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महादेवी वर्मा की कविता Mahadevi Verma ki Kavita

महादेवी वर्मा की कविता
Mahadevi Verma Ki Kavita

कहाँ रहेगी चिड़िया mahadevi verma

कहाँ रहेगी चिड़िया?

आंधी आई जोर-शोर से,

डाली टूटी है झकोर से,

उड़ा घोंसला बेचारी का,

किससे अपनी बात कहेगी?

 

अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?

 

घर में पेड़ कहाँ से लाएँ?

कैसे यह घोंसला बनाएँ?

कैसे फूटे अंडे जोड़ें?

किससे यह सब बात कहेगी,

अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?

 

कोयल mahadevi verma

डाल हिलाकर आम बुलाता

तब कोयल आती है।

नहीं चाहिए इसको तबला,

नहीं चाहिए हारमोनियम,

छिप-छिपकर पत्तों में यह तो

गीत नया गाती है!

 

चिक्-चिक् मत करना रे निक्की,

भौंक न रोजी रानी,

गाता एक, सुना करते हैं

सब तो उसकी बानी।

 

आम लगेंगे इसीलिए यह

गाती मंगल गाना,

आम मिलेंगे सबको, इसको

नहीं एक भी खाना।

 

सबके सुख के लिए बेचारी

उड़-उड़कर आती है,

आम बुलाता है, तब कोयल

काम छोड़ आती है।

 

(नंदन-मई, 2005)

 

आओ प्यारे तारो आओ mahadevi verma

आओ, प्यारे तारो आओ

तुम्हें झुलाऊँगी झूले में,

तुम्हें सुलाऊँगी फूलों में,

तुम जुगनू से उड़कर आओ,

मेरे आँगन को चमकाओ।

 

mahadevi-verma

 

तितली से mahadevi verma

मेह बरसने वाला है

मेरी खिड़की में आ जा तितली।

 

बाहर जब पर होंगे गीले,

धुल जाएँगे रंग सजीले,

झड़ जाएगा फूल, न तुझको

बचा सकेगा छोटी तितली,

खिड़की में तू आ जा तितली!

 

नन्हे तुझे पकड़ पाएगा,

डिब्बी में रख ले जाएगा,

फिर किताब में चिपकाएगा

मर जाएगी तब तू तितली,

खिड़की में तू छिप जा तितली।

 

स्वप्न से किसने जगाया (वसंत) mahadevi verma

स्वप्न से किसने जगाया?

मैं सुरभि हूँ।

 

छोड़ कोमल फूल का घर

ढूँढती हूं कुंज निर्झर।

पूछती हूँ नभ धरा से-

क्या नहीं ऋतुराज आया?

 

मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत

मै अग-जग का प्यारा वसंत।

 

मेरी पगध्वनि सुन जग जागा

कण-कण ने छवि मधुरस माँगा।

नव जीवन का संगीत बहा

पुलकों से भर आया दिगंत।

 

मेरी स्वप्नों की निधि अनंत

मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत।

 

अबला mahadevi verma

आता है अब ध्यान कभी हम भी थीं देवी ।

उन्नति गौरव रहे हमारे ही पद सेवी ।।

अधिकृत हमसे हुई शक्तियां सारी दैवी ।

पाती थीं हम मान बनी वसुधा की देवी ।।

शोभित हमसे हुई भूमि भारत की पावन ।

सुरभित हमसे हुआ प्रकृति उद्यान सुहावन ।।

नलिनी सम हम रहीं विश्व-सर बीच लुभावन ।

मंडित हमने किया मातृ का सुंदर आनन ।।

विद्या विद्याधरी सुगुण मंडित कमला सी ।

दुर्गासिंहारूढ़ वीर जननी विदुला सी ।।

सीता सी पतिव्रता प्रेम प्रतिमा विमला सी ।

थी हम ही में हुयी सुभारत कीर्ति कला सी ।।

आज हमारी दशा हुई हा ! अनवत दीना ।

क्षमता समता गई हुईं हम गौरव हीना ।।

कीर्ति कौमुदी हुई राहु से ग्रसित मलीना ।

जीवन का आदर्श दैव निष्ठुर ने छीना ।।

ज्ञान तजा अज्ञान हृदय में आन बसाया ।

अपना पहिला स्वत्व और कर्तव्य भुलाया ।।

पहिला स्वर्गिक प्रेम नेम हमने बिसराया ।

निष्प्रभ जीवन हुआ मान-सम्मान गंवाया ।।

 

 

 

क्या है अपनी दीन-हीन अवनति का कारण ।

क्यों हमने कर लिया कलेवर उलटा धारण ।।

क्यों अब करती नहीं सत्य पर जीवन वारण ।

सोचो तो हे बंधु देश के कष्ट निवारण ।।

शेष न गौरव रहा न पहिले सी समता है ।

शुष्क हुआ वह सुमन न पहिली कोमलता है ।।

रत्न हो गया काँच न वैसी मंजुलता है ।

 

समझो इसका हेतु बंधु तव निर्दयता है ।।

प्यासे मृग के हेतु लखो मृगतृष्णा जैसी ।

अगम सिंधु के बीच भीत बालू की जैसी ।।

राज्य-भोग की प्राप्ति स्वप्न में सुखकर जैसी ।

बिना हमारा साथ देश की उन्नति वैसी ।।

 

आओ निद्रा छोड़ ज्ञान के नेत्र उघारें ।

अपना-अपना आज सत्य कर्तव्य विचारें ।।

परिवर्तित हो स्वयं देश का कष्ट निवारें ।

सत्यव्रती बन मातृ-भूमि पर लोचन वारें ।।

दिखला देवें आज हमीं सुखदा कमला हैं ।

निश्छल महिमा-मूर्ति सत्य-प्रतिमा सरला हैं ।।

जीवन पथ पर स्थिर सभी विधि हम सबला हैं ।

धर्म-भीरुता हेतु बनी केवल अबला हैं ।।

('चाँद', जनवरी, 1923 ई.)

 

विधवा mahadevi verma

क्यों व्याकुल हो विरहाकुल हो, शोकाकुल हो प्यारी भगिनी ।

संतापित हो अविकासित हो, सर भारत की न्यारी नलिनी ।।

आश नहीं अभिलाष नहीं, नि:सार तुम्हारे जीवन में ।

क्यों तोष नहीं परितोष नहीं, निर्दोष दुखारे जीवन में ।।

पावनता की पूर्ति अहो, मृतप्राय हुई वैधव्य हनी ।

करुणोत्पादक मूर्ति लखो, अति दीन हुई दुखरूप बनी ।।

हा हन्त हुई यह दीन दशा, फिर स्वार्थ दली दुर्दैव छली ।

नव कोमल जीवन की कलिका, हा सूख चली बिन पूर्ण-खिली ।।

अंबर तन जीर्ण मलीन खुले, कच रुक्ष हुए श्रृंगार नहीं ।

मधुराधर पै मुस्कान नहीं, उर में आशा संचार नहीं ।।

 

 

 

दीन हुई श्रीहीन हुई, मझधार वही भवसागर में ।

आधार गया सुखसार गया, और आश रही करुणाकर में ।।

देशबंधु यदि नहीं कभी तुम, इनकी ओर निहारोगे ।

दैव पीड़िता विधवायों का, दारुण कष्ट निवारोगे ।।

पाप मूर्ति बन जाएँगी, हैं जो पावनता-पूर्ति अभी ।

तुम भी होगे हीन, नहीं पावोगे उन्नति कीर्ति कभी ।।

('चाँद', जनवरी, 1923 ई.)

 

मधुर मधु-सौरभ जगत् को mahadevi verma

मधुर मधु-सौरभ जगत् को स्वप्न में बेसुध बनाता

वात विहगों के विपिन के गीत आता गुनगुनाता !

मैं पथिक हूँ श्रांत, कोई पथ प्रदर्शक भी न मेरा !

चाहता अब प्राण अलसित शून्य में लेना बसेरा !

(जापानी कवि योनेजिरो नोगुचि की कविता का अनुवाद)

(चाँद-1937 ई.)

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