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Aalam Sheikh आलम शेख

 

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Aalam Sheikh
आलम शेख

आलम जाति के ब्राह्मण थे, पर शेख नाम की रँगरेजिन के प्रेम में मुसलमान हो गए और उसके साथ विवाह करके रहने लगे। आलम को शेख से जहान नामक एक पुत्र भी हुआ। ये औरंगजेब के दूसरे बेटे मुअज्जम (बहादुरशाह-1) के आश्रय में रहते थे । अत: आलम का कविताकाल संवत् 1740, से संवत् 1760 तक माना जाता है। 

शेख रँगरेजिन भी अच्छी कविता करती थी। आलम के साथ प्रेम होने की विचित्र कथा प्रसिद्ध है। कहते हैं कि आलम ने एक बार उसे पगड़ी रँगने को दी जिसकी खूँट में भूल से कागज का एक चिट बँधा चला गया। उस चिट में दोहे की यह आधी पंक्ति लिखी थी 'कनक छरीसी कामिनी काहे को कटि छीन'। शेख ने दोहा इस तरह पूरा करके 'कटि को कंचन कटि बिधि कुचन मध्य धरि दीन', उस चिट को फिर ज्योंकी त्यों पगड़ी की खूँट में बाँधकर लौटा दिया। उसी दिन से आलम शेख के पूरे प्रेमी हो गए और विवाह कर लिया। 'आलमकेलि' में बहुत से कवित्त शेख के रचे हुए हैं।

आलम के कवित्त सवैयों में भी बहुत-सी रचना शेख की मानी जाती है। आलम रीतिबद्ध रचना करने वाले कवि नहीं थे। ये प्रेमोन्मत्त कवि थे और अपनी तरंग के अनुसार रचना करते थे। 

आलम शेख की कविता: माधवानल-कामकंदला, श्याम-सनेही, सुदामा चरित और आलम-केलि


आलम शेख की कविता

आलम-केलि आलम शेख

आलम शेख की विविध कविता