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Khoya Hua Sa Kuchh Nida Fazli

Khoya Hua Sa Kuchh Nida Fazli
खोया हुआ सा कुछ निदा फ़ाज़ली(toc)
 

देर से - Nida Fazli

कहीं छत थी, दीवारो-दर थे कहीं
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे
मगर जो दिया वो दिया देर से
 
हुआ न कोई काम मामूल से
गुजारे शबों-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से
 
कभी रुक गये राह में बेसबब
कभी वक़्त से पहले घिर आयी शब
हुए बन्द दरवाज़े खुल-खुल के सब
जहाँ भी गया मैं गया देर से
 
ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है
यही है जुदाई, यही मेल है
मैं मुड़-मुड़ के देखा किया दूर तक
बनी वो ख़मोशी, सदा देर से
 
सजा दिन भी रौशन हुई रात भी
भरे जाम लगराई बरसात भी
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी
जो होना था जल्दी हुआ देर से
 
भटकती रही यूँ ही हर बन्दगी
मिली न कहीं से कोई रौशनी
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी
हुआ मुझमें रौशन ख़ुदा देर से
 
nida-fazli

हम्द - Nida Fazli

नील गगन पर बैठ
कब तक
चाँद सितारों से झाँकोगे
 
पर्वत की ऊँची चोटी से
कब तक
दुनिया को देखोगे
 
आदर्शों के बन्द ग्रन्थों में
कब तक
आराम करोगे
 
मेरा छप्पर टरक रहा है
बनकर सूरज
इसे सुखाओ
 
खाली है
प्रार्थना
आटे का कनस्तर
कबनकर गेहूँ
इसमें आओ
 
माँ का चश्मा
टूट गया है
बनकर शीशा
इसे बनाओ
 
चुप-चुप हैं आँगन में बच्चे
बनकर गेंद
इन्हें बहलाओ
 
शाम हुई है
चाँद उगाओ
पेड़ हिलाओ
हवा चलाओ
 
काम बहुत हैं
हाथ बटाओ अल्ला मियाँ
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मियाँ...!
 

कहीं-कहीं से - Nida Fazli

कहीं-कहीं से हर चेहरा
तुम जैसा लगता है
तुमको भूल न पायेंगे हम
ऐसा लगता है
 
ऐसा भी इक रंग है जो
करता है बातें भी
जो भी इसको पहन ले वो
अपना-सा लगता है
 
तुम क्या बिछड़े भूल गये
रिश्तों की शराफ़त हम
जो भी मिलता है कुछ दिन ही
अच्छा लगता है
 
अब भी यूँ मिलते हैं हमसे
फूल चमेली के
जैसे इनसे अपना कोई
रिश्ता लगता है
 
और तो सब कुछ ठीक है लेकिन
कभी-कभी यूँ ही
चलता-फिरता शहर अचानक
तन्हा लगता है
 

गरज-बरस - Nida Fazli

गरज-बरस प्यासी धरती पर
फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चों को
गुड़धानी दे मौला
 
दो और दो का जोड़ हमेशा
चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी
नादानी दे मौला
 
फिर रौशन कर ज़हर का प्याला
चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को
ताबानी दे मौला
 
फिर मूरत से बाहर आकर
चारों ओर बिखर जा
फिर मन्दिर को को‌ई मीरा
दीवानी दे मौला
 
तेरे होते को‌ई किसी की
जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की
आसानी दे मौला
 

रौशनी के फ़रिश्ते - Nida Fazli

हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब से आकाश
अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं...
 
नदी में स्नान करके सूरज
सुनहरी मलमल की पगड़ी बाँधे
सड़क किनारे
खड़ा हुआ मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं...
 
हवाएँ सर-सब्ज़ डालियों में
दुआओ के गीत गा रही हैं
महकते फूलों की लोरियाँ
सोते रास्ते को जगा रही हैं
घनेरा पीपल,
गली के कोने से हाथ अपने हिला रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं...!
फ़रिश्ते निकले हैं रौशनी के
हरेक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर ज़र्रा
माँ के दिल-सा धड़क रहा है
 
पुरानी इक छत पे वक़्त बैठा
कबूतरों को उड़ा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
बच्चे स्कूल जा रहा हैं...!
 

सफ़र को जब भी - Nida Fazli

सफ़र को जब भी किसी
दास्तान में रखना
क़दम यकीन में, मंज़िल
गुमान में रखना
 
जो सात है वही घर का
नसीब है लेकिन
जो खो गया उसे भी
मकान में रखना
 
जो देखती हैं निगाहें
वही नहीं सब कुछ
ये एहतियात भी अपने
बयान में रखना
 
वो ख्वाब जो चेहरा
कभी नहीं बनता
बना के चाँद उसे
आसमान में रखना
 
चमकते चाँद-सितारों का
क्या भरोसा है
ज़मीं की धुल भी अपनी
उड़ान में रखना
 
सवाल तो बिना मेहनत के
हल नहीं होते
नसीब को भी मगर
इम्तहान में रखना
 

मैं जीवन हूँ - Nida Fazli

वो जो
फटे-पुराने जूते गाँठ रहा है
वो भी मैं हूँ
 
वो जो घर-घर
धूप की चाँदी बाँट रहा है
वो भी मैं हूँ
 
वो जो
उड़ते परों से अम्बर पात रहा है
वो भी मैं हूँ
 
वो जो
हरी-भरी आँखों को काट रहा है
वो भी मैं हूँ
 
सूरज-चाँद
निगाहें मेरी
साल-महीने राहें मेरी
 
कल भी मुझमे
आज भी मुझमे
चारों ओर दिशाएँ मेरी 
 
अपने-अपने
आकारों में
जो भी चाहे भर ले मुझको
 
जिनमे जितना समा सकूँ मैं
उतना
अपना कर ले मुझको
 
हर चेहरा है मेरा चेहरा
बेचेहरा इक दर्पण हूँ मैं
मुट्ठी हूँ मैं
जीवन हूँ मैं
 

दिन सलीके से उगा - Nida Fazli

दिन सलीके से उगा
रात ठिकाने से रही
दोस्ती अपनी भी कुछ
रोज़ ज़माने से रही
 
चंद लम्हों को ही बनती हैं
मुसव्विर आँखें
ज़िन्दगी रोज़ तो
तसवीर बनाने से रही
 
इस अँधेरे में तो
ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शमअ
जलाने से रही
 
फ़ासला, चाँद बना देता है
हर पत्थर को
दूर की रौशनी नज़दीक तो
आने से रही
 
शहर में सबको कहाँ मिलती है
रोने की जगह
अपनी इज्जत भी यहाँ
हँसने-हँसाने में रही
 

चरवाहा और भेड़ें - Nida Fazli

जिन चेहरों से रौशन हैं
इतिहास के दर्पण
चलती-फिरती धरती पर
वो कैसे होंगे
 
सूरत का मूरत बन जाना
बरसों बाद का है अफ़साना
पहले तो हम जैसे होंगे
 
मिटटी में दीवारें होंगी
लोहे में तलवारें होंगी
आग, हवा
पानी अम्बर में
जीतें होंगी
हारें होंगी
 
हर युग का इतिहास यही है-
अपनी-अपनी भेड़ें चुनकर
जो भी चरवाहा होता है
उसके सर पर नील गगन कि
रहमत का साया होता है
 

उठके कपड़े बदल - Nida Fazli

उठके कपड़े बदल, घर से बाहर निकल
जो हुआ सो हुआ
रात के बाद दिन, आज के बाद कल
जो हुआ सो हुआ
 
जब तलक साँस है, भूख है प्यास है
ये ही इतिहास है
रख के काँधे पे हल, खेत की ओर चल
जो हुआ सो हुआ
 
खून से तर-ब-तर, करके हर रहगुज़र
थक चुके जानवर
लकड़ियों की तरह, फिर से चूल्हे में जल
जो हुआ सो हुआ
 
जो मरा क्यों मरा, जो जला क्यों जला
जो लुटा क्यों लुटा
मुद्दतों से हैं गुम, इन सवालों के हल
जो हुआ सो हुआ
 
मन्दिरों में भजन मस्जिदों में अज़ाँ
आदमी है कहाँ?
आदमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल
जो हुआ सो हुआ
 

यहाँ भी है वहाँ भी - Nida Fazli

इंसान में हैवान
यहाँ भी है वहाँ भी
अल्लाह निगहबान
यहाँ भी है वहाँ भी
 
खूंख्वार दरिंदों के
फक़त नाम अलग हैं
शहरों में बयाबान
यहाँ भी है वहाँ भी
 
रहमान की क़ुदरत हो
या भगवान की मूरत
हर खेल का मैदान
यहाँ भी है वहाँ भी
 
हिन्दी भी मज़े में है
मुसलमाँ भी मज़े में
इंसान परेशान
यहाँ भी वहाँ भी
 
उठता है दिलो जाँ से
धुआँ दोनों तरफ़ ही
ये मीर का दीवान
यहाँ भी वहाँ भी
 

छोटा आदमी - Nida Fazli

छोटा आदमी
 
तुम्हारे लिए
सब दुआगो हैं
तुम जो न होगे
तो कुछ भी न होगा
इसी तरह
मर-मर के जीते रहो तुम
 
तुम्ही हर जगह हो
तुम्ही मस्अला हो
तुम्ही हौसला हो
 
मुसव्वर के रंगों में
तस्वीर भी तुम
मुसन्निफ के लफ़्ज़ों में
तहरीर भी तुम
तुम्हारे लिए ही
खुदा बाप ने
अपने इकलौते बेटे को
कुर्बां किया है
सभी आसमानी किताबों ने
तुम पर!
तुम्हारे अज़ाबों को आसाँ किया है
 
खुदा की बनाई हुई इस ज़मीं पर
जो सच पूछो,
तुमसे मुहब्बत है सबको
तुम्हारे दुखों का मुदावा न होगा
तुम्हारे
दुखों ज़रूरत है सबको
तुम्हारे लिए सब दुआ गो हैं
 

ये ज़िंदगी - Nida Fazli

ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन कि छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से
चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में गले से
निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में
ढल रही है
 
ये ज़िन्दगी.....!
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है
 
बदलती शक्लों
बदलते ज़िस्मों में
चलता फिरता ये इक शरारा
जो इस घडी
नाम है तुम्हारा!
 
इसी से साड़ी चहल-पहल है
इसी से
रौशन है हर नज़ारा
 
सितारे तोड़ो
या घर बसाओ
अलम उठाओ
या सर झुकाव
 
तुम्हारी आँखों कि रौशनी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा
 

मौसम आते जाते हैं - Nida Fazli

नयी-नयी पोशाक बदलकर, मौसम आते-जाते हैं,
फूल कहाँ जाते हैं जब भी जाते हैं लौट आते हैं।
 
शायद कुछ दिन और लगेंगे, ज़ख़्मे-दिल के भरने में,
जो अक्सर याद आते थे वो कभी-कभी याद आते हैं।
 
चलती-फिरती धूप-छाँव से, चहरा बाद में बनता है,
पहले-पहले सभी ख़यालों से तस्वीर बनाते हैं।
 
आंखों देखी कहने वाले, पहले भी कम-कम ही थे,
अब तो सब ही सुनी-सुनाई बातों को दोहराते हैं ।
 
इस धरती पर आकर सबका, अपना कुछ खो जाता है,
कुछ रोते हैं, कुछ इस ग़म से अपनी ग़ज़ल सजाते हैं।
 

दिल में न हो जुर्रत - Nida Fazli

दिल में न हो जुर्रत तो
मुहब्बत नहीं मिलती
खैरात में इतनी बड़ी
दौलत नहीं मिलती
 
कुछ लोग यूँ ही शहर में
हमसे भी खफ़ा हैं
हर एक से अपनी भी
तबीयत नहीं मिलती
 
देखा था जिसे मैंने
कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी
सूरत नहीं मिलती
 
हँसते हुए चेहरों से है
बाज़ार की ज़ीनत
रोने की यहाँ वैसे भी
फुर्सत नहीं मिलती
 
निकला करो ये शमा लिए
घर से भी बाहर
तन्हाई सजाने को
मुसीबत नहीं मिलती
 

अपनी मर्ज़ी से कहाँ - Nida Fazli

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं
 
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं
 
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं
 
जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं
कभी धरती के, कभी चाँद नगर के हम हैं
 
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं
 
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं
 

धूप में निकलो - Nida Fazli

धूप में निकलो घटाओं में
नहाकर देखो
ज़िन्दगी क्या है, किताबों को
हटाकर देखो
 
सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया
नहीं देखी जाती
दिल की धड़कन को भी बीनाई
बनाकर देखो
 
पत्थरों में भी ज़बाँ होती है
दिल होते हैं
अपने घर के दरो-दीवार
सजाकर देखो
 
वो सितारा है चमकने दो
यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म
बनाकर देखो
 
फ़ासला नज़रों का धोका भी
तो हो सकता है
चाँद जब चमके तो ज़रा हाथ
बढाकर देखो
 
(बीनाई=ज्योति)
 

देखा हुआ सा कुछ - Nida Fazli

देखा हुआ सा कुछ है
तो सोचा हुआ सा कुछ
 
हर वक़्त मेरे साथ है
उलझा हुआ सा कुछ
 
होता है यूँ भी, रास्ता
खुलता नहीं कहीं
 
जंगल-सा फैल जाता है
खोया हुआ सा कुछ
 
साहिल की गीली रेत पर
बच्चों के खेल-सा
 
हर लम्हा मुझ में बनता
बिखरता हुआ सा कुछ
 
फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया
कुछ इस तरह
 
हर शय से मुस्कुराता है
रोता हुआ सा कुछ
 
धुँधली-सी एक याद किसी
क़ब्र का दिया
 
और! मेरे आस-पास
चमकता हुआ सा कुछ
 

बेसन की सोंधी रोटी - Nida Fazli

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी-जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन
चिमटा, फुकनी जैसी माँ
 
बान की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोयी आधी जागी
थकी दोपहरी-जैसी माँ
 
चिड़ियों की चहकार में गूँज़े
राधा-मोहन, अली-अली
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती
घर की कुण्डी-जैसी माँ
 
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में
दिनभर इक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी-जैसी माँ
 
बाँट के अपना चेहरा, माथा
आखें जाने कहाँ गयी
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
 

दो-चार गाम - Nida Fazli

दो-चार गाम राह को
हमवार देखना
फिर हर क़दम पे इक नयी
दीवार देखना
 
आँखों की रौशनी से है
हर संग आइना
हर आईने में खुद को
गुनाहगार देखना
 
हर आदमी में होते हैं
दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना हो
कई बार देखना
 
 
मैदाँ की हार-जीत तो
क़िस्मत की बात है
टूटी है जिसके हाथ में
तलवार देखना
 
दरिया के उस किनारे
सितारे भी फूल भी
दरिया चढ़ा हुआ हो तो
उस पार देखना
 
अच्छी नहीं है शहर के
रस्तों की दोस्ती
आँगन में फैल जाए न
बाज़ार देखना.....!
 

मैं ख़ुदा बनके - Nida Fazli

मन्दिरों-मस्ज़िदों की दुनिया में
मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग.
 
रोज़ मैं चाँद बन के आता हूँ
दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ.
 
खनखनाता हूँ माँ के गहनों में
हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में
 
मैं ही मज़दूर के पसीने में...!
मैं ही बरसात के महीने में.
 
मेरी तस्वीर आँख का आँसू
मेरी तहरीर जिस्म का जादू.
 
मन्दिरों-मस्ज़िदों की दुनिया में
मुझको पहचानते नहीं,जब लोग.
 
मैं जमीनों को बेजिया करके
आसमानों में लौट जाता हूँ
 
मैं ख़ुदा बनके कहर ढाता हूँ.
 
(बेजिया=बिना रौशनी)
 

एक लुटी हुई बस्ती की कहानी - Nida Fazli

बजी घंटियाँ
ऊँचे मीनार गूँजे
सुनहरी सदाओं ने
उजली हवाओं की पेशानियों की
 
रहमत के
बरकत के
पैग़ाम लिक्खे—
वुजू करती तुम्हें
खुली कोहनियों तक
मुनव्वर हुईं—
झिलमिलाए अँधेरे
--भजन गाते आँचल ने
पूजा की थाली से
बाँटे सवेरे
खुले द्वार!
बच्चों ने बस्ता उठाया
बुजुर्गों ने—
पेड़ों को पानी पिलाया
--नये हादिसों की खबर ले के
बस्ती की गलियों में
अख़बार आया
खुदा की हिफाज़त की ख़ातिर
पुलिस ने
पुजारी के मन्दिर में
मुल्ला की मस्जिद में
पहरा लगाया।
 
खुद इन मकानों में लेकिन कहाँ था
सुलगते मुहल्लों के दीवारों दर में
वही जल रहा था जहाँ तक धुवाँ था
 

जो थे वही रहे - Nida Fazli

बदला न अपने-आपको
जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से
मगर अजनबी रहे
 
अपनी तरह सभी को
किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे
दूर ही रहे
 
दुनिया न जीत पाओ
तो हारो न आपको
थोड़ी-बहुत तो ज़हान में
नाराज़गी रहे
 
गुज़रो जो बाग़ से
तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल
वो डाली हरी रहे
 
हर वक्त हर मुक़ाम पे
हँसना मुहाल है
रोने के वास्ते भी
कोई बेकली रहे
 

नयी-नयी आँखें - Nida Fazli

नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है ।
 
मिलने-जुलनेवालों में तो सारे अपने जैसे हैं
जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है ।
 
मेरे आँगन में आये या तेरे सर पर चोट लगे
सन्नाटों में बोलनेवाला पत्थर अच्छा लगता है ।
 
चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने साँचे हैं
जो मूरत में ढल जाये वो पैकर अच्छा लगता है ।
 
हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में
जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है ।
 

दोहे - Nida Fazli

जीवन भर भटका किए, खुली न मन की गाँठ
उसका रास्ता छोड़कर, देखी उसकी बाट
 
सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फकीर
 
मुझ जैसा एक आदमी, मेरा ही हमनाम
उल्टा-सीधा वो चले, मुझे करे बदनाम
 
सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान
एक-ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान
 
पंछी मानव, फूल, जल, अलग-अलग आकार
माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार
 
मैं भी तू भी यात्री, आती-जाती रेल
अपने-अपने गाँव तक, सबका सब से मेल
 

सपना झरना नींद का - Nida Fazli

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना, खोना, खोजना, साँसों का इतिहास
 
नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम
सूरज ठेकेदार सा, सबको बाँटे काम
 
अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से, मीठी हो गई धूप
 
बरखा सबको दान दे, जिसकी जितनी प्यास
मोती-सी ये सीप में, माटी में ये घास
 

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर - Nida Fazli

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोये देर तक, भूखा रहे फ़क़ीर
 
सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान
एक ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान
 
जीवन के दिन-रैन का, कैसे लगे हिसाब
दीमक के घर बैठकर, लेखक लिखे किताब
 
मुझ जैसा इक आदमी मेरा ही हमनाम
उल्टा-सीधा वो चले, मुझे करे बदनाम
 

दस्तकें - Nida Fazli

दरवाज़े पर हर दस्तक का
जाना-पहचाना
चेहरा है
 
रोज़ बदलती हैं तारीखें
वक़्त मगर
यूँ ही ठहरा है
 
हर दस्तक है 'उसकी' दस्तक
दिल यूँ ही धोका खता है
जब भी
दरवाज़ा खुलता है
कोई और नज़र आ जाता है
 
जाने वो कब तक आएगा ?
जिसको बरसों से आना है
या बस यूँ ही रस्ता तकना
हर जीवन का जुर्माना है
 

मुँह की बात - Nida Fazli

मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन।
 
सदियों-सदियों वही तमाशा
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं
खो जाता है जाने कौन।
 
जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन।
 
मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन।
 
किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।
 

जाने वालों से - Nida Fazli

जानेवालों से राब्ता रखना
दोस्तो, रस्मे-फातहा रखना
 
जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आइना रखना
 
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की कुछ जगह रखना
 
जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तन्हाईयाँ बचा रखना
 
मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए
अपने दिल में कहीं खुदा रखना
 
मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना
 
उम्र करने को है पचास पार
कौन है किस जगह पता रखना
 

छोटी-सी हंसी - Nida Fazli

सूनी सूनी थी फ़ज़ा
मैंने यूँही
उस के बालों में गुँधी
ख़ामोशियों को छू लिया
वो मुड़ी
थोड़ा हँसी
मैं भी हँसा
फिर हमारे साथ
नदियाँ वादियाँ
कोहसार बादल
फूल कोंपल
शहर जंगल
सब के सब हँसने लगे
 
इक मोहल्ले में
किसी घर के
किसी कोने की
छोटी सी हँसी ने
दूर तक फैली हुई दुनिया को
रौशन कर दिया है
 
ज़िंदगी में
ज़िंदगी का रंग फिर से भर दिया है !
 

सपना ज़िंदा है - Nida Fazli

धरती और आकाश का रिश्ता
जुड़ा हुआ है
इसीलिए चिड़िया उड़ती है
इसीलिए नदिया बहती है
इसीलिए है
चाय की प्याली में
कड़वाहट
इसीलिए तो
चेहरा बनती है हर आहट
धरती और आकाश का रिश्ता
जुड़ा हुआ है
इसीलिए तो
कहीं - कहीं से कुछ अच्छा है
कुछ खोटा है
कुछ सच्चा है
सामनेवाली खिड़की
जूड़ा बांध रही है
धीमे - धीमे
सोया रस्ता जाग रहा है
उछल रही है तंग गली में
गेंद रबड़ की
उसके पीछे - पीछे
बच्चा भाग रहा है
रात और दिन के बीच
कहीं सपना ज़िंदा है
मरी नहीं है
जब तक ये दुनिया ज़िंदा है
धरती और आकाश का रिश्ता जुड़ा हुआ है
 

समझौता - Nida Fazli

यही ज़मीं
जो कहीं जो धूप है
कहीं साया
यही ज़मीन हो तुम भी
यही ज़मीं मैं भी
यही ज़मीन हक़ीक़त है
इस ज़मीं के सिवा
कहीं भी कुछ नहीं
बीनाइयों का धोका है
वो आसमान
जो हर दस्तरस से बाहर है
तुम्हारी
आँखों में हो
या मेरी निगाहों में
दिखाई देता है
लेकिन कभी नहीं मिलता
यही ज़मीन सफ़र है
यही ज़मीं मंज़िल
न मैं तलाश करूँ
तुममें
जो नहीं हो तुम
न तुम
तलाश करो मुझमें
जो नहीं हूँ मैं
 

कोई अकेला कहाँ है - Nida Fazli

शुक्रिया ऐ दरख़्त तेरा
तेरी घनी छाँव
मेरे रस्ते की दिलकशी है
शुक्रिया ऐ चमकते सूरज
तेरी शुआओं से
मेरे आँगन में रौशनी है
शुक्रिया ऐ चहकती चिड़िया
तेरे सुरों से मेरी ख़ामोशी में नग़मगी है
पहाड़ मेरे लिए ही
मौसम सजा रहा है
नदी का पानी
हवा से बादल बना रहा है
किसी की सुई से
मेरा कुरता तुरप रहा है
मेरे लिए गुलाब
धूपों में तप रहा है
कोई अकेला कहाँ है
ज़मीं के ज़र्रे से आसमाँ तक
हरेक वज़ूद एक कारवाँ है
ज़मीन माँ है
हरेक सर पर
हज़ार रिश्तों का आसमाँ है
बंटी हुई सरहदों में
सब कुछ जुड़ा हुआ है
अकेलापन
आदमी की फ़ुरसत का फलसफा है
 

जो खो जाता है मिलकर ज़िन्दगी में - Nida Fazli

जो खो जाता है मिलकर ज़िन्दगी में
ग़ज़ल है नाम उसका, शायरी में
 
निकल आते हैं आँसू हँसते-हँसते
ये किस ग़म की कसक है, हर ख़ुशी में
 
कहीं आँखें, कहीं चेहरा, कहीं लब
हमेशा एक मिलता है, कई में
 
चमकती है अँधेरों में खामोशी
सितारे टूटते हैं रात ही में
 
गुजर जाती है यूँ ही उम्र सारी
किसी को ढूँढ़ते हैं हम किसी में
 
सुलगती रेत में पानी कहाँ था
कोई बादल छुपा था तश्नगी में
 
बहुत मुश्किल है बंजारामिजाजी
सलीका चाहिए आवारगी में
 
(तश्नगी=प्यास, बंजारामिजाजी=
घुम्मकड़ स्वभाव)
 

जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी - Nida Fazli

जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी
सन्नाटों में आग लगा दी
 
मिट्टी उस की पानी उस का
जैसी चाही शक्ल बना दी
 
छोटा लगता था अफ़साना
मैं ने तेरी बात बढ़ा दी
 
जब भी सोचा उस का चेहरा
अपनी ही तस्वीर बना दी
 
तुझ को तुझ में ढूँड के हम ने
दुनिया तेरी शान बढ़ा दी
 

मिलजुल के बैठने की - Nida Fazli

मिलजुल के बैठने की रवायत नहीं रही
रावी के पास कोई हलावत नहीं रही
 
हर ज़िन्दगी है हाथ में कश्कोल की तरह
महरूमियों के पास बगावत नहीं रही
 
मिस्मार हो रही है दिलों की इमारतें
अल्लाह के घरों की हिफाजत नहीं रही
 
मुल्क-ए-खुदा में सारी जमीनें हैं एक-सी
इस दौर के नसीब में हिज़रत नहीं रही
 
सब अपनी-अपनी मौत से मरते हैं इन दिनों
अब दश्त-ए-कर्बला में शहादत नहीं रही
 
(रावी=श्रुति परम्परा का निर्वाह करने वाला,
हलावत=माधुर्य, कशकोल=भिक्षापात्र,
महरूमियों=अभावों, मिस्मार=ध्वस्त,
हिजरत=प्रवास, दश्त-ए-कर्बला=कर्बला का
उजाड़,जंगल)
 

एक जवान याद - Nida Fazli

वक्त ने
मेरे बालों में चांदी भर दी
इधर-उधर जाने की आदत कम कर दी
 
आईना जो कहता है
सच कहता है
एक-सा चेहरा-मोहरा किसका रहता है
 
इसी बदलते वक़्त सहरा में लेकिन
कहीं किसी घर में
इक लड़की ऐसी है
बरसों पहले जैसी थी वो
अब भी बिलकुल
वैसी है
 

हम हैं कुछ अपने लिए - Nida Fazli

हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं ज़माने के लिए
घर से बाहर की फ़ज़ा हँसने-हँसाने के लिए
 
यूँ लुटाते न फिरो मोतियों वाले मौसम
ये नगीने तो हैं रातों को सजाने के लिए
 
अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदाद-ए-सफ़र
हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए
 
मेज़ पर ताश के पत्तों-सी सजी है दुनिया
कोई खोने के लिए है कोई पाने के लिए
 
तुमसे छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था
तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए
 

चांद से फूल से - Nida Fazli

चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए
 
सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए
 
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए
 
मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए
 
कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब-ए-रवाँ से सुनिए
 
चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए
 

ख़ुदा ही जिम्मेदार है - Nida Fazli

हर एक जुर्म नाम है
जो नाम
संगसार है
वो नाम बेकुसूर है
 
कुसूरवार भूल है
जो मुद्दतों से
रायफिल है
चीख है
पुकार है
यही गुनहगार है
 
नहीं ये भूख तो
किसी महल की पहरेदार है
ग़रीब ताबेदार है
 
गुनहगार है महल
मगर महल तो ख़ुद
सियासतों का इश्तहार है
सियासतों के इर्द गिर्द भी
कोई हिसार है
 
अजीब इन्तिशार है
न कोई चोर
चोर है
न कोई साहूकार है
ये कैसा कारोबार है
ख़ुदा की कायनात का
ख़ुदा ही जिम्मेदार है
 

आख़री सच - Nida Fazli

वही है ज़िन्दा
गरजते बादल
सुलगते सूरज
छलकती नदियों के साथ है जो
ख़ुद अपने पैरों की धूप है जो
ख़ुद अपनी पलकों की रात है जो
बुज़ुर्ग सच्चाइयों की राहों में
तज्रबों का अज़ाब है जो
सुकूं नहीं इज़तिराब है जो
 
वही है ज़िन्दा
जो चल रहा है
वही है ज़िन्दा
जो गिर रहा है, सँभल रहा है
वही है ज़िन्दा
जो लम्हा-लम्हा बदल रहा है
 
दुआ करो, आसमाँ से उस पर कोई सहीफ़ा
उतर न आये
खली फ़ज़ाओं में
आख़री सच का ज़हर फिर से बिखर न जाये
जो आप अपनी तलाश में है
वोह देवता बनके मर न जाये।
 

एक ख़त - Nida Fazli

तुम आईने की आराइश में जब
खोयी हुई-सी थीं
खुली आँखों की गहरी नींद में
सोयी हुई-सी थीं
तुम्हें जब अपनी चाहत थी
मुझे तुमसे मोहब्बत थी
 
तुम्हारे नाम की ख़ुशबू से जब
मौसम सँवरते थे
फ़रिश्ते जब तुम्हारे रात-दिन
लेकर उतरते थे
तुम्हें पाने की हसरत थी
मुझे तुमसे मोहब्बत थी
 
तुम्हारे ख़्वाब जब आकाश के
तारों में रोशन थे
गुलाबी अँखड़ियों में धूप थी
आँचल में सावन थे
बहुत सौं से रक़ाबत थी
मुझे तुमसे मोहब्बत थी
 
तुम्हारा ख़त मिला
मैं याद हूँ तुमको इनायत है
बदलते वक़्त की लेकिन
हरेक दिल पर हुकूमत है
वो पहले की हक़ीक़त थी
मुझे तुमसे मुहब्बत थी
मुझे तुमसे मुहब्बत थी
 

एक राजनेता के नाम - Nida Fazli

मुझे मालूम है!
तुम्हारे नाम से
मन्सूब हैं
 
टूटे हुए सूरज-
शिकस्ता चाँद
काला आस्मां
कर्फ़्यू भरी राहें
सुलगते खेल के मैदान
रोती चीख़ती माँएँ
 
मुझे मालुम है
चारों तरफ़
जो ये तबाही है
हुकूमत में
सियासत के
तमाशे की गवाही है
 
तुम्हें
हिन्दू की चाहत है
न मुस्लिम से अदावत है
तुम्हारा धर्म
सदियों से
तिज़ारत था, तिज़ारत है
 
मुझे मालूम है लेकिन
तुम्हें मुजरिम कहूँ कैसे
अदालत में
तुम्हारे जुर्म को साबित करूँ कैसे
 
तुप्हारी जेब में ख़ंजर
न हाथों में कोई बम था
तुम्हारे साथ तो
मर्यादा पुरूषोत्तम का परचम था
 

जो एक दर्द है सांसों में - Nida Fazli

लिखो कि
चील के पंजों में
साँप का सर है
लिखो कि
सांप का फन
छिपकली के ऊपर है
 
लिखो कि
मुँह में उसी छिपकली के
झींगुर है
 
लिखो कि
चिंउटा झींगुर की
दस्तरस में है
 
लिखो कि
जो भी यहाँ है किसी
क़फ़स में है
 
लिखो कि
कोई बुरा है
न कोई अच्छा है
 
लिखो कि
रंग है जो भी नज़र में
कच्चा है
 
जो एक दर्द है साँसों में
वो ही सच्चा है
 
ये एक दर्द ही
संघर्ष भी है, ख़्वाब भी है
लिखो कि
ये ही अन्धेरों का
माहताब भी है!
 

शिकायत - Nida Fazli

तुम्हारी शिकायत बज़ा है
मगर तुमसे पहले भी
दुनिया यही थी
यही आज भी है
यही कल भी होगी...।
 
तुम्हें भी
इसी ईंट-पत्थर की दुनिया में
पल-पल बिखरना है
जीना है
मरना है
 
बदलते हुए मौसमों की ये दुनिया
कभी गर्म होगी
कभी सर्द होगी
कभी बादलों में नहाएगी धरती
कभी दूर तक
गर्द ही गर्द होगी
 
फ़क़त एक तुम ही नहीं हो
यहाँ
जो भी अपनी तरह सोचता
ज़माने की बेरंगियों से ख़फ़ा है
हरेक ज़िन्दगी
इक नया तजुर्बा है
 
मगर जब तलक
ये शिकायत है ज़िन्दा
ये समझो ज़मीं मुहब्बत है ज़िन्दा।
 

मुझी में ख़ुदा था - Nida Fazli

मुझे याद है
मेरी बस्ती के सब पेड़
पर्वत
हवाएँ
परिन्दे
मेरे साथ रोते थे
हँसते थे
 
मेरे ही दुख में
दरिया किनारों पे सर को पटकते थे
 
मेरी ही खुशियों में
फूलों पे
शबनम के मोती चमकते थे
यहीं
सात तारों के झुरमुट में
लाशक्ल-सी
जो खुनक रोशनी थी
वहीं जुगनुओं की
चिराग़ों की
बिल्ली की आँखों की ताबिन्दगी थी
 
नदी मेरे अन्दर से होके गुज़रती थी
आकाश...!
आँखों का धोखा नहीं था
 
ये बात उन दिनों की है
जब इस ज़मीं पर
इबादतघरों की ज़रूरत नहीं थी
मुझी में
ख़ुदा था...!
 

मेरा घर - Nida Fazli

जिस घर में अब मैं रहता हूँ
वो मेरा है
 
इसके कमरों की
आराइश
इसके आँगन की
ज़ेबाइश
अब मेरी है
 
मुझसे पहले
मुझसे पहले से भी पहले
 
ये घर
किस-किस का अपना था
किन-किन आँखों का
सपना था
कब-कब
इसका क्या नक़्शा था?
 
ये सब तो
कल का क़िस्सा है,
इसका आज
मेरा हिस्सा है
 
आज के, कल बन जाने तक ही
मेरा भी
इससे रिश्ता है
 
जिस घर में
अब मैं रहता हूँ
वो मेरा है
 

ये ख़ून मेरा नहीं है - Nida Fazli

तुम्हारी आँखों में
आज किसके लहू की लाली
चमक रही है
ये आग कैसी दहक रही है
पता नहीं
तुमने मेरे धोके में किस पे ख़ंजर चला दिया है
वो कौन था
किसके रास्ते का चराग़ तुमने बुझा दिया है
ये ख़ून मेरा नहीं है
लेकिन तुम्हें भी शायद ख़बर नहीं थी
जहाँ निशाना लगाये बैठे थे
वो मेरी रहगुज़र नहीं थी
 
मैं कल भी ज़िन्दा था...
आज भी हूँ
मैं कोई चेहरा
कोई इमारत
कोई इलाका नहीं हूँ
सूरज की रौशनी हूँ
मैं ज़िन्दगी हूँ।
 
तुम्हारे हथियार बेनज़र हैं
तबील सदियों का फ़ासला
वक़्त बन चुका है
 
तलाश तुमको है जिसकी
वो अब
तुम्हारे अन्दर समा चुका है
 
तुम्हारी-मेरी ये दुश्मनी भी है
इक मुअम्मा
ख़ुद अपने घर को न आग जब तक
लगाओगे तुम
मुझे नहीं मार पाओगे तुम।
 

याद आता है सुना था पहले - Nida Fazli

याद आता है सुना था पहले
कोई अपना भी ख़ुदा था पहले
 
मैं वो मक़तूल जो क़ातिल न बना
हाथ मेरा भी उठा था पहले
 
जिस्म बनने में उसे देर लगी
इक उजाला-सा हुआ था पहले
 
फूल जो बाग़ की ज़ीनत ठहरा
मेरी आँखों में खिला था पहले
 
आसमाँ, खेत, समन्दर सब लाल
खून काग़ज़ पे उगा था पहले
 
शहर तो बाद में वीरान हुआ
मेरा घर ख़ाक हुआ था पहले
 
अब किसी से भी शिकायत न रही
जाने किस-किस से गिला था पहले
 

एक मुस्कुराहट - Nida Fazli

चमकते बत्तीस मोतियोंवाली मुस्कुराहट
खुला हुआ बादबान जैसे
धुला हुआ आसमान जैसे
सहर की पहली अज़ान जैसे
 
पता नहीं
नाम क्‍या है उसका
ख़बर नहीं काम क्‍या है उसका
 
वो ठीक छे बज के बीस की
एक जगमगाहट
उतर के होठों से
यूँ मेरे साथ चल रही है
न छाँव कुछ कम है
रास्तों में
न धूप ज़्यादा निकल रही है
 
मैं जिस तरह
सोचता था
बस्ती उसी तरह से बदल रही है
 
ये इक सितारा
जो मेरी आँखों में
देर से झिलमिला रहा है
उसे...
समुन्दर बुला रहा है
 

जानता नहीं कोई - Nida Fazli

शायरी वहाँ है
जहाँ शायरी नहीं होती
 
रौशनी वहाँ है
जहाँ रौशनी नहीं होती
 
आदमी वहाँ है
जहाँ आदमी नहीं होता
 
शायरी-के लफ़्ज़ों में
रौशनी की शम्‌ओं में
आदमी के चेहरों में
जुस्तजू है
बेमानी
 
अब जहाँ भी जो शय है
वो...!
वहाँ नहीं होती
आग को
समन्दर में
नग़मग़ी को
पत्थर में
जंग को
कबूतर में
ढूँढ़ने का जोखम ही
आज का मुकद्दर है
 
जानता नहीं कोई
किसका किस जगह घर है !
 

हमेशा यूँ ही होता है - Nida Fazli

हमेशा यूँ ही होता है
घनी ख़ामोशियों के चुप अँधेरों में
कोई मिसरा
कोई पैकर
अचानक बेइरादा
उड़ते जुगनू-सा चमकता है
उसी की झिलमिलाहट में
कभी धुँधला
कभी रौशन
बिना लफ़्ज़ों की पूरी नज़्म का चेहरा झलकता है
वो मिसरा या कोई पैकर
छुपा रहता है जो अकसर
गुज़रते रास्तों में
गीत गाते ख़ाली प्यालों में
गली-कूचों में बिखरे
चाय ख़ानों के सवालों में
सुलगती बस्तियों
जलते मकानों के उजालों में
कभी बेमानी बहसों में
कभी छोटे रिसालों में
चिराग़ों में
नमक में
तेल में, आटे में, दालों में
 
वो जब भी तीरगी में
रौशनी बनकर निकलता है
खुला काग़ज
नयी तख़लीक के साँचे में ढलता है
यूँ ही मंजर बदलता है
हमेशा यूँ ही होता है

Jane Mane Kavi (medium-bt) Hindi Kavita (medium-bt) Nida Fazli(link)

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