Chutputkule Ashok Chakradhar चुटपुटकुले अशोक चक्रधर

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हिंदी कविता

Chutputkule Ashok Chakradhar
चुटपुटकुले अशोक चक्रधर

1. चुटपुटकुले अशोक चक्रधर

माना कि
कम उम्र होते
हंसी के बुलबुले हैं,
पर जीवन के सब रहस्य
इनसे ही तो खुले हैं,
ये चुटपुटकुले हैं।
 
ठहाकों के स्त्रोत
कुछ यहां कुछ वहां के,
कुछ खुद ही छोड़ दिए
अपने आप हांके।
चुलबुले लतीफ़े
मेरी तुकों में तुले हैं,
मुस्काते दांतों की
धवलता में धुले हैं,
ये कविता के
पुट वाले
चुटपुटकुले हैं।

2. दया अशोक चक्रधर

भूख में होती है कितनी लाचारी,
ये दिखाने के लिए एक भिखारी,
लॉन की घास खाने लगा,
घर की मालकिन में
दया जगाने लगा।
 
दया सचमुच जागी
मालकिन आई भागी-भागी-
क्या करते हो भैया ?
 
भिखारी बोला
भूख लगी है मैया।
अपने आपको
मरने से बचा रहा हूं,
इसलिए घास ही चबा रहा हूं।
 
मालकिन ने आवाज़ में मिसरी घोली,
और ममतामयी स्वर में बोली—
कुछ भी हो भैया
ये घास मत खाओ,
मेरे साथ अंदर आओ।
 
दमदमाता ड्रॉइंग रूम
जगमगाती लाबी,
ऐशोआराम को सारे ठाठ नवाबी।
फलों से लदी हुई
खाने की मेज़,
और किचन से आई जब
महक बड़ी तेज,
तो भूख बजाने लगी
पेट में नगाड़े,
लेकिन मालकिन ले आई उसे
घर के पिछवाड़े।
 
भिखारी भौंचक्का-सा देखता रहा
मालकिन ने और ज़्यादा प्यार से कहा—
नर्म है, मुलायम है। कच्ची है
इसे खाओ भैया
बाहर की घास से
ये घास अच्छी है !
ashok-chakradhar

 

3. नन्ही सचाई अशोक चक्रधर

एक डॉक्टर मित्र हमारे
स्वर्ग सिधारे।
असमय मर गए,
सांत्वना देने
हम उनके घर गए।
उनकी नन्ही-सी बिटिया
भोली-नादान थी,
जीवन-मृत्यु से
अनजान थी।
हमेशा की तरह
द्वार पर आई,
देखकर मुस्कुराई।
उसकी नन्ही-सचाई
दिल को लगी बेधने,
बोली—
अंकल !
भगवान जी बीमार हैं न
पापा गए हैं देखने।

4. कितनी रोटी अशोक चक्रधर

गांव में अकाल था,
बुरा हाल था।
एक बुढ़ऊ ने समय बिताने को,
यों ही पूछा मन बहलाने को—
ख़ाली पेट पर
कितनी रोटी खा सकते हो
गंगानाथ ?
 
गंगानाथ बोला—
सात !
 
बुढ़ऊ बोला—
गलत !
बिलकुल ग़लत कहा,
पहली रोटी
खाने के बाद
पेट खाली कहां रहा।
गंगानाथ,
यही तो मलाल है,
इस समय तो
सिर्फ़ एक रोटी का सवाल है।

5. नेता जी लगे मुस्कुराने अशोक चक्रधर

एक महा विद्यालय में
नए विभाग के लिए
नया भवन बनवाया गया,
उसके उद्घाटनार्थ
विद्यालय के एक पुराने छात्र
लेकिन नए नेता को
बुलवाया गया।
 
अध्यापकों ने
कार के दरवाज़े खोले
नेती जी उतरते ही बोले—
यहां तर गईं
कितनी ही पीढ़ियां,
अहा !
वही पुरानी सीढ़ियां !
वही मैदान
वही पुराने वृक्ष,
वही कार्यालय
वही पुराने कक्ष।
वही पुरानी खिड़की
वही जाली,
अहा, देखिए
वही पुराना माली।
 
मंडरा रहे थे
यादों के धुंधलके
थोड़ा और आगे गए चल के—
वही पुरानी
चिमगादड़ों की साउण्ड,
वही घंटा
वही पुराना प्लेग्राउण्ड।
छात्रों में
वही पुरानी बदहवासी,
अहा, वही पुराना चपरासी।
नमस्कार, नमस्कार !
अब आया हॉस्टल का द्वार—
हॉस्टल में वही कमरे
वही पुराना ख़ानसामा,
वही धमाचौकड़ी
वही पुराना हंगामा।
नेता जी पर
पुरानी स्मृतियां छा रही थीं,
तभी पाया
कि एक कमरे से
कुछ ज़्यादा ही
आवाज़ें आ रही थीं।
उन्होंने दरवाजा खटखटाया,
लड़के ने खोला
पर घबराया।
क्योंकि अंदर एक कन्या थी,
वल्कल-वसन-वन्या थी।
दिल रह गया दहल के,
लेकिन बोला संभल के—
आइए सर !
मेरा नाम मदन है,
इससे मिलिए
मेरी कज़न है।
 
नेता जी लगे मुस्कुराने

6. पहला क़दम अशोक चक्रधर

अब जब
विश्वभर में सबके सब,
सभ्य हैं, प्रबुद्ध हैं
तो क्यों करते युद्ध हैं ?
 
कैसी विडंबना कि
आधुनिक कहाते हैं,
फिर भी देश लड़ते हैं
लहू बहाते हैं।
 
एक सैनिक दूसरे को
बिना बात मारता है,
इससे तो अच्छी
समझौता वार्ता है।
 
एक दूसरे के समक्ष
बैठ जाएं दोनों पक्ष
बाचतीत से हल निकालें,
युद्ध को टालें !
 
क्यों अशोक जी,
आपका क्या ख़याल है ?
 
मैंने कहा—
यही तो मलाल है।
बातचीत से कुछ होगा
आपका भरम है,
दरअसल,
ये बातचीत ही तो
लड़ाई का
पहला कदम है।
 
क्या किया फ़ोटोज़ का ?
 
सामने खड़ा था स्टाफ़ समूचा
आई. जी. ने रौब से पूछा—
पांच शातिर बदमाशों के
चित्र मैंने भेजे,
कुछ किया
या सिर्फ़ सहेजे ?
इलाक़े में
हो रही वारदातें,
‘क्या कर रही है पुलिस’
ये होती हैं बातें।
 
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में
बढ़ रहे हैं खतरे,
और
खुलेआम घूम रहे हैं
जेबकतरे।
चोरी,
डकैती
सेंधमारी,
जेबकतरी
सिलसिला बन गया है रोज़ का,
सिर झुकाए खड़ा था
स्टाफ़ सारा,
आई. जी. ने हवा में
बेंत फटकारा-
कोई जवाब नहीं दिया,
बताइए
इस तरह
सिर मत झुकाइए।
क्या किया है
बताइए ।
वो उचक्के
पूरे शहर को मूंड रहे हैं....
एक थानेदार बोला—
सर !
तीन फ़ोटो मिल गए हैं
दो फ़ोटो ढूँढ़ रहे हैं।

7. ख़लीफ़ा की खोपड़ी अशोक चक्रधर

दर्शकों का नया जत्था आया
गाइड ने उत्साह से बताया—
ये नायाब चीज़ों का
अजायबघर है,
कहीं परिन्दे की चोंच है
कहीं पर है।
ये देखिए
ये संगमरमर की शिला
एक बहुत पुरानी क़बर की है,
और इस पर जो बड़ी-सी
खोपड़ी रखी है न,
ख़लीफा बब्बर की है।
तभी एक दर्शक ने पूछा—
और ये जो
छोटी खोपड़ी रखी है
ये किनकी है ?
गाइड बोला—
है तो ये भी ख़लीफ़ा बब्बर की
पर उनके बचपन की है।

8. अपराधी-सिपाही अशोक चक्रधर

(सिपाहियों में बड़ी दूरदृष्टि होती है वे
अपराधियों के झांसे में नहीं आते)
 
जानकर सिपाही को भोला,
अपराधी बोला—
हवलदार जी!
मूंछें आपकी
लच्छेदार जी!
अब तो आपने
पकड़ ही लिया है,
क़ानूनी शिकंजे में
जकड़ ही लिया है।
ये ज़िंदगी
अब आपकी ज़िंदगी है,
लेकिन इस व़क्त
ज़रा
बीड़ी की
तलब लगी है।
हे डंडानाथ!
दो मिनिट में
बीड़ी ले आऊं
फिर चलता हूं
आपके साथ।
 
सिपाही झल्लाया—
वाह,
क्या आयडिया परोसा!
 
अपराधी गिड़गिड़ाया-
आपको,
बिलकुल नहीं है भरोसा?
 
सिपाही बोला—
बच्चू!
बीड़ी लेने जाएगा
ताकि
हो जाए उड़न छू।
बेटा,
तेरे झांसे में नहीं आऊंगा,
तू यहीं ठहर
बीड़ी लेने मैं जाऊंगा।

9. गेहूं का दाना अशोक चक्रधर

राना था गेहूं का दाना
(मस्तिष्क की मशीन में अजब-गजब
गड़बड़ियां हो जाती हैं कभी-कभी)
 
हमारे एक दोस्त थे— रामलाल राना,
ख़ुद को समझने लगे गेहूं का दाना।
 
जहां कहीं मुर्गा दिखे, डर जाएं—
ये तो हमें खा लेगा, जीते जी मर जाएं।
जहां कहीं बोरा दिखे घबराएं, बिदक जाएं—
कोई इसमें हमें भर लेगा,
बोरा बंद कर देगा।
और आटे की चक्की पड़ जाए दिखाई,
वहां से तो भाग लेते थे राना भाई,
यहां हो जाएगी हमारी पिसाई।
 
डॉक्टर ने समझाया— डियर राना!
तुम्हारे दो कान हैं दो आंख हैं
दो पैर हैं दो हाथ हैं चलते हो बोलते हो
कैसे हो सकते हो गेहूं का दाना?
पर राना नहीं माना।
 
गर्मी गई, शीत गया,
एक वर्ष बीत गया।
 
एक दिन राना डॉक्टर से बोला—
चलता हूं बोलता हूं सुनता हूं तकता हूं
गेहूं का दाना कैसे हो सकता हूं?
डॉक्टर खा गया सनाका,
संदेह से राना की आंखों में झांका।
दृष्टि थी मर्मभेदी,
पर भरोसा हो गया तो छुट्टी दे दी।
 
आध घंटे बाद ही राना फिर आया,
हांफता हुआ और घबराया घबराया।
डॉक्टर ने पूछा— क्या हुआ भई राना!
क्या फिर से हो गए गेहूं का दाना?
 
—नहीं, नहीं, मैं बेहद परेशान हूं,
मैं समझ गया कि इंसान हूं,
मेरे पास आदमी की काया है,
पर अभी यह तथ्य
मुर्गे की समझ में नहीं आया है।

10. तो क्या यहीं? अशोक चक्रधर

तलब होती है बावली,
क्योंकि रहती है उतावली।
बौड़म जी ने
सिगरेट ख़रीदी
एक जनरल स्टोर से,
और फ़ौरन लगा ली
मुँह के छोर से।
ख़ुशी में गुनगुनाने लगे,
और वहीं सुलगाने लगे।
दुकानदार ने टोका,
सिगरेट जलाने से रोका-
श्रीमान जी!मेहरबानी कीजिए,
पीनी है तो बाहर पीजिए।
बौड़म जी बोले-कमाल है,
ये तो बड़ा गोलमाल है।
पीने नहीं देते
तो बेचते क्यों हैं?
दुकानदार बोला-
इसका जवाब यों है
कि बेचते तो हम लोटा भी हैं,
और बेचते जमालगोटा भी हैं,
अगर इन्हें ख़रीदकर
आप हमें निहाल करेंगे,
तो क्या यहीं
उनका इस्तेमाल करेंगे?

11. पियक्कड़ जी और डॉक्टर अशोक चक्रधर

पियक्कड़ जी को समझाने की
डॉक्टर ने कोशिश जी तोड़ की
बोतल भरी शराब की
ईंट से तोड़ दी
कभी कभी समझाने को
दूसरे के लेवल पे आना पड़ता है
बेटे को घोटाले का मतलब समझाने को
उसके टिफिन से चोकोलेट चुराना पड़ता है

12. चूहे ने क्या कहा अशोक चक्रधर

(छोटों की ताक़त का अंदाज़ा कुछ
अनुभवी लोग ही लोग कर पाते हैं)
 
बुवाई के बाद खेत में
भुरभुरी सी रेत में,
बीज के ख़ाली कट्टों को समेटे,
बैठे हुए थे किसान बाप-बेटे।
 
चेहरों पर थी संतोष की शानदार रेखा,
तभी बेटे ने देखा—
एक मोटा सा चूहा बिल बना रहा था,
सूराख़ घुसने के क़ाबिल बना रहा था।
 
पंजों में ग़ज़ब की धार थी,
खुदाई की तेज़ रफ़्तार थी।
मिट्टी के कण जब मूंछों पर आते थे,
तो उसके पंजे झाड़कर नीचे गिराते थे।
किसान के बेटे ने मारा एक ढेला,
चूहे का बिगड़ गया खेला।
घुस गया आधे बने बिल में झपटकर,
मारने वाले को देखने लगा पलटकर।
गुम हो गई उसकी सिट्टी-पिट्टी,
ऊपर से मूंछों पर गिर गई मिट्टी।
जल्दी से पंजा उसने मूंछों पर मारा,
फिर बाप-बेटे को टुकुर-टुकुर निहारा।
ख़तरे में था उसका व्यक्तित्व समूचा,
 
इधर बेटे ने बाप से पूछा—
बापू! ये चूहा डर तो ज़रूर रहा है,
पर हमें इस तरह रौब से
क्यों घूर रहा है?
 
बाप बोला— बेटे! ये डरता नहीं है,
छोटे-मोटे ढेलों से मरता नहीं है।
हमारी निगाहें बेख़ौफ़ सह रहा है
ये हम से कह रहा है—
अब तुम लोग इस फसल से
पल्ला झाड़ लेना,
और खेत में
एक दाना भी हो जाय न
तो मेरी मूंछ उखाड़ लेना।

13. नया आदमी अशोक चक्रधर

डॉक्टर बोला-
दूसरों की तरह
क्यों नहीं जीते हो,
इतनी क्यों पीते हो?
 
वे बोले-
मैं तो दूसरों से भी
अच्छी तरह जीता हूँ,
सिर्फ़ एक पैग पीता हूँ।
एक पैग लेते ही
मैं नया आदमी
हो जाता हूँ,
फिर बाकी सारी बोतल
उस नए आदमी को ही
पिलाता हूँ।

14. बौड़म जी बस में अशोक चक्रधर

बस में थी भीड़
और धक्के ही धक्के,
यात्री थे अनुभवी,
और पक्के ।
पर अपने बौड़म जी तो
अंग्रेज़ी में
सफ़र कर रहे थे,
धक्कों में विचर रहे थे ।
भीड़ कभी आगे ठेले,
कभी पीछे धकेले ।
इस रेलमपेल
और ठेलमठेल में,
आगे आ गए
धकापेल में ।
और जैसे ही स्टाप पर
उतरने लगे
कण्डक्टर बोला-
ओ मेरे सगे !
टिकिट तो ले जा !
बौड़म जी बोले-
चाट मत भेजा !
मैं बिना टिकिट के
भला हूँ,
सारे रास्ते तो
पैदल ही चला हूँ ।

15. ससुर जी उवाच अशोक चक्रधर

डरते झिझकते
सहमते सकुचाते
हम अपने होने वाले
ससुर जी के पास आए,
बहुत कुछ कहना चाहते थे
पर कुछ
बोल ही नहीं पाए।
 
वे धीरज बँधाते हुए बोले-
बोलो!
अरे, मुँह तो खोलो।
 
हमने कहा-
जी. . . जी
जी ऐसा है
वे बोले-
कैसा है?
 
हमने कहा-
जी. . .जी ह़म
हम आपकी लड़की का
हाथ माँगने आए हैं।
 
वे बोले
अच्छा!
हाथ माँगने आए हैं!
मुझे उम्मीद नहीं थी
कि तू ऐसा कहेगा,
अरे मूरख!
माँगना ही था
तो पूरी लड़की माँगता
सिर्फ़ हाथ का क्या करेगा?

16. कौन है ये जैनी? अशोक चक्रधर

बीवी की नज़र थी
बड़ी पैनी-
क्यों जी,
कौन है ये जैनी?
सहज उत्तर था मियाँ का-
जैनी,
जैनी नाम है
एक कुतिया का।
तुम चाहती थीं न
एक डौगी हो घर में,
इसलिए दोस्तों से
पूछता रहता था अक्सर मैं।
 
पिछले दिनों एक दोस्त ने
जैनी के बारे में बताया था।
पत्नी बोली-अच्छा!
तो उस जैनी नाम की कुतिया का
आज दिन में
पाँच बार फ़ोन आया था।

17. सिक्के की औक़ात अशोक चक्रधर

एक बार
बरखुरदार!
एक रुपए के सिक्के,
और पाँच पैसे के सिक्के में,
लड़ाई हो गई,
पर्स के अंदर
हाथापाई हो गई।
जब पाँच का सिक्का
दनदना गया
तो रुपया झनझना गया
पिद्दी न पिद्दी की दुम
अपने आपको
क्या समझते हो तुम!
मुझसे लड़ते हो,
औक़ात देखी है
जो अकड़ते हो!
 
इतना कहकर मार दिया धक्का,
सुबकते हुए बोला
पाँच का सिक्का-
हमें छोटा समझकर
दबाते हैं,
कुछ भी कह लें
दान-पुन्न के काम तो
हम ही आते हैं।

18. हाथी पकड़ने का तरीक़ा अशोक चक्रधर

(अध्यापकों को प्रणाम जो अद्भुत गुर
सिखाकर शिष्यों को कल्पनाशील बनाते हैं)
 
तोदी जी ने पकड़े जंगल में सौ हाथी,
लगे पूछने उनसे, उनके संगी-साथी—
हमें बताएं, इतने हाथी कैसे पकड़े,
खाई खोदी या फिर ज़ंजीरों में जकड़े?
हाथ फिरा मूंछों पर बोले तोदी भाई—
 
ना जकड़े, ना घेरे, ना ही खोदी खाई।
लोग समझते, बहुत कठिन है हाथी लाना,
उन्हें घेरना, उन्हें बांधना, उन्हें फंसाना।
पर अपनी तो होती है हर बात निराली,
हमने इनसे अलग एक तरकीब निकाली।
कहा एक ने भैया ज़्यादा मत तरसाओ,
क्या थी वह तरक़ीब ज़रा जल्दी बतलाओ।
तोदी बोले— जल्दी क्या है, सुनो तरीक़ा,
पांच सितम्बर के दिन अध्यापक से सीखा।
चीज़ चाहिए पांच, तुम्हें सच्ची बतलाऊं,
अब पूछोगे क्या-क्या चीज़ें, लो गिनवाऊं!
बोतल, चिमटी, दूरबीन, बोर्ड औ खड़िया,
हाथी पकड़ो चाहे जितने बढ़िया-बढ़िया।
इतनी चीज़ें लेकर तुम जंगल में जाओ,
किसी पेड़ की एक डाल पर बोर्ड लगाओ।
दो धन दो हैं पांच बोर्ड पर इतना लिखकर,
चढ़ो पेड़ पर बाकी सारी चीज़ें लेकर।
झूम-झूमकर झुण्डों में हाथी आएंगे,
दो धन दो हैं पांच वहां लिक्खा पाएंगे।
अंकगणित की भूल देखकर ख़ूब हंसेंगे,
लिखने वाले की ग़लती पर व्यंग्य कसेंगे।
सूंड़ उठाकर नाचेंगे, मारेंगे ठट्ठे,
ज़रा देर में सौ दो सौ हो जाएं इकट्ठे।
मत हो जाना मस्त, देख इस विकट सीन को,
झट से उलटी ओर पकड़ना दूरबीन को।
सारे हाथी तुम्हें दिखेंगे भुनगे जैसे,
अब बतलाएं उनको तुम पकड़ोगे कैसे!
उठा-उठाकर चिमटी से डालो बोतल में,
समा जाएंगे सारे हाथी पल दो पल में।
ढक्कन में सूराख़ किए हों, भूल न जाना,
अगर घुट गया दम, तो पड़ जाए पछताना।
छेदों से ही कर देना, गन्ने सप्लाई,
बोलो तुमको क्या अच्छी तरक़ीब बताई!!

19. चीख़ निकली भयानक अशोक चक्रधर

बाई की चीख़ निकली भयानक
(इंसान की चीख के कारण
कुछ और भी हो सकते हैं)
 
एक दिन दुर्गा बाई,
लाला की दुकान पर आई।
पीछे-पीछे प्रविष्ट हुए,
दो हट्टे-कट्टे बलिष्ठ मुए।
 
थोड़ी देर बाद अचानक,
दुर्गा बाई की
चीख़ निकली भयानक।
 
दुकान से भागे दोनों मुस्टंडे,
बाज़ार के लोग दौड़े लेकर के डंडे।
दबोच लिया दोनों बदमाशों को,
नाकाम कर दिया उनके प्रयासों को।
तलाशी में निकले पिस्तौल चाकू,
इसका मतलब कि दोनों थे डाकू।
 
पर इस समय तो पड़े थे
उनकी जान के लाले,
भीड़ ने कर दिया पुलिस के हवाले।
पुलिस ने भी कर दी जमकर धुनाई,
फिर दुर्गा से पूछा— बाई!
ये डाकू हैं कैसे पता चला?
 
कुशला बोली—
मैं क्या जानूं भला?
 
—क्या इन दोनों ने आपको डराया था?
 
—नहीं, इनमें से तो कोई
मेरे पास भी नहीं आया था?
 
—अरी ओ दुर्गा बाई,
फिर तू क्यों चिल्लाई?
तेरी आवाज़ तो बहुत तीखी थी!
 
—हां तीखी थी,
पर मैं तो लाला से
गेहूं का दाम सुनकर चीखी थी!

20. चीनू का स्वाभिमान अशोक चक्रधर

चीनू का स्वाभिमान जागा
(बच्चे के अद्भुत तर्क उसके
स्वाभिमान की रक्षा करते हैं)
 
बहुत पुरानी बात है जब
मित्रवर सुधीर तैलंग,
अपने एक चित्र में भर रहे थे रंग।
 
तभी चंचल नटखटिया
उनकी नन्ही चीनू बिटिया
बोली— ले चलिए घुमाने।
 
सुधीर करने लगे बहाने।
पर बिटिया के आगे
एक नहीं चली,
अड़ गई लली—
पापा चलो चलो चलो!
फौरन चलो चलो चलो!!
बिलकुल अभी चलो चलो चलो!!!
 
अब पापा क्या करते,
बोले रंग भरते-भरते—
चीनू चीनी चीनो!
चलते हैं बेटी
पहले जूते तो पहनो।
चीनू चटपट अंदर भगी,
जूते लाई और उल्टे पहनने लगी।
 
सुधीर ने रंग भरना रोका
और चीनू को टोका—
मैं बड़ी हो गई, बड़ी हो गई
बार-बार कहती हो,
लेकिन जूते हमेशा
उल्टे ही पहनती हो।
क्या तुम्हें सीधे जूते पहनना
नहीं आता है?
 
पापा की बात सुनकर
चीनू का स्वाभिमान जागा
उसने उल्टा प्रश्न दागा—
क्या आपको
उल्टे जूते पहनना आता है?

21. प्यारी बहना भागी क्यों? अशोक चक्रधर

खुश खुश मेरा भाई है
राखी जो बँधवाई है
मैने पैसे माँगे उससे
आइसक्रीम दिलवाई है
 
लेकिन पूछो भागी क्यों
बनी अचानक बागी क्यों
आइसक्रीम दिलाकर उसने
मुझसे थोड़ी माँगी क्यों
प्यारी बहना भागी क्यों?
 

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