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Jaan Nisar Akhtar - Ek Jawan Maut - Gazal

Hindi Kavita
हिंदी कविता

shayari-jaan-nisar
जाँ निसार अख़्तर-एक जवान मौत - ग़ज़लें(toc)

जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं - Jaan Nisar Akhtar

जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
देखना ये है कि अब आग किधर लगती है
 
सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है
हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे - Jaan Nisar Akhtar

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे
ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे
 
जो आँसू में कभी रात भीग जाती है
बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे
 
मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आँखों में
तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे
 
मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ
वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे
 
मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह
ये मेरा गाओँ तो पहचाना सा लगे है मुझे
 
बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद
हर एक फ़र्द कोई सानेहा लगे है मुझे

आज मुद्दत में वो याद आये हैं - Jaan Nisar Akhtar

आज मुद्दत में वो याद आये हैं
दरोदीवार पे कुछ साए हैं
 
आबगीनों से न टकरा पाए
कोहसारों से जो टकराए हैं
 
जिंदगी तेरे हवादिस हम को
कुछ न कुछ राह पे ले आये हैं
 
इतने मायूस तो हालात नहीं
लोग किस वास्ते घबराए हैं
 
उनकी जानिब न किसी ने देखा
जो हमें देख के शर्माए हैं
 
संगरेज़ों से खज़फ़ पारों से
कितने हीरे कभी चुन लाये हैं

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो - Jaan Nisar Akhtar

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
 
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शर्माए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
 
संदल सी महकती हुई पुरकैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो
 
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नदी कोई बलखाये तो लगता है कि तुम हो

वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं - Jaan Nisar Akhtar

वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं
जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं
 
तूफ़ानों की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन
लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं
 
उनको न पुकारों गमेदौरां के लक़ब से
जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं
 
हम भी तेरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन
कुछ और भी चेहरे हमें मरगूब रहे हैं
 
इस अहदे बसीरत में भी नक्क़ाद हमारे
हर एक बड़े नाम से मरऊब रहे हैं

मौजे गुल, मौजे सबा, मौजे सहर लगती हैं - Jaan Nisar Akhtar

मौजे गुल, मौजे सबा, मौजे सहर लगती हैं
सर से पा' तक वो समाँ है कि नज़र लगती है
 
हमने हर गाम पे सजदों के जलाये हैं चराग़
अब तेरी राहगुज़र राहगुज़र लगती है
 
लम्हे-लम्हे में बसी है तेरी यादों की महक
आज की रात तो ख़ुशबू का सफ़र लगती है

हम से भागा न करो दूर गज़ालों की तरह - Jaan Nisar Akhtar

हम से भागा न करो दूर गज़ालों की तरह
हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह
 
खुद-बा-खुद नींद-सी आँखों में घुली जाती है
महकी महकी है शब्-ए-गम तेरे बालों की तरह
 
और क्या इस से जियादा कोई नरमी बरतूं
दिल के ज़ख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह
 
और तो मुझ को मिला क्या मेरी मेहनत का सिला
चाँद सिक्के हैं मेरे हाथ में छालों की तरह
 
ज़िन्दगी जिस को तेरा प्यार मिला वो जाने
हम तो नाकाम रहे चाहने वालों की तरह

एक तो नैनां कजरारे और तिस पर डूबे काजल में - Jaan Nisar Akhtar

एक तो नैनां कजरारे और तिस पर डूबे काजल में
बिजली की बढ़ जाए चमक कुछ और भी गहरे बादल में
 
आज ज़रा ललचायी नज़र से उसको बस क्या देख लिया
पग-पग उसके दिल की धड़कन उतर आई पायल में
 
प्यासे-प्यासे नैनां उसके जाने पगली चाहे क्या
तट पर जब भी जावे, सोचे, नदिया भर लूं छागल में
 
गोरी इस संसार में मुझको ऐसा तेरा रूप लगे
जैसे कोई दीप जला दे घोर अंधेर जंगल में
 
प्यार की यूं हर बूंद जला दी मैंने अपने सीने में
जैसे कोई जलती माचिस डाल दे पीकर बोतल में

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था - Jaan Nisar Akhtar

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था
 
मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझ को
वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था
 
शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे
कुछ इस तरह से तूने बदन चुराया था
 
गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था
 
पता नहीं कि मेरे बाद उन पे क्या गुज़री
मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये - Jaan Nisar Akhtar

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये
 
तिश्नगी कुछ तो बुझे तिश्नालब-ए-ग़म की
इक नदी दर्द के शहरों में बहा दी जाये
 
दिल का वो हाल हुआ ऐ ग़म-ए-दौराँ के तले
जैसे इक लाश चट्टानों में दबा दी जाये
 
हम ने इंसानों के दुख दर्द का हल ढूँढ लिया
क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाये
 
हम को गुज़री हुई सदियाँ तो न पहचानेंगी
आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाये
 
फूल बन जाती हैं दहके हुए शोलों की लवें
शर्त ये है के उन्हें ख़ूब हवा दी जाये
 
कम नहीं नशे में जाड़े की गुलाबी रातें
और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाये
 
हम से पूछो ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या है
चन्द लफ़्ज़ों में कोई आह छुपा दी जाये

हमने काटी हैं तिरी याद में रातें अक़्सर - Jaan Nisar Akhtar

हमने काटी हैं तिरी याद में रातें अक़्सर
दिल से गुज़री हैं सितारों की बरातें अक़्सर
 
और तो कौन है जो मुझको तसल्ली देता
हाथ रख देती हैं दिल पर तिरी बातें अक़्सर
 
हुस्न शाइस्ता-ए-तहज़ीब-ए-अलम है शायद
ग़मज़दा लगती हैं क्यों चाँदनी रातें अक़्सर
 
हाल कहना है किसी से तो मुख़ातिब हो कोई
कितनी दिलचस्प, हुआ करती हैं बातें अक़्सर
 
इश्क़ रहज़न न सही, इश्क़ के हाथों फिर भी
हमने लुटती हुई देखी हैं बरातें अक़्सर
 
हम से इक बार भी जीता है न जीतेगा कोई
वो तो हम जान के खा लेते हैं मातें अक़्सर
 
उनसे पूछो कभी चेहरे भी पढ़े हैं तुमने
जो किताबों की किया करते हैं बातें अक़्सर
 
हमने उन तुन्द हवाओं में जलाये हैं चिराग़
जिन हवाओं ने उलट दी हैं बिसातें अक़्सर

फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो - Jaan Nisar Akhtar

फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो
ये न सोचो कि अभी उम्र पड़ी है यारो
 
अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको
ज़िन्दगी शम्अ लिए दर पे खड़ी है यारो
 
हमने सदियों इन्हीं ज़र्रो से मोहब्बत की है
चाँद-तारों से तो कल आँख लड़ी है यारो
 
फ़ासला चन्द क़दम का है, मना लें चलकर
सुबह आयी है मगर दूर खड़ी है यारो
 
किसकी दहलीज़ पे ले जाके सजायें इसको
बीच रस्ते में कोई लाश पड़ी है यारो
 
जब भी चाहेंगे ज़माने को बदल डालेंगे
सिर्फ़ कहने के लिए बात बड़ी है यारो
 
उनके बिन जी के दिखा देंगे उन्हें, यूँ ही सही
बात अपनी है कि ज़िद आन पड़ी है यारो

अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं - Jaan Nisar Akhtar

अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे’र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं
 
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
 
आँखों में जो भर लोगे, तो काँटे-से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
 
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मन्दिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
 
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहजीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं
 
ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे - Jaan Nisar Akhtar

रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे
अदा शनास तो बहुत हैं मगर कहाँ हमसे
 
सुना दिये थे कभी कुछ गलत-सलत क़िस्से
वो आज तक हैं उसी तरह बदगुमाँ हमसे
 
ये कुंज क्यूँ ना ज़िआरत गहे मुहब्बत हो
मिले थे वो इंहीं पेड़ों के दर्मियाँ हमसे
 
हमीं को फ़ुरसत-ए-नज़्ज़ारगी नहीं वरना
इशारे आज भी करती हैं खिड़कियाँ हमसे
 
हर एक रात नशे में तेरे बदन का ख़्याल
ना जाने टूट गई कई सुराहियाँ हमसे

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो - Jaan Nisar Akhtar

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो
 
कू-ए-क़ातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें
क्या ख़बर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही न हो
 
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी
चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो
 
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो
 
ज़िन्दगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो
 
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो

ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का - Jaan Nisar Akhtar

ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
सम्भल भी जा कि अभी वक़्त है सम्भलने का
 
बहार आये चली जाये फिर चली आये
मगर ये दर्द का मौसम नहीं बदलने का
 
ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हैं
मगर किसे है सलीका ज़मीं पे चलने का
 
फिरे हैं रातों को आवारा हम तो देखा है
गली-गली में समाँ चाँद के निकलने का
 
तमाम नशा-ए-हस्ती तमाम कैफ़-ए-वजूद
वो इक लम्हा तेरे जिस्म के पिघलने का

चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए - Jaan Nisar Akhtar

चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए
कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए
 
ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया
ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा रात गए
 
चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू
खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए
 
आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें
चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए
 
तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है
सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए

आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर - Jaan Nisar Akhtar

आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर
उस का काग़ज़ चिपका देना घर के रौशन-दानों पर
  
आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मिरे रख देती हो
चलते चलते रुक जाता हूँ साड़ी की दूकानों पर
 
बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुरवाई भी
जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर
 
शहर के तपते फ़ुटपाथों पर गाँव के मौसम साथ चलें
बूढ़े बरगद हाथ सा रख दें मेरे जलते शानों पर
 
सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया
जाने किस का नाम खुदा था पीतल के गुल-दानों पर
 
उस का क्या मन-भेद बताऊँ उस का क्या अंदाज़ कहूँ
बात भी मेरी सुनना चाहे हाथ भी रक्खे कानों पर
 
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती
जब भी उस के पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर
 
शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए
उन को क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर
 
यारो अपने इश्क़ के क़िस्से यूँ भी कम मशहूर नहीं
कल तो शायद नॉवेल लिक्खे जाएँ इन रूमानों पर

ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर - Jaan Nisar Akhtar

ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर
एक नदी में कितने भँवर
 
सदियों सदियों मेरा सफ़र
मंज़िल मंज़िल राहगुज़र
 
कितना मुश्किल कितना कठिन
जीने से जीने का हुनर
 
गाँव में आ कर शहर बसे
गाँव बिचारे जाएँ किधर
 
फूँकने वाले सोचा भी
फैलेगी ये आग किधर
 
लाख तरह से नाम तिरा
बैठा लिक्खूँ काग़ज़ पर
 
छोटे छोटे ज़ेहन के लोग
हम से उन की बात न कर
 
पेट पे पत्थर बाँध न ले
हाथ में सजते हैं पत्थर
 
रात के पीछे रात चले
ख़्वाब हुआ हर ख़्वाब-ए-सहर
 
शब भर तो आवारा फिरे
लौट चलें अब अपने घर

इसी सबब से हैं शायद, अज़ाब जितने हैं - Jaan Nisar Akhtar

इसी सबब से हैं शायद, अज़ाब जितने हैं
झटक के फेंक दो पलकों पे ख़्वाब जितने हैं
 
वतन से इश्क़, ग़रीबी से बैर, अम्न से प्यार
सभी ने ओढ़ रखे हैं नक़ाब जितने हैं
 
समझ सके तो समझ ज़िन्दगी की उलझन को
सवाल उतने नहीं है, जवाब जितने हैं

उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है - Jaan Nisar Akhtar

उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है
मुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है
 
हमारे शहर में बे-चेहरा लोग बसते हैं
कभी-कभी कोई चेहरा दिखाई पड़ता है
 
चलो कि अपनी मोहब्बत सभी को बाँट आएँ
हर एक प्यार का भूखा दिखाई देता है
 
जो अपनी ज़ात से इक अंजुमन कहा जाए
वो शख्स तक मुझे तन्हा दिखाई पड़ता है
 
न कोई ख़्वाब न कोई ख़लिश न कोई ख़ुमार
ये आदमी तो अधूरा दिखाई पड़ता है
 
लचक रही है शुआओं की सीढियाँ पैहम
फ़लक से कोई उतरता दिखाई पड़ता है
 
चमकती रेत पर ये ग़ुस्ल-ए-आफ़ताब तेरा
बदन तमाम सुनहरा दिखाई पड़ता है

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है - Jaan Nisar Akhtar

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है
 
जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार
वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है
 
हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा
ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है
 
ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस
कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है
 
उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
मुझे चिराग-ए-दयार-ए-हबीब लगता है
 
ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो
बलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है

हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे - Jaan Nisar Akhtar

हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे
ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे
 
अब उस के तर्ज़-ए-तजाहुल को क्या कहे कोई
वो बे-ख़बर तो नहीं फिर भी बे-ख़बर सा लगे
 
हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है
ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे
 
नशात-ए-सोहबत-ए-रिंदाँ बहुत ग़नीमत है
कि लम्हा लम्हा पुर-आशोब-ओ-पुर-ख़तर सा लगे
 
किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा
कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे
 
वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सकें
हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर सा लगे
 
जहान-ए-नौ के मुकम्मल सिंगार की ख़ातिर
सदी सदी का ज़माना भी मुख़्तसर सा लगे

रुखों के चांद, लबों के गुलाब मांगे है - Jaan Nisar Akhtar

रुखों के चांद, लबों के गुलाब मांगे है
बदन की प्यास, बदन की शराब मांगे है
 
मैं कितने लम्हे न जाने कहाँ गँवा आया
तेरी निगाह तो सारा हिसाब मांगे है
 
मैं किस से पूछने जाऊं कि आज हर कोई
मेरे सवाल का मुझसे जवाब मांगे है
 
दिल-ए-तबाह का यह हौसला भी क्या कम है
हर एक दर्द से जीने की ताब मांगे है
 
बजा कि वज़ा-ए-हया भी है एक चीज़ मगर
निशात-ए-दिल तुझे बे-हिजाब मांगे है

बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है - Jaan Nisar Akhtar

बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है
चमन माँगा था पर उस ने ब-मुश्किल इक कली दी है
 
मिरे ख़ल्वत-कदे के रात दिन यूँही नहीं सँवरे
किसी ने धूप बख़्शी है किसी ने चाँदनी दी है
 
नज़र को सब्ज़ मैदानों ने क्या क्या वुसअतें बख़्शीं
पिघलते आबशारों ने हमें दरिया-दिली दी है
 
मोहब्बत ना-रवा तक़्सीम की क़ाएल नहीं फिर भी
मिरी आँखों को आँसू तेरे होंटों को हँसी दी है
 
मिरी आवारगी भी इक करिश्मा है ज़माने में
हर इक दरवेश ने मुझ को दुआ-ए-ख़ैर ही दी है
 
कहाँ मुमकिन था कोई काम हम जैसे दिवानों से
तुम्हीं ने गीत लिखवाए तुम्हीं ने शाइरी दी है

Jane Mane Kavi (medium-bt) Hindi Kavita (medium-bt) Jaan Nisar Akhtar (medium-bt)

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