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Gopal Das Neeraj Ghazals

Hindi Kavita
हिंदी कविता

gopal-das-neeraj
ग़ज़लें गोपालदास नीरज (toc)

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।
 
वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।
 
तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा ।
 
वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।
 
हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,
उसे कुछ भी न मिला जो अगर-मगर में रहा ।
 

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे ।
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे ।
 
इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।
 
वो न ज्ञानी, न वो ध्यानी, न बरहमन, न वो शैख,
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे ।
 
एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द ज़बाँ,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे ।
 
चाँद को छू के चले आए हैं विज्ञान के पंख,
देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुँचे ।
 

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
 
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
 
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।
 
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।
 
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।
 
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए।
 
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।
 

दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था

दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था ।
तुम्हारे घर का सफ़र इस क़दर सख्त न था ।
 
इतने मसरूफ़ थे हम जाने के तैयारी में,
खड़े थे तुम और तुम्हें देखने का वक्त न था।
 
मैं जिस की खोज में ख़ुद खो गया था मेले में,
कहीं वो मेरा ही एहसास तो कमबख्त न था।
 
जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया न ख़ौल उठा,
वो और कुछ हो मगर आदमी का रक्त न था ।
 
उन्हीं फ़क़ीरों ने इतिहास बनाया है यहाँ,
जिन पे इतिहास को लिखने के लिए वक्त न था ।
 
शराब कर के पिया उस ने ज़हर जीवन भर,
हमारे शहर में 'नीरज' सा कोई मस्त न था ।
 

गुमनामियों मे रहना, नहीं है कबूल मुझको

गुमनामियों मे रहना, नहीं है कबूल मुझको
चलना नहीं गवारा, बस साया बनके पीछे ।
 
वो दिल मे ही छिपा है, सब जानते हैं लेकिन
क्यूं भागते फ़िरते हैं, दायरो-हरम के पीछे ।
 
अब “दोस्त” मैं कहूं या, उनको कहूं मैं “दुश्मन”
जो मुस्कुरा रहे हैं,खंजर छुपा के अपने पीछे ।
 
तुम चांद बनके जानम, इतराओ चाहे जितना
पर उसको याद रखना, रोशन हो जिसके पीछे ।
 
वो बदगुमा है खुद को, समझे खुशी का कारण
कि मैं चह-चहा रहा हूं, अपने खुदा के पीछे ।
 
इस ज़िन्दगी का मकसद, तब होगा पूरा “नीरज”
जब लोग याद करके, मुस्कायेंगे तेरे पीछे ।
 

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए
 
रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए
 
अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए
 
फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए
 
छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए
 
दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए
 

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई ।
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई ।
 
आप मत पूछिये क्या हम पे 'सफ़र में गुज़री ?
था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई ।
 
ज़िंदगी भर तो हुई गुफ़्तुगू ग़ैरों से मगर
आज तक हमसे हमारी न मुलाकात हुई ।
 
हर गलत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझको
एक आवाज़ तेरी जब से मेरे साथ हुई ।
 
मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है
एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई ।
 

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह ।
 
ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह ।
 
कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो
जिन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह ।
 
दाग मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह ।
 
हर किसी शख्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह ।
 
जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन की 'नीरज'
शायरी तो है वह अखबार की कतरन की तरह ।
 

जितना कम सामान रहेगा

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
 
जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा
 
उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा
 
हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा
 
जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा
 
‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा
 

खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की

खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की,
खिडकी खुली है ग़ालिबन उनके मकान की ।
 
हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो,
आ जायेगी ज़मीन पे छत आसमान की ।
 
बुझ जाये सरे आम ही जैसे कोई चिराग़,
कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की ।
 
ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी,
हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की ।
 
औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की ।
 
ज़ुल्फ़ों के पेंचो-ख़म में उसे मत तलाशिये,
ये शायरी ज़बां है किसी बेज़बान की ।
 
'नीरज' से बढ़कर और धनी है कौन,
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की ।
 

एक जुग ब'अद शब-ए-ग़म की सहर देखी है

एक जुग ब'अद शब-ए-ग़म की सहर देखी है
देखने की न थी उम्मीद मगर देखी है
 
जिस में मज़हब के हर इक रोग का लिक्खा है इलाज
वो किताब हम ने किसी रिंद के घर देखी है
 
ख़ुद-कुशी करती है आपस की सियासत कैसे
हम ने ये फ़िल्म नई ख़ूब इधर देखी है
 
दोस्तो नाव को अब ख़ूब सँभाले रखिए
हम ने नज़दीक ही इक ख़ास भँवर देखी है
 
उस को क्या ख़ाक शराबों में मज़ा आएगा
जिस ने इक बार भी वो शोख़ नज़र देखी है
 

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला,
मेरे स्वागत को हर एक जेब से ख़ंजर निकला ।
 
तितलियों फूलों का लगता था जहाँ पर मेला,
प्यार का गाँव वो बारूद का दफ़्तर निकला ।
 
डूब कर जिसमे उबर पाया न मैं जीवन भर,
एक आँसू का वो कतरा तो समंदर निकला ।
 
मेरे होठों पे दुआ उसकी ज़ुबाँ पे ग़ाली,
जिसके अन्दर जो छुपा था वही बाहर निकला ।
 
ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा,
मेरा सब रूप वो मिट्टी की धरोहर निकला ।
 
वो तेरे द्वार पे हर रोज़ ही आया लेकिन,
नींद टूटी तेरी जब हाथ से अवसर निकला ।
 
रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिसने खाई,
वो भिखारी तो शहंशाहों से बढ़ कर निकला ।
 
क्या अजब है इंसान का दिल भी 'नीरज'
मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला ।
 

बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा

बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा
वो आदमी भी यहाँ हमने बदचलन देखा
 
ख़रीदने को जिसे कम थी दौलते दुनिया
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा
 
मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा
 
बड़ा न छोटा कोई, फ़र्क़ बस नज़र का है
सभी पे चलते समय एक-सा कफ़न देखा
 
ज़बाँ है और, बयाँ और, उसका मतलब और
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा
 
लुटेरे, डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे
उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा
 
जो सादगी है कहन में हमारे "नीरज" की
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा
 

गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारो

गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारो,
कि भीगें हम भी ज़रा संग-संग फिर यारों ।
 
यह रिमझिमाती निशा और ये थिरकता सावन,
है याद आने लगा इक प्रसंग फिर यारो ।
 
किसे पता है कि कबतक रहेगा ये मौसम,
रख है बाँध के क्यूँ मन-कुरंग फिर यारो ।
 
घुमड़-घुमड़ के जो बादल घिरा अटारी पर,
विहंग बन के उडी इक उमंग फिर यारो ।
 
कहीं पे कजली कहीं तान उठी बिरहा की,
ह्रदय में झांक गया इक अनंग फिर यारो ।
 
पिया की बांह में सिमटी है इस तरह गोरी,
सभंग श्लेष हुआ है अभंग फिर यारो ।
 
जो रंग गीत का बलबीर जी के साथ गया
न हमने देखा कहीं वैसा रंग फिर यारो ।

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