
तुम नहीं थे तो ये दिलासे रहे

ज़िंदगी की शराब माँगते हो
हमको देखो, कि पीके प्यासे रहे

उसके बंदों को देखकर कहिए
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

16. ख़ुदा हाफ़ज़ - Javed Akhtar Lava

मुझे वो धुंध में लिपटी हुई
मासूम सदियाँ याद आती हैं
कि जब तुम हर जगह थे
हर तरफ़ थे
हर कहीं थे तुम
रिहाइश थी तुम्हारी आस्मानों में
ज़मीं के भी मकीं थे तुम
तुम्हीं थे चाँद और सूरज के मुल्कों में
तुम्हीं तारों की नगरी में
हवाओं में
फ़िज़ाओं में
दिशाओं में
सुलगती धूप में तुम थे
तुम्हीं थे ठंडी छाँवों में
तुम्हीं खेतों में उगते थे
तुम्हीं पेड़ों पे फलते थे
तुम्हीं बारिश की बूँदों में
तुम्हीं सारी घटाओं में
हर इक सागर से आगे तुम थे
हर पर्बत के ऊपर तुम
वबाओं में
हर इक सैलाब में
सब ज़लज़लों में
हादसों में भी
रहा करते थे छिप कर तुम
हर इक आँधी में
तूफ़ाँ में
समुंदर में
बयाबाँ में
हर इक मौसम हर इक रूत में
तुम्हीं हर इक सितम में थे
तुम्हीं हर इक करम में थे
सभी पाकीज़ा नदियों में
मुक़द्दस आग में तुम थे
दरिंदों और चरिंदां
बिच्छुओं में नाग में तुम थे
सभी के डंक में तुम थे
सभी के ज़हर में तुम थे
जो इंसानों पे आते हैं
हर ऐसे क़हर में तुम थे
मगर सदियों के तन से लिपटी
धुंध अब छट रही है
अब कहीं कुछ रौशनी-सी हो रही है
और कहीं कुछ तीरगी सी घट रही है
ये उजाले साफ़ कहते हैं
न अब तुम हो वबाओं में
न अब तुम हो घटाओं में
न बिच्छू में न तो अब नाग में तुम हो
न आँधी और तूफ़ाँ और न तो पाकीज़ा नदियों
और मुक़द्दस आग में तुम हो

अदब है शर्त
बस इतना कहूँगा
तुमने शायद मुझ पे है ये मेहरबानी की
मैं अपने इल्म की मश्अल लिए
पहुँचा जहाँ हूँ
मैंने देखा
तुमने है नक़्ले-मकानी की
मगर अब भी ख़ला की वुस्अतों में
तुम ही रहते हो
जिसे कहते हैं क़िस्मत
अस्ल में
हालात का बिफरा समुंदर है
मगर अब तक यक़ीने-आम है
बनके समुंदर
तुम ही बहते हो

मुझे ये मानना होगा
वहाँ तुम हो
जहाँ ये राज़ है पिन्हाँ
कि ऐसी कायनाते-बेकराँ की इब्तेदा
और इंतेहा क्या है
वहाँ तुम हो
जहाँ ये आगही है
मौत के इस पर्दे के पीछे छिपा क्या है
अभी कुछ दिन वहाँ रह लो
मगर इतना बता दूँ मैं
उधर मैं आनेवाला हूँ।

17. जब आइना कोई देखो इक अजनबी देखो - Javed Akhtar Lava

जब आइना कोई देखो इक अजनबी देखो
कहाँ पे लाई है तुमको ये ज़िंदगी देखो

मुहब्बतों में कहाँ अपने वास्ते फ़ुर्सत
जिसे भी चाहो वो चाहे मिरी ख़ुशी देखो

जो हो सके तो ज़्यादा ही चाहना मुझको
कभी जो मेरी मुहब्बत में कुछ कमी देखो

जो दूर जाए तो ग़म है जो पास आए तो दर्द
न जाने क्या है वो कमबख़्त आदमी देखो

उजाला तो नहीं कह सकते इसको हम लेकिन
ज़रा-सी कम तो हुई है ये तीरगी देखो

18. सारी हैरत है मिरी सारी अदा उसकी है - Javed Akhtar Lava

सारी हैरत है मिरी सारी अदा उसकी है
बेगुनाही है मिरी और सजा उसकी है

मेरे अल्फ़ाज़ में जो रंग है वो उसका है
मेरे एहसास में जो है वो फ़िज़ा उसकी है

शे'र मेरे हैं मगर उनमें मुहब्बत उसकी
फूल मेरे हैं मगर बादे-सबा उसकी है

इक मुहब्बत की ये तस्वीर है दो रंगों में
शौक़ सब मेरा है और सारी हया उसकी है

हमने क्या उससे मुहब्बत की इजाज़त ली थी
दिल-शिकन ही सही, पर बात बजा उसकी है

एक मेरे ही सिवा सबको पुकारे है कोई
मैंने पहले ही कहा था ये सदा उसकी है

ख़ून से सींची है मैंने जो ज़मीं मर-मर के
वो ज़मीं, एक सितमगर ने कहा, उसकी है
उसने ही इसको उजाड़ा है इसे लूटा है
ये ज़मीं उसकी अगर है भी तो क्या उसकी है

19. परस्तार - Javed Akhtar Lava

वो जो कहलाता था दीवाना तिरा
वो जिसे हिफ़्ज़ था अफ़्साना तिरा
जिसकी दीवारों पे आवेज़ां थीं
तस्वीरें तिरी
वो जो दोहराता था
तक़रीरें तिरी
वो जो ख़ुश था तिरी ख़ुशियों से
तिरे ग़म से उदास
दूर रहके जो समझता था
वो है तेरे पास
वो जिसे सज्दा तुझे करने से
इन्कार न था
उसको दरअस्ल कभी तुझसे
कोई प्यार न था
उसकी मुश्किल थी
कि दुश्वार थे उसके रस्ते
जिनपे बेख़ौफ़ो-ख़तर
घूमते रहज़न थे
सदा उसकी अना के दरपै
उसने घबराके
सब अपनी अना की दौलत
तेरी तहवील में रखवा दी थी
अपनी ज़िल्लत को वो दुनिया की नज़र
और अपनी भी निगाहों से छिपाने के लिए
कामयाबी को तिरी
तेरी फ़ुतूहात
तिरी इज़्ज़त को
वो तिरे नाम तिरी शोहरत को
अपने होने का सबब जानता था
है वजूद उसका जुदा तुझसे
ये कब मानता था
वो मगर
पुरख़तर रास्तों से आज निकल आया है
वक़्त ने तेरे बराबर न सही
कुछ न कुछ अपना करम उसपे भी फ़रमाया है
अब उसे तेरी ज़रूरत ही नहीं
जिसका दावा था कभी
अब वो अक़ीदत ही नहीं
तेरी तहवील में जो रक्खी थी कल
उसने अना
आज वो माँग रहा है वापस
बात इतनी-सी है
ऐ साहिबे-नामो-शोहरत
जिसको कल
तेरे ख़ुदा होने से इन्कार न था
वो कभी तेरा परस्तार न था।

20. निगल गए सब की सब समुंदर, ज़मीं बची अब कहीं नहीं है - Javed Akhtar Lava

निगल गए सब की सब समुंदर, ज़मीं बची अब कहीं नहीं है
बचाते हम अपनी जान जिसमें वो कश्ती भी अब कहीं नहीं है

बहुत दिनों बाद पाई फ़ुर्सत तो मैंने ख़ुद को पलटके देखा
मगर मैं पहचानता था जिसको वो आदमी अब कहीं नहीं है

गुज़र गया वक़्त दिल पे लिखकर न जाने कैसी अजीब बातें
वरक़ पलटता हूँ मैं जो दिल के तो सादगी अब कहीं नहीं है

वो आग बरसी है दोपहर में कि सारे मंज़र झुलस गए हैं
यहाँ सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है

तुम अपने क़स्बों में जाके देखो वहाँ भी अब शहर ही बसे हैं
कि ढूँढते हो जो ज़िंदगी तुम वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है

21. दर्द अपनाता है पराए कौन - Javed Akhtar Lava

दर्द अपनाता है पराए कौन
कौन सुनता है और सुनाए कौन

कौन दोहराए फिर वही बातें
ग़म अभी सोया है, जगाए कौन

अब सुकूँ है तो भूलने में है
लेकिन उस शख्स को भुलाए कौन

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं
कौन दुख झेले, आज़माए कौन

आज फिर दिल है कुछ उदास-उदास
देखिए आज याद आए कौन

22. अजीब क़िस्सा है - Javed Akhtar Lava

अजीब क़िस्सा है
जब ये दुनिया समझ रही थी
तुम अपनी दुनिया में जी रही हो
मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ
तो हमने सारी निगाहों से दूर
एक दुनिया बसाई थी
जो कि मेरी भी थी
तुम्हारी भी थी
जहाँ फ़िज़ाओं में
दोनों के ख्वाब जागते थे
जहाँ हवाओं में
दोनों की सरगोशियाँ घुली थीं
जहाँ के फूलों में
दोनों की आरज़ू के सब रंग
खिल रहे थे
जहाँ पे दोनों की जुरअतों के
हज़ार चश्मे उबल रहे थे
न वसवसे थे न रंजो-ग़म थे
सुकून का गहरा इक समुंदर था
और हम थे

अजीब क़िस्सा है
सारी दुनिया ने
जब ये जाना
कि हमने सारी निगाहों से दूर
एक दुनिया बसाई है तो
हर एक अबरू ने जैसे हम पर कमान तानी
तमाम पेशानियों पे उभरीं
ग़म और ग़ुस्से की गहरी शिकनें
किसी के लहजे से तल्ख़ी छलकी
किसी की बातों में तुर्शा आई
किसी ने चाहा
कि कोई दीवार ही उठा दे
किसी ने चाहा
हमारी दुनिया ही वो मिटा दे
मगर ज़माने को हारना था
ज़माना हारा
ये सारी दुनिया को मानना ही पड़ा
हमारे ख़याल की एक-सी ज़मीं है
हमारे ख्वाबों का एक जैसा ही आस्माँ है
मगर पुरानी ये दास्ताँ है
कि हमपे दुनिया
अब एक अर्से से मेहरबाँ है

अजीब क़िस्सा है
जब कि दुनिया ने
कब का तस्लीम कर लिया है
हम एक दुनिया के रहने वाले हैं
सच तो ये है
तुम अपनी दुनिया में जी रही हो
मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ।

23. शुक्र है ख़ैरियत से हूँ साहब - Javed Akhtar Lava

शुक्र है ख़ैरियत से हूँ साहब
आपसे और क्या कहूँ साहब

अब समझने लगा हूँ सूदो-ज़िंयाँ
अब कहाँ मुझमें वो जुनूँ साहब

ज़िल्लते-ज़ीस्त या शिकस्ते-ज़मीर
ये सहूँ मैं कि वो सहूँ साहब

हम तुम्हें याद करते, रो लेते
दो घड़ी मिलता जो सुकूँ साहब

शाम भी ढल रही है घर भी है दूर
कितनी देर और मैं रूकूँ साहब

अब झुकूँगा तो टूट जाऊँगा
कैसे अब और मैं झुकूँ साहब

कुछ रिवायात की गवाही पर
कितना जुर्माना मैं भरूँ साहब

24. खुला है दर प तिरा इंतेज़ार जाता रहा - Javed Akhtar Lava

खुला है दर प तिरा इंतेज़ार जाता रहा
ख़ुलूस तो है मगर एतेबार जाता रहा

किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही
मगर कभी जो हमें था ख़ुमार, जाता रहा

कभी जो सीने में एक आग थी वो सर्द हुई
कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा

अजब-सा चैन था हमको कि जब थे हम बेचैन
क़रार आया तो जैसे क़रार जाता रहा

कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी महिफ़ल में
मैं ये उम्मीद लिए बार-बार जाता रहा

25. दश्ते-जुनूँ वीरानियाँ, क़ह्ते-सुकूँ हैरानियाँ - Javed Akhtar Lava

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दश्ते-जुनूँ वीरानियाँ, क़ह्ते-सुकूँ हैरानियाँ, इक दिल और उसकी
बे-सरो-सामानियाँ, अज़ ख़ाकदाँ ता आस्माँ, तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ
चेहरा ज़मीं का ज़र्द है, लहजा हवा का सर्द है, पहने फ़िज़ाएँ हैं कफ़न
या गर्द है, मातम-कुनाँ है ये समाँ, तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ

2
सब हमसफ़र अब खो चुके, हम हाथ सबसे धो चुके, हम सबको कब का रो चुके,
उम्मीद हसरत आरज़ू जितने फ़रोज़ाँ थे यहाँ गुल सब चिराग़ अब हो चुके
अब एक लम्बी रात है, अब एक ही तो बात है, अब दिल पे जैसे ग़म का
भारी हाथ है, अब इक यही है दास्ताँ, तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ

3
अब ये सफ़र दुश्वार है, हर हर क़दम दीवार है, हर लम्हा इक आज़ार है
अब रोज़ो-शब, शामो-सहर है वक़्त वो बीमार जो मरने से भी लाचार है
मजबूर होके ज़िंदगी, है साँस रोके ज़िंदगी, है गुंग अब आवाज़
खोके ज़िंदगी, हैं इस ख़मोशी में निहाँ तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ

4
सहमी हुई हैं ख्वाहिशें, ठिठकी हुई है काविशें, क्या दोस्ती क्या रंजिशें,
सब जैसे अब हैं बेअसर बेवाक़आ-सी ज़िंदगी की हैं अजब ये साज़शें
जो ग़म थे वो भी खो गए, दिल जैसे ख़ाली हो गए, कल जो थे अपने हमसफ़र
वो तो गए, अब हर तरफ़ हैं हुक्मराँ तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ

5
ऐ ज़ीस्त ये तू ही बता, ये क्या हुआ कैसे हुआ, क्यों हमने पाई ये सज़ा
अब याद करते हैं अगर तो याद तक आता नहीं देखा था हमने ख्वाब क्या
क्या साज़ क्या जामो-सुबू, रूख़सत हुई हर आरज़ू, चारों पहर लगता है
जैसे चारसू, हैं साकितो-जामिद यहाँ तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ

26. दिल - Javed Akhtar Lava

दिल वो सह्रा था
कि जिस सह्रा में
हसरतें
रेत के टीलों की तरह रहती थीं
जब हवादिस की हवा
उनको मिटाने के लिए
चलती थी
यहाँ मिटती थीं
कहीं और उभर आती थीं
शक्ल खोते ही
नई शक्ल में ढल जाती थीं
दिल के सह्रा पे मगर अब की बार
सानेहा गुज़रा कुछ ऐसा
कि सुनाए न बने
आँधी वो आई कि सारे टीले
ऐसे बिखरे
कि कहीं और उभर ही न सके
यूँ मिटे हैं
कि कहीं और बनाए न बने
अब कहीं
टीले नहीं
रेत नहीं
रेत का ज़र्रा नहीं
दिल में अब कुछ भी नहीं
दिल को सह्रा भी अगर कहिए
तो कैसे कहिए।

27. आरज़ू के मुसाफ़र - Javed Akhtar Lava

जाने किसकी तलाश उनकी आँखों में थी
आरज़ू के मुसाफ़र
भटकते रहे
जितना भी वो चले
उतने ही बिछ गए
राह में फ़ासले
ख्वाब मंज़ल थे
और मंज़लें ख्वाब थीं
रास्तों से निकलते रहे रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

जिनपे सब चलते हैं
ऐसे सब रास्ते छोड़के
एक अंजान पगडंडी की उंगली थामे हुए
इक सितारे से
उम्मीद बाँधे हुए सम्त की
हर गुमाँ को यक़ीं मानके
अपने दिल से
कोई धोखा खाते हुए जानके
सह्रा-सह्रा
समुंदर को वो ढ़ूंढते
कुछ सराबों की जानिब
रहे गामज़न
यूँ नहीं था
कि उनको ख़बर ही न थी
ये समुंदर नहीं
लेकिन उनको कहीं
शायद एहसास था
ये फ़रेब
उनको महवे-सफ़र रक्खेगा
ये सबब था
कि था और कोई सबब
जो लिए उनको फिरता रहा
मंज़िलों-मंज़िलों
रास्ते-रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

अक्सर ऐसा हुआ
शहर-दर-शहर
और बस्ती-बस्ती
किसी भी दरीचे में
कोई चिराग़े-मुहब्बत न था
बेरुख़ी से भरी
सारी गलियों में
सारे मकानों के
दरवाज़े यूँ बंद थे
जैसे इक सर्द
ख़ामोश लहजे में
वो कह रहे हों
मुरव्वत का और मेहरबानी का मस्कन
कहीं और होगा
यहाँ तो नहीं है
यही एक मंज़र समेटे थे
शहरों के पथरीले सब रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

और कभी यूँ हुआ
आरज़ू के मुसाफ़र थे
जलती-सुलगती हुई धूप में
कुछ दरख़्तों ने साये बिछाए मगर
उनको ऐसा लगा
साये में जो सुकून
और आराम है
मंज़लों तक पहुँचने न देगा उन्हें
और यूँ भी हुआ
महकी कलियों ने ख़ुश्बू के पैग़ाम भेजे उन्हें
उनको ऐसा लगा
चंद कलियों पे कैसे क़नाअत करें
उनको तो ढूँढना है
वो गुलशन कि जिसको
किसी ने अभी तक है देखा नहीं
जाने क्यों था उन्हें इसका पूरा यक़ीं
देर हो या सवेर उनको लेकिन कहीं
ऐसे गुलशन के मिल जाएंगे रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

धूप ढलने लगी
बस ज़रा देर में रात हो जाएगी
आरज़ू के मुसाफ़र जो हैं
उनके क़दमों तले
जो भी इक राह है
वो भी शायद अँधेरे में खो जाएगी
आरज़ू के मुसाफ़िर भी
अपने थके-हारे बेजान पैरों पे
कुछ देर तक लड़खड़ाएंगे
और गिरके सो जाएंगे
सिर्फ़ सन्नाटा सोचेगा ये रातभर
मंज़लें तो इन्हें जाने कितनी मिलीं
ये मगर
मंज़लों को समझते रहे जाने क्यों रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

और फिर इक सवेरे की उजली किरन
तीरगी चीर के
जगमगा देगी
जब अनगिनत रहगुज़ारों पे बिखरे हुए
उनके नक़्शे-क़दम
ज़िआफ़यतगाहों में रहनेवाले
ये हैरत से मजबूर होके कहेंगे
ये नक़्शे-क़दम सिर्फ़ नक़्शे-क़दम ही नहीं
ये तो दरयाफ़्त हैं
ये तो ईजाद हैं
ये तो अफ़्कार हैं
ये तो अश्आर हैं
ये कोई रक़्स हैं
ये कोई राग हैं
इनसे ही तो हैं आरास्ता
सारी तहज़ीबो-तारीख़ के
वक़्त के
ज़िंदगी के सभी रास्ते

वो मुसाफ़र मगर
जानते-बूझते भी रहे बेख़बर
जिसको छू लें क़दम
वो तो बस राह थी
उनकी मंज़ल दिगर थी
अलग चाह थी
जो नहीं मिल सके उसकी थी आरज़ू
जो नहीं है कहीं उसकी थी जुस्तुजू
शायद इस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे।

28. बरसों की रस्मो-राह थी इक रोज़ उसने तोड़ दी - Javed Akhtar Lava

बरसों की रस्मो-राह थी इक रोज़ उसने तोड़ दी
हुशियार हम भी कम नहीं, उम्मीद हमने छोड़ दी

गिरहें पड़ी हैं किस तरह, ये बात है कुछ इस तरह
वो डोर टूटी बारहा, हर बार हमने जोड़ दी

उसने कहा कैसे हो तुम, बस मैंने लब खोले ही थे
और बात दुनिया की तरफ़ जल्दी-से उसने मोड़ दी

वो चाहता है सब कहें, सरकार तो बेऐब हैं
जो देख पाए ऐब वो हर आँख उसने फोड़ दी

थोड़ी-सी पाई थी ख़ुशी तो सो गई थी ज़िंदगी
ऐ दर्द तेरा शुक्रिया, जो इस तरह झंझोड़ दी

29. प्यास की कैसे लाए ताब कोई - Javed Akhtar Lava

प्यास की कैसे लाए ताब कोई
नहीं दरिया तो हो सराब कोई

ज़ख़्म दिल में जहाँ महकता है
इसी क्यारी में था गुलाब कोई

रात बजती थी दूर शहनाई
रोया पीकर बहुत शराब कोई

दिल को घेरे हैं रोज़गार के ग़म
रद्दी में खो गई किताब कोई

कौन-सा ज़ख़्म किसने बख़्शा है
इसका रक्खे कहाँ हिसाब कोई

फिर मैं सुनने लगा हूँ इस दिल की
आनेवाला है फिर अज़ाब कोई

शब की दहलीज़ पर शफ़क़ है लहू
फिर हुआ क़त्ल आफ़्ताब कोई

30. बरगद - Javed Akhtar Lava

मेरे रस्ते में इक मोड़ था
और उस मोड़ पर
पेड़ था एक बरगद का
ऊँचा
घना
जिसके साए में मेरा बहुत वक़्त बीता है
लेकिन हमेशा यही मैंने सोचा
कि रस्ते में ये मोड़ ही इसलिए है
कि ये पेड़ है
उम्र की आँधियों में
वो पेड़ एक दिन गिर गया
मोड़ लेकिन है अब तक वहीं का वहीं

देखता हूँ तो
आगे भी रस्ते में
बस मोड़ ही मोड़ हैं
पेड़ कोई नहीं

रास्तों में मुझे यूँ तो मिल जाते हैं मेहरबाँ
फिर भी हर मोड़ पर
पूछता है ये दिल
वो जो इक छाँव थी
खो गई है कहाँ।

31. शबाना - Javed Akhtar Lava

ये आए दिन के हंगामे
ये जब देखो सफ़र करना
यहाँ जाना - वहाँ जाना
इसे मिलना उसे मिलना
हमारे सारे लम्हे
ऐसे लगते हैं
कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले
रेलवे स्टेशनों पर
जल्दी-जल्दी अपने डब्बे ढूँढते
कोई मुसाफ़र हों
जिन्हें कब सांस भी लेने की मुह्लत है
कभी लगता है
तुमको मुझसे मुझको तुमसे मिलने का
ख़याल आए
कहाँ इतनी भी फ़ुर्सत है

मगर जब संगदिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तो
कोई उम्मीद चलते चलते
जब मुँह मोड़ती है तो
कभी कोई ख़ुशी का फूल
जब इस दिल में खिलता है
कभी जब मुझको अपने ज़हन से
कोई ख़याल इन॰आम मिलता है
कभी जब इक तमन्ना पूरी होने से
ये दिल ख़ाली-सा होता है
कभी जब दर्द आके पलकों पे मोती पिरोता है
तो ये एहसास होता है
ख़ुशी हो ग़म हो हैरत हो
कोई जज़्बा हो
इसमें जब कहीं इक मोड़ आए तो
वहाँ पलभर को
सारी दुनिया पीछे छूट जाती है
वहाँ पलभर को
इस कठपुतली जैसी ज़िंदगी की
डोरी-डोरी टूट जाती है
मुझे उस मोड़ पर
बस इक तुम्हारी ही ज़रूरत है
मगर ये ज़िंदगी की ख़ूबसूरत इक हक़ीक़त है
कि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया है
तो हर उस मोड़ पर मैंने
तुम्हें हमराह पाया है।

32. दस्तबरदार अगर आप ग़ज़ब से हो जाएं - Javed Akhtar Lava

दस्तबरदार अगर आप ग़ज़ब से हो जाएं
हर सितम भूलके हम आपके अब से हो जाएं

चौदहवीं शब है तो खिड़की के गिरा दो पर्दे
कौन जाने कि वो नाराज़ ही शब से हो जाएं

एक ख़ुश्बू की तरह फैलते हैं महिफ़ल में
ऐसे अल्फ़ाज़ अदा जो तिरे लब से हो जाएं

न कोई इश्क़ है बाक़ी न कोई परचम है
लोग दीवाने भला किसके सबब से हो जाएं

बाँध लो हाथ कि फैलें न किसी के आगे
सी लो ये लब कि कहीं वा न तलब से हो जाएं

बात तो छेड़ मिरे दिल, कोई क़िस्सा तो सुना
क्या अजब उन के भी जज़्बात अजब से हो जाएं

33. मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं - Javed Akhtar Lava

मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं
तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं

कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ
कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं

कभी तो बात की उसने, कभी रहा ख़ामोश
कभी तो हँसके मिला और कभी मिला भी नहीं

कभी जो तल्ख़-कलामी थी वो भी ख़त्म हुई
कभी गिला था हमें उनसे अब गिला भी नहीं

वो चीख़ उभरी, बड़ी देर गूँजी, डूब गई
हर एक सुनता था लेकिन कोई हिला भी नहीं

34. कच्ची बस्ती - Javed Akhtar Lava

गलियाँ
और गलियों में गलियाँ
छोटे घर
नीचे दरवाज़े
टाट के पर्दे
मैली बदरंगी दीवारें
दीवारों से सर टकराती
कोई गाली
गलियों के सीने पर बहती
गंदी नाली
गलियों के माथे पर बहता
आवाज़ों का गंदा नाला

आवाज़ों की भीड़ बहुत है
इंसानों की भीड़ बहुत है
कड़वे और कसीले चेहरे
बदहाली के ज़हर से हैं ज़हरीले चेहरे
बीमारी से पीले चेहरे
मरते चेहरे
हारे चेहरे
बेबस और बेचारे चेहरे
सारे चेहरे

एक पहाड़ी कचरे की
और उस पर फिरते
आवारा कुत्तों से बच्चे
अपना बचपन ढ़ूँढ रहे हैं

दिन ढलता है
इस बस्ती में रहनेवाले
औरों की जन्नत को अपनी मेहनत देकर
अपने जहन्नम की जानिब
अब थके हुए
झुंझलाए हुए-से
लौट रहे हैं
एक गली में
ज़ंग लगे पीपे रक्खे हैं
कच्ची दारू महक रही है

आज सवेरे से
बस्ती में
क़त्लो-ख़ूँ का
चाकूज़नी का
कोई क़िस्सा नहीं हुआ है
ख़ैर
अभी तो शाम है
पूरी रात पड़ी है

यूँ लगता है
सारी बस्ती
जैसे इक दुखता फोड़ा है
यूँ लगता है
सारी बस्ती
जैसे है इक जलता कढ़ाव
यूँ लगता है
जैसे ख़ुदा नुक्कड़ पर बैठा
टूटे-फूटे इंसाँ
औने-पौने दामों
बेच रहा है।

35. एक शायर दोस्त से - Javed Akhtar Lava

घर में बैठे हुए क्या लिखते हो
बाहर निकलो
देखो क्या हाल है दुनिया का
ये क्या आलम है
सूनी आँखें हैं
सभी ख़ुशियों से ख़ाली जैसे
आओ इन आँखों में ख़ुशियों की चमक हम लिख दें
ये जो माथे हैं
उदासी की लकीरों के तले
आओ इन माथों पे िक़स्मत की दमक हम लिख दें
चेहरों से गहरी ये मायूसी मिटाके
आओ
इनपे उम्मीद की इक उजली किरन हम लिख दें
दूर तक जो हमें वीराने नज़र आते हैं
आओ वीरानों पर अब एक चमन हम लिख दें
ल॰प॰Ìज-दर-लफ्ज़ समुंदर-सा बहे
मौज-ब-मौज
बह्रे-नग़मात में
हर कोहे-सितम हल हो जाए
दुनिया दुनिया न रहे एक ग़ज़ल हो जाए।

36. दिल का हर दर्द खो गया जैसे - Javed Akhtar Lava

दिल का हर दर्द खो गया जैसे
मैं तो पत्थर का हो गया जैसे

दाग बाक़ी नहीं कि नक़्श कहूँ
कोई दीवार धो गया जैसे

जागता ज़हन ग़म की धूप में था
छाँव पाते ही सो गया जैसे

देखनेवाला था कल उस का तपाक
फिर से वो ग़ैर हो गया जैसे

कुछ बिछड़ने के भी तरीक़े हैं
ख़ैर, जाने दो जो गया जैसे

37. अभी ज़मीर में थोड़ी-सी जान बाक़ी है - Javed Akhtar Lava

अभी ज़मीर में थोड़ी-सी जान बाक़ी है
अभी हमारा कोई इम्तेहान बाक़ी है

हमारे घर को तो उजड़े हुए ज़माना हुआ
मगर सुना है अभी वो मकान बाक़ी है

हमारी उनसे जो थी गुफ़्तगू, वो ख़त्म हुई
मगर सुकूत-सा कुछ दरमियान बाक़ी है

हमारे ज़हन की बस्ती में आग ऐसी लगी
कि जो था ख़ाक हुआ इक दुकान बाक़ी है

वो ज़ख़्म भर गया अर्सा हुआ मगर अबतक
ज़रा-सा दर्द ज़रा-सा निशान बाक़ी है

ज़रा-सी बात जो फैली तो दास्तान बनी
वो बात ख़त्म हुई दास्तान बाक़ी है

अब आया तीर चलाने का फ़न तो क्या आया
हमारे हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है

38. ये मुझसे पूछते हैं चारागर क्यों - Javed Akhtar Lava

ये मुझसे पूछते हैं चारागर क्यों
कि तू ज़िंदा तो है अब तक, मगर क्यों

जो रस्ता छोड़के मैं जा रहा हूँ
उसी रस्ते पे जाती है नज़र क्यों

थकन से चूर पास आया था इसके
गिरा सोते में मुझपर ये शजर क्यों

सुनाएंगे कभी फ़ुर्सत में तुम को
कि हम बरसों रहे हैं दरबदर क्यों

यहाँ भी सब हैं बेगाना ही मुझसे
कहूँ मैं क्या कि याद आया है घर क्यों

मैं ख़ुश रहता अगर समझा न होता
ये दुनिया है तो मैं हूँ दीदावर क्यों

39. ज़िंदगी की आँधी में ज़हन का शजर तन्हा - Javed Akhtar Lava

ज़िंदगी की आँधी में ज़हन का शजर तन्हा
तुमसे कुछ सहारा था, आज हूँ मगर तन्हा

ज़ख़्म-ख़ुर्दा लम्हों को मसलेहत संभाले है
अनगिनत मरीज़ों में एक चारागर तन्हा

बूँद जब थी बादल में ज़िंदगी थी हलचल में
क़ैद अब सदफ़ में है बनके है गुहर तन्हा

तुम फ़ुज़ूल बातों का दिल पे बोझ मत लेना
हम तो ख़ैर कर लेंगे ज़िंदगी बसर तन्हा

इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
ढूँढता फिरा उसको वो नगर-नगर तन्हा

झुटपुटे का आलम है जाने कौन आदम है
इक लहद पे रोता है मुँह को ढाँपकर तन्हा

40. वो ज़माना गुज़र गया कब का - Javed Akhtar Lava

वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का

ढ़ूँढता था जो इक नई दुनिया
लौटके अपने घर गया कब का

वो जो लाया था हमको दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का

उसका जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का

ख्वाब-दर-ख्वाब था जो शीराज़ा
अब कहाँ है, बिखर गया कब का

41. ये दुनिया तुमको रास आए तो कहना - Javed Akhtar Lava

ये दुनिया तुमको रास आए तो कहना
न सर पत्थर से टकराए तो कहना

ये गुल काग़ज़ हैं, ये ज़ेवर हैं पीतल
समझ में जब ये आ जाए तो कहना

बहुत ख़ुश हो कि उसने कुछ कहा है
न कहकर वो मुकर जाए तो कहना

बहल जाओगे तुम ग़म सुनके मेरे
कभी दिल ग़म से घबराए तो कहना

धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है
न पूरे शहर पर छाए तो कहना

42. बरवक़्त एक और ख़याल - Javed Akhtar Lava

ख़याल आता है
जैसे बच्चों की आँख बादल में
शेर और हाथी देखती है
बहुत-से लोगों ने
वक़्त में भी
शऊर बीनाई और समाअत
के वस्फ़ देखे
बहुत-से लोगों की जुस्तुजू के सफ़र का अंजाम
इस अक़ीदे की छाँव में है
कि वक़्त कहते हैं जिसको
दर अस्ल वो ख़ुदा है

मगर है जिसको तलाश सच की
भटक रहा है

ये इक सवाल
उसके ज़हनो-दिल में
खटक रहा है
ये वक़्त क्या है?

43. अजीब आदमी था वो - Javed Akhtar Lava

(कैफ़ी साहब)

अजीब आदमी था वो
मुहब्बतों का गीत था,
बग़ावतों का राग था
कभी वो सिर्फ़ फूल था
कभी वो सिर्फ़ आग था
अजीब आदमी था वो

वो मुफ़लिसों से कहता था
कि दिन बदल भी सकते हैं
वो जाबिरों से कहता था
तुम्हारे सर पे सोने के जो ताज हैं
कभी पिघल भी सकते हैं

वो बंदिशों से कहता था
मैं तुमको तोड़ सकता हूँ
सहूलतों से कहता था
मैं तुमको छोड़ सकता हूँ
हवाओं से वो कहता था
मैं तुमको मोड़ सकता हूँ

वो ख्वाब से ये कहता था
कि तुझको सच करूँगा मैं
वो आरज़ू से कहता था
मैं तेरा हमसफ़र हूँ
तेरे साथ ही चलूँगा मैं
तू चाहे जितनी दूर भी
बना ले अपनी मंज़लें
कभी नहीं थकूँगा मैं

वो ज़िंदगी से कहता था
कि तुझको मैं सजाऊँगा
तू मुझसे चाँद माँग ले
मैं चाँद लेके आऊँगा

वो आदमी से कहता था
कि आदमी से प्यार कर
उजड़ रही है ये ज़मीं
कुछ इसका अब सिंघार कर

अजीब आदमी था वो

वो ज़िंदगी के सारे ग़म
तमाम दुख
हर इक सितम से कहता था
मैं तुमसे जीत जाऊँगा
कि तुमको तो मिटा ही देगा
एक रोज़ आदमी
भुला ही देगा ये जहाँ
मिरी अलग है दास्ताँ

वो आँखें जिनमें ख्वाब हैं
वो दिल है जिनमें आरज़ू
वो बाज़ू जिनमें है सकत
वो होंठ जिनपे लफ्ज़ हैं
रहूँगा उनके दरमियाँ
कि जब मैं बीत जाऊँगा

अजीब आदमी था वो।

44. आज मैंने अपना फिर सौदा किया - Javed Akhtar Lava

आज मैंने अपना फिर सौदा किया
और फिर मैं दूर से देखा किया

ज़िंदगी भर मेरे काम आए उसूल
एक-इक करके उन्हें बेचा किया

बँध गई थी दिल में कुछ उम्मीद-सी
ख़ैर, तुमने जो किया अच्छा किया

कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी
तुमसे क्या कहते कि तुमने क्या किया

क्या बताऊँ कौन था जिसने मुझे
इस भरी दुनिया में है तन्हा किया

45. मेले - Javed Akhtar Lava

बाप की उँगली थामे
इक नन्हा-सा बच्चा
पहले-पहल मेले में गया तो
अपनी भोली-भाली
कंचों जैसी आँखों से
इक दुनिया देखी
ये क्या है और वो क्या है
सब उसने पूछा
बाप ने झुककर
कितनी सारी चीज़ों और खेलों का
उसको नाम बताया
नट का
बाज़ीगर का
जादूगर का
उसको काम बताया
फिर वो घर की जानिब लौटे
गोद के झूले में
बच्चे ने बाप के कंधे पर सर रक्खा
बाप ने पूछा
नींद आती है

वक़्त भी एक परिंदा है
उड़ता रहता है

गाँव में फिर इक मेला आया
बूढ़े बाप ने काँपते हाथों से
बेटे की बांह को थामा
और बेटे ने
ये क्या है और वो क्या है
जितना भी बन पाया
समझाया
बाप ने बेटे के कंधे पर सर रक्खा
बेटे ने पूछा
नींद आती है
बाप ने मुड़के
याद की पगडंडी पर चलते
बीते हुए
सब अच्छे-बुरे
और कड़वे-मीठे
लम्हों के पैरों से उड़ती
धूल को देखा
फिर
अपने बेटे को देखा
होंठों पर
इक हलकी-सी मुस्कान आ7
हौले-से बोला
हाँ!
मुझको अब नींद आती है।

46. मोनताज - Javed Akhtar Lava

नींद के बादलों के पीछे है
मुस्कुराता हुआ कोई चेहरा
चेहरे पे बिखरी एक रेशमी लट
सरसराता हुआ कोई आँचल
और दो आँखें हैराँ-हैराँ-सी

इक मुलाक़ात
इक हसीं लम्हा
झील का ठहरा-ठहरा-सा पानी
पेड़ पर चहचहाती इक चिड़िया
घास पर खिलते नन्हे-नन्हे फूल
ख़ूबसूरत लबों पे नर्म-सी बात

दोपहर एक पीली-पीली-सी
बर्फ़-सी ठंडक एक लहजे में
टूटा आईना
उड़ते कुछ कागज़
मुन्हदिम पुल
अधूरी एक सड़क
किरचों-किरचों बिखरता इक मंज़र
पलकों पर झिलमिलाता एक आँसू
गहरा सन्नाटा शोर करता हुआ
नींद के बादलों के पीछे है।

47. किसलिए कीजे बज़्म-आराई - Javed Akhtar Lava

किसलिए कीजे बज़्म-आराई
पुरसुकूँ हो गई है तन्हाई

फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है
फिर ख़यालात ने ली अंगड़ाई

यूँ सुकूँ-आशना हुए लम्हे
बूँद में जैसे आए गहराई

इक से इक वाक़आ हुआ लेकिन
न गई तेरे ग़म की यकताई

कोई शिकवा न ग़म, न कोई याद
बैठे-बैठे बस आँख भर आई

ढलकी शानों से हर यक़ीं की क़बा
ज़िंदगी ले रही है अंगड़ाई

48. न ख़ुशी दे तो कुछ दिलासा दे - Javed Akhtar Lava

न ख़ुशी दे तो कुछ दिलासा दे
दोस्त, जैसे हो मुझको बहला दे

आगही से मिली है तन्हाई
आ मिरी जान मुझको धोका दे

अब तो तक्मील की भी शर्त नहीं
ज़िंदगी अब तो इक तमन्ना दे

ऐ सफ़र इतना राएगाँ तो न जा
न हो मंज़िल कहीं तो पहुँचा दे

तर्क करना है गर तअल्लुक़ तो
ख़ुद न जा तू किसी से कहला दे

49. पन्द्रह अगस्त - Javed Akhtar Lava

(ये नज़्म अगस्त को हिंदुस्तानी पार्लियामेंट में
उसी जगह सुनाई गई थी जहाँ से अगस्त में
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आज़ादी का एलान किया था)

यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हात
सरों पे छाई थी सदियों से इक जो काली रात
इसी जगह इसी दिन तो मिली थी उसको मात
इसी जगह इसी दिन तो हुआ था ये एलान
अँधेरे हार गए ज़िंदाबाद हिंदुस्तान
यहीं तो हमने कहा था ये कर दिखाना है
जो ज़ख़्म तन पे है भारत के उसको भरना है
जो दाग़ माथे पे भारत के है मिटाना है
यहीं तो खाई थी हम सबने ये क़सम उस दिन
यहीं से निकले थे अपने सफ़र पे हम उस दिन
यहीं था गूँज उठा वंदे मातरम् उस दिन

है जुरअतों का सफ़र वक़्त की है राहगुज़र
नज़र के सामने है साठ मील का पत्थर
कोई जो पूछे किया क्या है कुछ किया है अगर
तो उससे कह दो कि वो आए देख ले आकर
लगाया हमने था जम्हूरियत का जो पौधा
वो आज एक घनेरा-सा ऊँचा बरगद है
और उसके साये में क्या बदला, कितना बदला है
कब इन्तेहा है कोई इसकी कब कोई हद है

चमक दिखाते हैं ज़र्रे अब आस्मानों को
ज़बान मिल गई है सारे बेज़बानों को
जो ज़ुल्म सहते थे वो अब हिसाब माँगते हैं
सवाल करते हैं और फिर जवाब मांगते हैं
ये कल की बात है सदियों पुरानी बात नहीं
कि कल तलक था यहाँ कुछ भी अपने हाथ नहीं
विदेशी राज ने सब कुछ निचोड़ डाला था
हमारे देश का हर करघा तोड़ डाला था
जो मुल्क सूई की ख़ातिर था औरों का मोहताज
हज़ारों चीज़ें वो दुनिया को दे रहा है आज
नया ज़माना लिये इक उमंग आया है
करोड़ों लोगों के चेहरे पे रंग आया है
ये सब किसी के करम से, न है इनायत से
यहाँ तक आया है भारत ख़ुद अपनी मेहनत से

जो कामयाबी है उसकी ख़ुशी तो पूरी है
मगर ये याद भी रखना बहुत ज़रूरी है
कि दास्तान हमारी अभी अधूरी है
बहुत हुआ है मगर फिर भी ये कमी तो है
बहुत-से होंठों पे मुस्कान आ गई लेकिन
बहुत-सी आँखें हैं जिनमें अभी नमी तो है

यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हात
यहीं तो देखा था इक ख्वाब सोची थी इक बात
मुसाफ़रों के दिलों में ख़याल आता है
हर इक ज़मीर के आगे सवाल आता है
वो बात याद है अब तक हमें कि भूल गए
वो ख्वाब अब भी सलामत हैं या फ़ुज़ूल गए
चले थे दिल में लिए जो इरादे पूरे हुए
जो हमने ख़ुद से किए थे वो वादे पूरे हुए
ये कौन है कि जो यादों में च॰र्खा कातता है
ये कौन है जो हमें आज भी बताता है
है वादा ख़ुद से निभाना हमें अगर अपना
तो कारवाँ नहीं रूक पाये भूलकर अपना
है थोड़ी दूर अभी सपनों का नगर अपना
मुसाफ़रो अभी बाक़ी है कुछ सफ़र अपना ।

50. मैं ख़ुद भी कब ये कहता हूँ कोई सबब नहीं - Javed Akhtar Lava

मैं ख़ुद भी कब ये कहता हूँ कोई सबब नहीं 
तू सच है मुझको छोड़ भी दे तो अजब नहीं

वापस जो चाहो जाना तो जा सकते हो मगर
अब इतनी दूर आ गए हम, देखो अब नहीं

ज़र का, ज़रूरतों का, ज़माने का, दोस्तो
करते तो हम भी हैं मगर इतना अदब नहीं

मेरा ख़ुलूस है तो हमेशा के वास्ते
तेरा करम नहीं है कि अब है और अब नहीं

आए वो रोज़ो-शब कि जो चाहे थे रोज़ो-शब
तो मेरे रोज़ो-शब भी मिरे रोज़ो-शब नहीं

दुनिया से क्या शिकायतें,लोगों से क्या गिला
हमको ही ज़िंदगी से निभाने का ढब नहीं

51. हमसाये के नाम - Javed Akhtar Lava

कुछ तुमने कहा
कुछ मैंने कहा
और बढ़ते-बढ़ते बात बढ़ी
दिल ऊब गया
दिन डूब गया
और गहरी-काली रात बढ़ी

तुम अपने घर
मैं अपने घर
सारे दरवाज़े बंद किए
बैठे हैं कड़वे घूंट पिए
ओढ़े हैं ग़ुस्से की चादर

कुछ तुम सोचो
कुछ मैं सोचूँ
क्यों ऊँची हैं ये दीवारें
कब तक हम इन पर सर मारें
कब तक ये अँधेरे रहने हैं
कीना के ये घेरे रहने हैं
चलो अपने दरवाज़े खोलें
और घर से बाहर आएं हम
दिल ठहरे जहाँ हैं बरसों से
वो इक नुक्कड़ है नफ़रत का
कब तक इस नुक्कड़ पर ठहरें
अब उसके आगे जाएं हम
बस थोड़ी दूर इक दरिया है
जहाँ एक उजाला बहता है
वाँ लहरों-लहरों हैं किरनें
और किरनों-किरनों हैं लहरें
उन किरनां में
उन लहरों में
हम दिल को ख़ूब नहाने दें
सीनों में जो इक पत्थर है
उस पत्थर को घुल जाने दें
दिल के इक कोने में भी छुपी
गर थोड़ी-सी भी नफ़रत है
उस नफ़रत को धुल जाने दें
दोनों की तरफ़ से जिस दिन भी
इज़्हार नदामत का होगा
तब जश्न मुहब्बत का होगा।

52. हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है - Javed Akhtar Lava

हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है
मगर वो बात पहले-सी नहीं है

मुझे मायूस भी करती नहीं है
यही आदत तिरी अच्छी नहीं है

बहुत-से फ़ायदे हैं मसलेहत में
मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है

हर इक की दास्ताँ सुनते हैं जैसे
कभी हमने मुहब्बत की नहीं है

है इक दरवाज़ा बिन दीवार दुनिया
मफ़र ग़म से यहाँ कोई नहीं है

53. याद उसे भी एक अधूरा अफ़साना तो होगा - Javed Akhtar Lava

याद उसे भी एक अधूरा अफ़साना तो होगा
कल रस्ते में उसने हमको पहचाना तो होगा

डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल, अब जाना तो होगा

कुछ बातों के मतलब हैं और कुछ मतलब की बातें
जो ये ॰फ़॰र्क समझ लेगा वो दीवाना तो होगा

दिल की बातें नहीं हैं तो दिलचस्प ही कुछ बातें हों
ज़िंदा रहना है तो दिल को बहलाना तो होगा

जीत के भी वो शर्मिंदा है, हार के भी हम नाज़ाँ
कम से कम वो दिल ही दिल में ये माना तो होगा

54. दर्द कुछ दिन तो मेह्माँ ठहरे - Javed Akhtar Lava

दर्द कुछ दिन तो मेह्माँ ठहरे
हम बिज़द हैं कि मेज़बाँ ठहरे

सिर्फ़ तन्हाई सिर्फ़ वीरानी
ये नज़र जब उठे जहाँ ठहरे

कौन-से ज़ख़्म पर पड़ाव किया
दर्द के क़ाफ़ले कहाँ ठहरे

कैसे दिल में ख़ुशी बसा लूँ मैं
कैसे मुटठी में ये धुआँ ठहरे

थी कहीं मसलेहत कहीं जुअर्त
हम कहीं इनके दरमियाँ ठहरे

55. पेड़ से लिपटी बेल - Javed Akhtar Lava

एक पुराने
और घनेरे पेड़ की इक डाली से लिपटी
बेल में
सारी पेड़ की रंगत
पेड़ की ख़ुश्बू
समा गई थी
बेल भी पेड़ का इक हिस्सा थी
पेड़ के बारे में
यूँ तो सौ अफ़्साने थे
बेल का कोई ज़िंक्र नहीं था
वो ख़ामोश-सा इक क़िस्सा थी

पेड़ पे रंगों का मौसम था
बेल पे जैसे
हल्की-सी मुस्कान के
नन्हें फूल खिले थे
लेकिन
फिर ये मौसम बदला
और बड़ी ज़हरीली हवाएं
पेड़ गिराने
चारों दिशाओं से जब लपकीं
यूँ लगता था
पेड़ हवा में
पत्ता-पत्ता बिखर रहा है
यूँ लगता था
सारी शाखें टूट रही हैं
यूँ लगता था
सारी जड़ें अब उखड़ रही हैं
पल दो पल में
पेड़ ज़मीं पर
मुँह के बल गिरनेवाला है
पर जो हुआ
वो क़िस्सा भी सुनने वाला है

पेड़ जो काँपा
बेल के तन-मन में जैसे
इक बिजली दौड़ी
रेशम जैसी बेल का रेशा-रेशा
जैसे लोहे का इक तार बना
और बेल ने
सारी टूटी शाख़ों को
यूँ बाँधा
पेड़ के सारे घायल तन को
यूँ लिपटाया
पेड़ की हर ज़ख़्मी डाली को
कुछ यूँ थामा
जितनी थीं ज़हरीली हवाएं
पेड़ से सर टकरा-टकरा के
हार गई हैं
हाँप रही हैं
होके परीशाँ
हक्का-बक्का देख रही हैं

वक़्त के भी हैं खेल निराले
बेल अपनी बाँहों में अब है पेड़ संभाले
धीरे-धीरे
घायल शाख़ों पर
पत्ते फिर निकल रहे हैं
धीरे-धीरे
नई जड़ें फूटी हैं
और धरती में गहरी उतर रही हैं
बेल पे जैसे
एक नई मुस्कान के नन्हे फूल खिले हैं।


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