त्रिलोक सिंह ठकुरेला - कुण्डलियाँ | Trilok Singh Thakurela - Kundaliyan

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त्रिलोक सिंह ठकुरेला - कुण्डलियाँ | Trilok Singh Thakurela - Kundaliyan

रत्नाकर सबके लिए - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

रत्नाकर सबके लिए, होता एक समान ।
बुद्धिमान मोती चुने, सीप चुने नादान ।।
सीप चुने नादान, अज्ञ मूंगे पर मरता ।
जिसकी जैसी चाह, इकट्ठा वैसा करता ।
'ठकुरेला' कविराय, सभी खुश इच्छित पाकर ।
हैं मनुष्य के भेद, एक सा है रत्नाकर ।।
Trilok-Singh-Thakurela

आगे बढ़ता साहसी - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

आगे बढ़ता साहसी, हार मिले या हार ।
नयी ऊर्जा से भरे, बार बार, हर बार ।।
बार बार, हर बार, विघ्न से कभी न डरता ।
खाई हो कि पहाड़, न पथ में चिंता करता ।
'ठकुरेला' कविराय, विजय-रथ पर जब चढ़ता ।
हों बाधायें लाख, साहसी आगे बढ़ता ।।

थोथी बातों से कभी - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

थोथी बातों से कभी, जीते गये न युद्ध ।
कथनी पर कम ध्यान दे, करनी करते बुद्ध ।।
करनी करते बुद्ध, नया इतिहास रचाते ।
करते नित नव खोज, अमर जग में हो जाते ।
'ठकुरेला' कविराय, सिखातीं सारी पोथी ।
ज्यों ऊसर में बीज, वृथा हैं बातें थोथी ।।

भातीं सब बातें तभी - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

भातीं सब बातें तभी, जब हो स्वस्थ शरीर ।
लगे बसंत सुहावना, सुख से भरे समीर ।।
सुख से भरे समीर, मेघ मन को हर लेते ।
कोयल, चातक मोर, सभी अगणित सुख देते ।
'ठकुरेला' कविराय, बहारें दौड़ी आतीं ।
तन, मन रहे अस्वस्थ, कौन सी बातें भातीं ।।

हँसना सेहत के लिए - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

हँसना सेहत के लिए, अति हितकारी मीत ।
कभी न करें मुकाबला, मधु, मेवा, नवनीत ।।
मधु, मेवा, नवनीत, दूध, दधि, कुछ भी खायेँ ।
अवसर हो उपयुक्त, साथियो हँसे - हँसायें ।
'ठकुरेला' कविराय, पास हँसमुख के बसना ।
रखो समय का ध्यान, कभी असमय मत हँसना ।।

चलते चलते एक दिन - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

चलते चलते एक दिन, तट पर लगती नाव।
मिल जाता है सब उसे, हो जिसके मन चाव ।।
हो जिसके मन चाव, कोशिशें सफल करातीं ।
लगे रहो अविराम, सभी निधि दौड़ी आतीं ।
'ठकुरेला' कविराय, आलसी निज कर मलते ।
पा लेते गंतव्य, सुधीजन चलते चलते ।।

नहीं समझता मंदमति - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

नहीं समझता मंदमति, समझाओ सौ बार ।
मूरख से पाला पड़े, चुप रहने में सार ।।
चुप रहने में सार, कठिन इनको समझाना ।
जब भी जिद लें ठान, हारता सकल ज़माना ।
'ठकुरेला' कविराय, समय का डंडा बजता ।
करो कोशिशें लाख, मंदमति नहीं समझता ।।

धीरे धीरे समय ही - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

धीरे धीरे समय ही, भर देता है घाव ।
मंजिल पर जा पंहुचती, डगमग होती नाव ।।
डगमग होती नाव, अंततः मिले किनारा ।
मन की मिटती पीर, टूटती तम की कारा ।
'ठकुरेला' कविराय, खुशी के बजें मजीरे ।
धीरज रखिये मीत, मिले सब धीरे धीरे ।।

तिनका तिनका जोड़कर - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

तिनका तिनका जोड़कर, बन जाता है नीड़ ।
अगर मिले नेत्तृत्व तो, ताकत बनती भीड़ ।।
ताकत बनती भीड़, नये इतिहास रचाती ।
जग को दिया प्रकाश, मिले जब दीपक, बाती ।।
'ठकुरेला' कविराय, ध्येय सुन्दर हो जिनका ।
रचते श्रेष्ठ विधान, मिले सोना या तिनका ।।

बढ़ता जाता जगत में - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

बढ़ता जाता जगत में, हर दिन उसका मान ।
सदा कसौटी पर खरा, रहता जो इंसान ।।
रहता जो इंसान, मोद सबके मन भरता ।
रखे न मन में लोभ, न अनुचित बातें करता ।
'ठकुरेला' कविराय, कीर्ति-किरणों पर चढ़ता ।
बनकर जो निष्काम, पराये हित में बढ़ता ।।

('काव्यगंधा' में से)

दीपावली - त्रिलोक सिंह ठकुरेला

आती है दीपावली, लेकर यह सन्देश ।
दीप जलें जब प्यार के, सुख देता परिवेश ।।
सुख देता परिवेश,प्रगति के पथ खुल जाते ।
करते सभी विकास, सहज ही सब सुख आते ।
'ठकुरेला' कविराय, सुमति ही सम्पति पाती ।
जीवन हो आसान, एकता जब भी आती ।।

दीप जलाकर आज तक, मिटा न तम का राज ।
मानव ही दीपक बने, यही माँग है आज ।।
यही माँग है आज,जगत में हो उजियारा ।
मिटे आपसी भेद, बढ़ाएं भाईचारा ।
'ठकुरेला' कविराय ,भले हो नृप या चाकर ।
चलें सभी मिल साथ,प्रेम के दीप जलाकर ।।

जब आशा की लौ जले, हो प्रयास की धूम ।
आती ही है लक्ष्मी, द्वार तुम्हारा चूम ।।
द्वार तुम्हारा चूम, वास घर में कर लेती ।
करे विविध कल्याण, अपरमित धन दे देती ।
'ठकुरेला' कविराय, पलट जाता है पासा ।
कुछ भी नहीं अगम्य, बलबती हो जब आशा ।।

दीवाली के पर्व की, बड़ी अनोखी बात ।
जगमग जगमग हो रही, मित्र, अमा की रात ।।
मित्र, अमा की रात, अनगिनत दीपक जलते ।
हुआ प्रकाशित विश्व, स्वप्न आँखों में पलते ।
'ठकुरेला' कविराय,बजी खुशियों की ताली ।
ले सुख के भण्डार, आ गई फिर दीवाली ।।


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