Suryakant Tripathi Nirala-Hirni सूर्यकांत त्रिपाठी निराला-हिरनी

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हिंदी कविता

Hirni Suryakant Tripathi Nirala
हिरनी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

1
कृष्णा की बाढ़ बह चुकी है; सुतीक्ष्ण, रक्त-लिप्त, अदृश्य दाँतों की लाल जिह्वा, योजनों तक, क्रूर; भीषण मुख फैलाकर, प्राणसुरा पीती हुई मृत्यु तांडव कर रही है। सहस्रों गृह-शून्य, क्षुधाक्लिष्ट, निःस्व जीवित कंकाल साक्षात्‌ प्रेतों से इधर-उधर घूम रहे हैं। आर्तनाद, चीत्कार, करुणानुरोधों में सेनापति अकाल की पुनः पुनः शंख-ध्वनि हो रही है। इसी समय सजीव शान्ति की प्रतिमा-सी एक निर्वसना-बालिका शून्यमना दो शवों के बीच खड़ी हुई चिदम्बर को दीख पड़ी।

“ये तुम्हारे कौन हैं?” शवों की ओर इंगित कर वहीं की भाषा में चिदम्बर ने पूछा।
बालिका आश्चर्य की तन्मय दृष्टि से शवों को कुछ देर देखती रहकर शून्य भाव से अज्ञात मनुष्य की ओर देखने लगी।
चिदम्बर ने अपनी तरफ से पूछा-“ये तुम्हारे माँ-बाप हैं?”
बालिका की आँखें सजल हो आईं।
चिदम्बर ने सस्नेह कहा-“बेटी, हमारे साथ डेरे चलो, तुमको अच्छा-अच्छा खाना देंगे।”

बालिका साथ हो ली। उसकी अन्तरात्मा उसे समझा चुकी थी कि उसके माता-पिता उस नींद से न जगेंगे। उसे माता-पिता को सचेत करने का इतना उद्यम पहले कभी नहीं करना पड़ा, यहीं उसके प्राणों में उनके सदा अचेत रहने का अटल विश्वास हुआ।
पहले चिदम्बर ने अच्छी तरह, उसे अपना दुपट्टा पहना दिया, फिर उँगली पकड़कर धीरे-धीरे डेरे की ओर चला, जो वहाँ से कुछ ही फासले पर था।
अकाल-पीड़ितों की समुचित सेवा के लिए मदरास के 'पतित-पावन संघ' के प्रधान निरीक्षक की हैसियत से संघ को साथ लेकर चिदम्बर वहाँ गया था।
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2
कुछ दिनों बाद धन-संग्रह के लिए चिदम्बर को मदरास जाना पड़ा। शिक्षण-पोषण के लिए अनाथ-आश्रम में भर्ती कर देने के उद्देश्य से बालिका को भी साथ ले गया। वहाँ जाने पर मालूम हुआ कि राजा रामनाथसिंह रामेश्वरजी के दर्शन कर कुछ दिनों से ठहरे हुए हैं, उसे मिल आने के लिए बुलावा भेजा था। चिदम्बर के पिता जज के पद से पेंशन लेकर कुछ दिनों तक राजा साहब के यहाँ दीवान रह चुके थे; उन दिनों चिदम्बर को पिता के पास युक्तप्रान्त में रहकर प्रयाग-विश्वविद्यालय में अध्ययन करना पड़ा था। अब उसके पिता नहीं हैं।

संवाद पा राजा साहब से मिलने के लिए चिदम्बर उनके वास-स्थल को गया। बाढ़ की बातचीत में बालिका का प्रसंग भी आया। चिदम्बर उसे अनाथ आश्रम में परवरिश के लिए छोड़ रहा है, यह सुनकर कारुण्य-वश राजा साहब ने ही उसे अपने साथ सिंहपुर ले जाने के लिए कहा। चिदम्बर इनकार करे, ऐसा कारण न था; बालिका रानी साहिबा की देख-रेख में, उन्हीं के साथ, उनकी राजधानी गई।

3
आठ साल की लड़की रानी साहिबा की दासियों से स्नेह तथा निरादर प्राप्त करती हुई, उन्हीं में रहकर, उन्हीं के संस्कारों में ढलती हुई धीरे-धीरे परिणत हो चली। वहाँ जो धर्म दासियों का, जो भगवान्‌ रानी से सेविकाओं तक के थे; वही उसके भी हो गए। झूठ अपराध लगने पर दासियों की तरह वह भी कसम खाकर कहने लगी, “अगर मैंने ऐसा किया हो, तो सरकार, सीतला भवानी मेरी आँख ले लें।' वहाँ सभी हिन्दी बोलती थीं, पर जो मधुरता उसके गले में थी, वह दूसरे में न थी; जैसे हारमोनियम के तीसरे सप्तक पर बोलती हो। रानी साहिबा उससे प्रसन्न थीं। क्योंकि दूसरी दासियों से वह काम करने में तेज और सरल थी। उसका नाम हिरनी रक्खा था। वह जिस रोज रनिवास में आई थी, तब से आज तक, उसी तरह, अरण्य की, दल से छुटी हुई, छोटी हिरनी सी, एकाएक खड़ी होकर, सजग दृग, पार्श्व-स्थिति का ज्ञान-सा प्राप्त करने लगती है कि वह कहाँ आई, यहाँ कोई भय तो नहीं। दृष्टि के सूक्ष्मतम तार इस पृथ्वी के परिचय से नहीं, जैसे शून्य आकाश में बंधे हुए हों; जैसे उसे पृथ्वी पर उतार कर विधाता ने एक भूल की हो। उसके इस भाव के दर्शन से 'हिरनी' नाम, कवि के शब्द की तरह, रानी के कंठ से आप निकल आया था।

वही हिरनी अब जीवन के रूपोज्ज्वल वसन्‍त में कली की तरह मधु-सुरभि से भरकर चतुर्दिक्‌ सूचना-सी दे रही है कि प्रकृति की दृष्टि में अमीर और गरीबवाला क्षुद्र भेद-भाव नहीं, वह सभी की आँखों को एक दिन यौवन की ज्योत्स्ना से स्निग्ध कर देती है; किरणों के जल से भरकर, जीवन में एक ही प्रकार की लहरें उठाती हुई, परिचय के प्रिय पथ पर बहा ले जाती है; जो सबसे बड़ी है, जिसके भीतर ही बड़े और छोटे के नाम में भ्रम है, वह स्वयं कभी छोटे और बड़े का निर्णय नहीं करती, उसकी दृष्टि में सभी बराबर हैं, क्योंकि सब उसी के हैं। उसी ने हिरनी में एक आशा, एक अज्ञात सुख की आकांक्षा भी भर दी, जिससे दृष्टि में मद, मद में नशा, नशे में संसार के विजय की निश्चल भावना मनुष्य को स्त्री के प्रणय के लिए खींचती रहती है।

इसी समय इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त कर राजकुमार घर लौटे थे, और दो-तीन बार हिरनी को बुला चुके थे। रानी दूसरी दासियों से यह समाचार पाकर हिरनी का विवाह कर देने की सोचनी लगीं। वहीं एक कहार रामगुलाम रहता था। नौजवान था। रानी साहिबा ने उससे पुछवाया कि हिरनी से विवाह करने को वह राजी है या नहीं। वह बहुत खुश हुआ, उत्तर में अपनी खुशी को दबाकर रानी साहिबा को खुश करने वाले शब्दों में कहा-“सरकार की जैसी मर्जी हो, सरकार की हुकुम-अदूली मुझसे न होगी।”
विवाह में घरवालों की राय न थी। रामगुलाम बागी हो गया।
एक दिन उसके साथ हिरनी का विवाह प्रासाद के आंगन में कर दिया गया। हिरनी पति के साथ रहने लगी। साल ही भर में एक लड़की की माँ हो गई।

4
दो साल और पार हो गए। रानी साहिबा का स्नेह, हिरनी के कन्यास्नेह के बढ़ने के साथ-साथ, उस पर से घटने लगा। जिन दासियों की पहले उसके सामने न चलती थी, वे ताक पर थीं कि मौका मिले, तो बदला चुका लें।
एक दिन रानी साहिबा ताश खेल रही थीं। पक्ष और विपक्ष में उन्हीं की दासियाँ थीं। श्यामा उर्फ स्याही उन्हीं की तरफ थी। मौका अच्छा समझकर बोली-“सरकार को हिरनी ने आज फिर धोखा दिया; मैं गई थी, उसकी लड़की को जूड़ी-बुखार कहीं कुछ भी नहीं।”
लड़की की बीमारी के कारण हिरनी दो दिन की छुट्टी ले गई थी। रानी साहिबा पहले ही से नाराज़ थीं। अब धुआँ देती हुई लकड़ी को हवा लगी, वह जल उठी। रानी साहिबा ने उसी वक्‍त स्याही को एक नौकर से पकड़ लाने के लिए कहने को भेज दिया। स्याही पुलकित होकर बूटासिंह के पास गई। बूटासिंह से उसकी आशनाई थी। बोली, “सरकार कहती हैं, हिरनी का झोंट पकड़कर ले आओ, अभी ले आओ, बहुत जल्द।”

बूटासिंह जब गया, तब हिरनी बालिका के लिए वैद्य की दी एक दवा अपने दूध में घोल रही थी। बूटासिंह को मतलब समझाने के लिए तो कहा नहीं गया था। उसने झोंट पकड़कर खींचते हुए कहा-“चल, सरकार बुलाती हैं।”
प्रार्थथा की करुण चितवन से बूटासिंह को देखती हुई हिरनी बोली-“कुछ देर के लिए छोड़ दो, मयना को दवा पिला दूँ।”
घसीटता हुआ बूटासिंह बोला-“लौटकर दवा पिला चाहे जहर, सरकार ने इसी वक्‍त बुलाया है।”
स्याही साथ लेकर ऊपर गई। हिरनी रानी साहिबा की मुद्रा तथा क्रूर चितवन देखकर कांपने लगी।
रानी साहिबा ने हिरनी को पास पकड़ लाने के लिए स्याही से कहा। स्याही ने जोर से खींचा, पर हिरनी का हाथ छूट गया, जिससे वह गिर गई, हाथ मोच खाकर उतर गया।
रानी साहिबा क्रोध से काँपने लगीं। दूसरी दासियों को पकड़ लाने के लिए भेजा। इच्छा थी कि उसका सर दबाकर स्वयं प्रहार करें। दासियाँ पकड़कर ले चलीं, तो रानी साहिबा को आँसुओं में देखती हुई उसी अनिंद्य हिन्दी में हिरनी क्षमा-प्रार्थना करती हुई बोली-“सरकार, मेरा कुछ कुसूर नहीं है।”
पर कौन सुनता है, उससे रानी साहिबा की सेवा में कसर रह गई है।
जब पास पहुँची, उसको झुकाकर मारने के लिए रानी साहिबा ने घूँसा बाँधा।
हिरनी के मुख से निकला-“हे रामजी!”
रानी साहिबा की नाक से खून की धारा बह चली। यह वहीं मूर्च्छित हो
गईं। हिरनी के बाल, मुख उसी खून से रंग गए।

5
डॉक्टरों ने आकर कहा, गुस्से से खून सर पर चढ़ गया है। तब से ज़रा भी गुस्सा करने पर रानी साहिबा को यह बीमारी हो जाती है।


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