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होली पर कविताएँ नज़ीर अकबराबादी Poems on Holi Nazeer Akbarabadi

Nazeer-Akbarabadi


होली पर कविताएँ नज़ीर अकबराबादी
Poems on Holi Nazeer Akbarabadi

1. हुआ जो आके निशाँ आश्कार होली का - नज़ीर अकबराबादी

हुआ जो आके निशाँ आश्कार होली का ।
बजा रबाब से मिलकर सितार होली का ।
सुरुद रक़्स हुआ बेशुमार होली का ।
हँसी-ख़ुशी में बढ़ा कारोबार होली का ।
ज़ुबाँ पे नाम हुआ बार-बार होली का ।।1।।

ख़ुशी की धूम से हर घर में रंग बनवाए ।
गुलाल अबीर के भर-भर के थाल रखवाए ।
नशों के जोश हुए राग-रंग ठहराए ।
झमकते रूप के बन-बन के स्वाँग दिखलाए ।
हुआ हुजूम अजब हर किनार होली का ।।2।।

गली में कूचे में ग़ुल शोर हो रहे अक्सर ।
छिड़कने रंग लगे यार हर घड़ी भर-भर ।
बदन में भीगे हैं कपड़े, गुलाल चेहरों पर ।
मची यह धूम तो अपने घरों से ख़ुश होकर ।
तमाशा देखने निकले निगार होली का ।।3।।

बहार छिड़कवाँ कपड़ों की जब नज़र आई ।
हर इश्क़ बाज़ ने दिल की मुराद भर पाई ।
निगाह लड़ाके पुकारा हर एक शैदाई ।
मियाँ ये तुमने जो पोशाक अपनी दिखलाई ।
ख़ुश आया अब हमें, नक़्शो-निगार होली का ।।4।।

तुम्हारे देख के मुँह पर गुलाल की लाली ।
हमारे दिल को हुई हर तरह की ख़ुशहाली ।
निगाह ने दी, मये गुल रंग की भरी प्याली ।
जो हँस के दो हमें प्यारे तुम इस घड़ी गाली ।
तो हम भी जानें कि ऐसा है प्यार होली का ।।5।।

जो की है तुमने यह होली की तरफ़ा तैयारी ।
जो हँस के देखो इधर को भी जान यक बारी ।
तुम्हारी आन बहुत हमको लगती है प्यारी ।
लगा दो हाथ से अपने जो एक पिचकारी ।
तो हम भी देखें बदन पे सिंगार होली का ।।6।।

तुम्हारे मिलने का रखकर हम अपने दिल में ध्यान ।
खड़े हैं आस लगाकर कि देख लें एक आन ।
यह ख़ुशदिल का जो ठहरा है आन कर सामान ।
गले में डाल कर बाहें ख़ुशी से तुम ऐ जान !
पिन्हाओ हम को भी एकदम यह हार होली का ।।7।।

उधर से रंग लिए आओ तुम इधर से हम ।
गुलाल अबीर मलें मुँह पे होके ख़ुश हर दम ।
ख़ुशी से बोलें हँसे होली खेल कर बाहम ।
बहुत दिनों से हमें तो तुम्हारे सर की कसम ।
इसी उम्मीद में था इन्तिज़ार होली का ।।8।।

बुतों की गालियाँ हँस-हँस के कोई सहता है ।
गुलाल पड़ता है कपड़ों से रंग बहता है ।
लगा के ताक कोई मुँह को देख रहता है ।
’नज़ीर’ यार से अपने खड़ा ये कहता है ।
मज़ा दिखा हमें कुछ तू भी यार होली का ।।9।।

(आश्कार=ज़ाहिर, सुरुद=गाना, रक़्स=
नृत्य, अबीर=अभ्रक का चूर्ण, निगार=प्रेमी,
नक़्शो-निगार=बेल-बूटे, मय=शराब, बाहम=
आपस में)

2. बुतों के ज़र्द पैराहन में इत्र चम्पा जब महका - नज़ीर अकबराबादी

बुतों के ज़र्द पैराहन में इत्र चम्पा जब महका ।
हुआ नक़्शा अयाँ होली की क्या-क्या रस्म और रह का ।।१।।

गुलाल आलूदः गुलचहरों के वस्फ़े रुख में निकले हैं ।
मज़ा क्या-क्या ज़रीरे कल्क से बुलबुल की चह-चह का ।।२।।

गुलाबी आँखड़ियों के हर निगाह से जाम मिल पीकर ।
कोई खरखुश, कोई बेख़ुद, कोई लोटा, कोई बहका ।।३।।

खिडकवाँ रंग खूबाँ पर अज़ब शोखी दिखाता है ।
कभी कुछ ताज़गी वह, वह कभी अंदाज़ रह-रह का ।।४।।

भिगोया दिलवरों ने जब 'नज़ीर' अपने को होली में ।
तो क्या क्या तालियों का ग़ुल हुआ और शोर क़ह क़ह का ।।५।।

(पैराहन=वस्त्र, नक़्शा अयाँ=तस्वीर स्पष्ट हो गई,
रस्म और रह=तौर-तरीके, आलूदः=लगे हुए,
रुख=कपोल, कल्क=बेचैन, खरखुश=नशे में मस्त,
शोखी=चंचलता, ग़ुल=शोर)

3. बजा लो तब्लो तरब इस्तमाल होली का - नज़ीर अकबराबादी

बजा लो तब्लो तरब इस्तमाल होली का ।
हुआ नुमूद में रंगो जमाल होली का ।।
भरा सदाओं में, रागो ख़़याल होली का ।
बढ़ा ख़ुशी के चमन में निहाल होली का ।।
अज़ब बहार में आया जमाल होली का ।।१।।

हर तरफ़ से लगे रंगो रूप कुछ सजने ।
चमक के हाथों में कुछ तालियाँ लगी बजने ।।
किया ज़हूर हँसी और ख़ुशी की सजधज ने ।
सितारो ढोलो मृदंग दफ़ लगे बजने ।।
धमक के तबले पै खटके है ताल होली का ।।२।।

जिधर को देखो उधर ऐशो चुहल के खटके ।
हैं भीगे रंग से दस्तारो जाम और पटके ।।
भरे हैं हौज कहीं रंग के कहीं मटके ।
कोई ख़ुशी से खड़ा थिरके और मटके ।।
यह रंग ढंग है रंगी खिसाल होली का ।।३।।

निशातो ऐश से चलत तमाशे झमकेरे ।
बदन में छिड़कवाँ जोड़े सुनहरे बहुतेरे ।
खड़े हैं रंग लिए कूच औ गली घेरे ।
पुकारते हैं कि भड़ुआ हो अब जो मुँह फेरे ।
यह कहके देते हैं झट रंग डाल होली का ।।४।।

ज़रूफ़ बादए गुलरंग से चमकते हैं ।
सुराही उछले है और जाम भी छलकते हैं ।।
नशों के जोश में महबूब भी झमकते हैं ।
इधर अबीर उधर रंग ला छिड़कते हैं ।।
उधर लगाते हैं भर-भर गुलाल होली का ।।५।।

जो रंग पड़ने से कपड़ों तईं छिपाते हैं ।
तो उनको दौड़ के अक्सर पकड़ के लाते हैं ।।
लिपट के उनपे घड़े रंग के झुकाते हैं ।
गुलाल मुँह पे लगा ग़ुलमचा सुनाते हैं ।।
यही है हुक्म अब ऐश इस्तमाल होली का ।।६।।

गुलाल चहरए ख़ूबाँ पै यों झमकता है ।
कि रश्क से गुले-ख़ुर्शीद उसको तकता है ।।
उधर अबीर भी अफ़शाँ नमित चमकता है ।
हरेक के ज़ुल्फ़ से रंग इस तरह टपकता है ।।
कि जिससे होता है ख़ुश्क बाल-बाल होली का ।।७।।

कहीं तो रंग छिड़क कर कहें कि होली है ।
कोई ख़ुशी से ललक कर कहें कि होली है ।
अबीर फेंकें हैं तक कर कहें की होली है ।
गुलाल मलके लपक कर कहें कि होली है ।
हरेक तरफ़ से है कुछ इत्तिसाल होली का ।।८।।

यह हुस्न होली के रंगीन अदाए मलियाँ हैं ।
जो गालियाँ हैं तो मिश्री की वह भी डलियाँ हैं ।।
चमन हैं कूचाँ सभी सहनो बाग गलियाँ हैं ।
तरब है ऐश है, चुहलें हैं , रंगरलियाँ हैं ।।

अजब 'नज़ीर' है फ़रखु़न्दा हाल होली का ।।९।।

(तब्लो तरब=ख़ुशी का ढोल, नुमूद=धूमधाम,
रंगो जमाल=सुन्दरता, ज़हूर=रौशन, दस्तारो
जाम=पगड़ी और चादर, खिसाल=आदत, निशातो
ऐश=आनंद और सुख, गुले-ख़ुर्शीद=सूरजमुखी,
इत्तिसाल=मेल-मिलाप, तरब=आनन्द, फ़रखु़न्दा=
ख़ुशी का)

4. होली पिचकारी - नज़ीर अकबराबादी

हाँ इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी ।
देखें कैसी है तेरी रंगबिरंग पिचकारी ।।१।।

तेरी पिचकारी की तक़दीद में ऐ गुल हर सुबह ।
साथ ले निकले है सूरज की किरण पिचकारी ।।२।।

जिस पे हो रंग फिशाँ उसको बना देती है ।
सर से ले पाँव तलक रश्के चमन पिचकारी ।।३।।

बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में ।
अभी आ बैठें यहीं बनकर हम तंग पिचकारी ।।४।।

हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का 'नज़ीर' ।
पहुँचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी ।।५।।

(गुंचादहन=कली जैसे सुन्दर और छोटे मुँह वाली,
तक़दीद=स्वागत में, फिशाँ=रंग छिड़का हुआ)

5. जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की - नज़ीर अकबराबादी

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की ।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की ।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की ।
ख़म शीशए, जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की ।
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की ।।1।।

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे ।
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो-अदा के ढंग भरे ।
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे ।
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुँहचंग भरे ।
कुछ घुँघरू ताल झनकते हों तब देख बहारें होली की ।।2।।

सामान जहाँ तक होता है इस इशरत के मतलूबों का ।
वो सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो ख़ूबों का ।
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का ।
इस ऐश मज़े के आलम में इक ग़ोल खड़ा महबूबों का ।
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की ।।3।।

गुलज़ार खिले हों परियों के, और मजलिस की तैयारी हो ।
कपड़ों पर रंग के छीटों से ख़ुशरंग अजब गुलकारी हो ।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में पिचकारी हो ।
उस रंग भरी पिचकारी को, अँगिया पर तककर मारी हो ।
सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की ।।4।।

इस रंग रंगीली मजलिस में, वह रंडी नाचने वाली हो ।
मुँह जिसका चाँद का टुकड़ा हो औऱ आँख भी मय की प्याली हो ।
बदमस्त, बड़ी मतवाली हो, हर आन बजाती ताली हो ।
मयनोशी हो बेहोशी हो 'भड़ुए' की मुँह में गाली हो ।
भड़ुए भी भड़ुवा बकते हों, तब देख बहारें होली की ।।5।।

और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवैयों के लड़के ।
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट-घट के कुछ बढ़-बढ़ के ।
कुछ नाज़ जतावें लड़-लड़ के कुछ होली गावें अड़-अड़ के ।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन फ़ड़के ।
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की ।।6।।

यह धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का छक्कड़ हो ।
उस खींचा-खींच घसीटी पर और भडुए रंडी का फक्कड़ हो ।
माजून शराबें, नाच, मज़ा और टिकिया, सुलफ़ा, कक्कड़ हो ।
लड़-भिड़के 'नज़ीर' फिर निकला हो कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो ।
जब ऐसे ऐश झमकते हों तब देख बहारें होली की ।।7।।

(ख़म=सुराही, छकते=मस्त, गुलरू=फूलों जैसे मुखड़े वाली,
आहंग=गान, इशरत=ख़ुशी, मतलूबों=इच्छुक, मयनोशी=शराबनोशी,
भड़ुए=वेश्याओं के साथ नकल करने वाले, भड़ुवा=मज़ाक, भवैयों=
भावपूर्ण ढंग से नाचने वाले, माजून=कुटी हुई दवाओं को शहद या
शंकर क़िवाम में मिलाकर बनाया हुआ अवलेह, टिकिया=चरस गांजे
वगैरह की टिकिया, सुलफ़ा=चरस)

6. होली की बहार - नज़ीर अकबराबादी

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।

जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम 'नजीर'।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।

(जांफिशानी=जान तोड़ कोशिश, जाफरानी=केसर
के रंग का,केसरी, केसर से बना हुआ)

7. जब खेली होली नंद ललन - नज़ीर अकबराबादी

जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए खु़शवक्ती छोरी छैयन में॥
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में।
खु़शहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौपय्यन में॥
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥1॥

हर जगह होरी खेलन की तैयारी सब रंग जतन।
अम्बोह हुए खुशवक्ती के और ऐश खुशी के रूप बरन।
पिचकारी झमकी हाथों में और झमके तन के सब अबरन॥
हर आन हर इक नर नारी से होरी खेलन लागे नंद ललन।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥2॥

कुछ बांधे साथ अबीर अपने कुछ रंग उठाए बर्तन में।
कुछ कूदें उछलें खुश होकर कुछ लपकें होरी खेलन में॥
कुछ रंगी सबके हाथ भरे कुछ कपड़े भीग रहे तन में।
हर वक्त खुशी हर आन हंसी सौ खूबी घर औ आंगन में।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥3॥

नंदगांव में जब यह ठाठ हुए, बरसाने में भी धूम मची।
श्री किशन चले होली खेलन को ले अपने ग्वाल और बाल सभी॥
आ पहुंचे वट के बिरछन में हर आन खुशी चमकी झमकी।
वां आई राधा गोरी भी ले संग सहेली सब अपनी॥
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥4॥

घनश्याम इधर से जब आए वां गोरी की कर तैयारी।
और आई उधर से रंग लिए खुश होती वां राधा प्यारी॥
जब श्याम ने राधा गोरी के इक भर कर मारी पिचकारी।
तब मुख पर छीटे आन पड़ी और भीज गई तन की सारी॥
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥5॥

जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगीं पिचकारी भी।
कुछ सुर्ख़ी रंग गुलालों की, कुछ केसर की ज़रकारी भी॥
होरी खेलें हंस-हंस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।
यह भीगी सर से पांव तलक और भीगे किशन मुरारी भी॥
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥6॥

जब देर तलक मनमोहन ने वां होरी खेली रंग भरी।
सब भीगी भीड़ जो आई थी साथ उनके ग्वालों बालों की॥
तन भीगा किशन कन्हैया का यों रंगों की बौछार हुई।
और भीगी राधागोरी भी और उनकी संग सहेली भी॥
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥7॥

चर्चे चुहलें जब यों ठहरी खुशहाल हुए, दिल हर बारी।
कुछ आज ख़ुशी और खू़बी की कुछ बातें हुई प्यारी-प्यारी॥
यों होरी राधा प्यारी से जब हंस हंस खेले बनवारी।
वह रूप ‘नज़ीर’ आके झमके उन रूपों को हो बलिहारी॥
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में॥
गु़लशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में॥8॥

8. क़ातिल जो मेरा ओढ़े इक सुर्ख़ शाल आया - नज़ीर अकबराबादी

क़ातिल जो मेरा ओढ़े इक सुर्ख़ शाल आया।
खा-खा के पान ज़ालिम कर होंठ लाल आया।
गोया निकल शफ़क़ से बदरे-कमाल आया।
जब मुंह में वह परीरू मल कर गुलाल आया।
एक दम तो देख उसको होली को हाल आया।1॥

ऐशो तरब का सामां है आज सब घर उसके।
अब तो नहीं है कोई दुनियां में हमसर उसके।
अज़ माहताब माही बन्दे हैं बेज़र उसके।
कल वक़्ते शाम सूरज मलने को मुंह पर उसके।
रखकर शफ़क़ के सरपर तश्ते गुलाल आया॥2॥

ख़ालिस कहीं से ताज़ी एक जाफ़रां मंगाकर।
मुश्को-गुलाब में भी मल कर उसे बसाकर।
शीशे में भर के निकला चुपके लगा छुपा कर।
मुद्दत से आरजू थी इक दम अकेला पाकर।
इक दिन सनम पे जाकर में रंग डाल आया॥3॥

अर्बाबेबज़्म फिर तो वह शाह अपने लेकर।
सब हमनशीन हस्बे दिलख़्वाह अपने लेकर।
चालाक चुस्त काफ़िर गुमराह अपने लेकर।
दस-बीस गुलरुखों को हमराह अपने लेकर।
यों ही भिगोने मुझको यह खुशजमाल आया॥4॥

इश्रत का उस घड़ी था असबाब सब मुहय्या ।
बहता था हुस्न का भी उस जा पे एक दरिया।
हाथों में दिलबरों के साग़र किसी के शीशा ।
कमरों में झोलियों में सेरों गुलाल बांधा।
और रंग की भी भर कर मश्को-पखाल आया॥5॥

अय्यारगी से पहले अपने तई छिपाकर।
चाहा कि मैं भी निकलूं उनमें से छट छटाकर।
दौड़े कई यह कहकर जाता है दम चुराकर।
इतने में घेर मुझको और शोरो गुल मचाकर।
उस दम कमर-कमर तक रंगो गुलाल आया॥6॥

यह चुहल तो कुछ अपनी किस्मत से मच रही थी।
यह आबरू की पर्दा हिर्फ़त से बच रही थी।
कैसा समां था कैसी शादी सी रच रही थी।
उस वक़्त मेरे सर पर एक धूम मच रही थी।
उस धूम में भी मुझको जो कुछ ख़याल आया॥7॥

लाजिम न थी यह हरकत ऐ खुश-सफ़ीर तुझको।
अज़हर है सब कहे हैं मिलकर शरीर तुझको।
करते हैं अब मलामत खुर्दो-कबीर तुझको।
लाहौल पढ़ के शैतां, बोला ”नज़ीर“ तुझको।
अब होली खेलने का पूरा कमाल आया॥8॥
(शफ़क़=उषा,शाम की लाली, बदरे कमाल=खू़बियों से
भरा चांद, परीरू=परियों जैसी शक्ल-सूरत वाला,हाल=
सुधबुध खोकर आनन्द विह्वल हो जाना, ऐशो-तरब=
भोग-विलास,हर्षोल्लास, माहताब माही=चांद से लेकर
मछली तक,आकाश से पाताल तक, बन्दे=सेवक, तश्ते
गुलाल=गुलाल भरा थाल, जाफ़रां=केसर, मुश्को-गुलाब=
कस्तूरी और गुलाब, सनम=प्रिय, अर्बाबेबज़्म=महफिल
के साथी, हमनशीन=साथी, दिलख़्वाह=मनमाने, गुलरुखों=
फूल जैसे सुन्दर मुख वाले, खुशजमाल=सुन्दर, इश्रत=
खुशी, असबाब=सामान, साग़र=प्याला, शीशा=बोतल,
मश्को-पखाल=मशक,पानी भरने की बड़ी मशक, हिर्फ़त=
चालाकी, खुश-सफ़ीर=खुशी लाने वाले, अज़हर=जाहिर,
शरीर=चंचल, मलामत=निन्दा, खुर्दो-कबीर=छोटे-बड़े,
लाहौल=घृणा और उपेक्षासूचक वाक्य)

9. फिर आन के इश्रत का मचा ढंग ज़मी पर - नज़ीर अकबराबादी

फिर आन के इश्रत का मचा ढंग ज़मी पर।
और ऐश ने अर्सा है किया तंग ज़मीं पर।
हर दिल को खुशी का हुआ आहंग ज़मी पर।
होता है कहीं राग कहीं रंग ज़मीं पर।
बजते हैं कहीं ताल कहीं जंग ज़मीं पर॥
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥1॥

घुंघरू की पड़ी आन के फिर कान में झंकार।
सारंगी हुई बीन तंबूरो की मददगार॥
तबलों के ठुके तबल यह साज़ों के बजे तार।
रागों के कहीं गुल कहीं नाचां के बंधे तार॥
ढोलक कहीं झनकारे हैं मरदंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥2॥

इस रुत में चमन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
और जंगलो बन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
हर शोख के तन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
आशिक़ के बदन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
सब ऐश के रंगों में हैं हमरंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥3॥

मारा है निपट होली के रंगों ने अजब जोश।
जो रंग में इक ख़ल्क बनी फिरती है गुलपोश।
है नाच कहीं, राग कहीं, रग कहीं जोश।
पीते हैं नशे ऐश में सब लोटे हैं मदहोश।
माजू कहीं पीते हैं कहीं भंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥4॥

मैख़ानों में देखो तो अजब सैर है यारो।
वां मस्त पड़े लोटे हैं और करते हैं हो! हो!।
मस्ती से सिवा ऐश नहीं होश किसी को।
शीशों में, प्यालों में, सुराही में खुशी हो।
उछले हैं पड़ी बाद-ए-गुलरंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥5॥

”गा गा“ की पुकारें हैं कहीं रंगों की छिड़क है।
मीना की भभक और कहीं सागर की झलक है।
तबलों की सदाएं कहीं तालों की झनक है।
ताली की बहारें कहीं ठिलिया की खड़क है।
बजता है कहीं डफ़ कहीं मुहचंग ॥6॥

मस्ती में उठा आंख जिधर देखो अहा! हा!
नाचे हैं तबायफ़ कहीं मटके है भवय्या।
चलते हैं कहीं जाम कहीं स्वांग का चर्चा।
और रंग की गलियों में जो देखो तो हर इक जा।
बहती हैं उमड़ कर जमनी गंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥7॥

मामूर है खू़बां से गली कूच ओ बाज़ार।
उड़ता है अबीर और कहीं पिचकारी की है मार।
छाया है गुलालों का हर इक जा पै धुआंधार।
पड़ती है जिधर देखो उधर रंग की बौछार।
है रंग छिड़कने से हर एक दंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥8॥

भागे हैं कहीं रंग किसी पर जो कोई डाल।
वह पोटली मारे है उसे दौड़ के फ़िलहाल।
यह टांग घसीटे है तो वह खींचे पकड़ बाल।
वह हाथ मरोड़े तो यह तोड़े है खड़ा गाल।
इस ढब के हर इक जा पे मचे ढंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥9॥

बैठे हैं सब आपस में नहीं एक भी कड़वा।
पिचकारी उठाकर कोई झमकावे है घड़वा।
भरते हैं कहीं मशक कहीं रंग का गड़वा।
क्या शाद वह होता है जिसे कहते हैं भड़वा।
सुनते हैं यहां तक नहीं अब नंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥10॥
(इश्रत=सुख,भोग-विलास का सुख, अर्सा=
क्षेत्र, आहंग=इरादा, ख़ल्क=जनता, गुलपोश=
फूलों से लदी हुई, मीना=शराब की बोतल,
सुराही,माजू=पिसी हुई भांग जो चाशनी में
डालकर जमा ली जाती है, डफ=लकड़ी के
गोल बड़े मेंडरे पर चमड़ा मढ़कर बनाया
गया बड़ा बाजा, मुहचंग=मुंह में पकड़कर
उंगलियों से बजायाजाने वाला सुरीली आवाज
वाला बाजा, तबायफ़=वेश्या, भवय्या=भाव
बता बताकर नाचने वाला, मामूर=भरे हुए
खू़बां=सुन्दरियां, भड़वा=सफरदाई,रंडियों की
दलाली करने वाला)

10. मियां तू हमसे न रख कुछ गुबार होली में - नज़ीर अकबराबादी

मियां तू हमसे न रख कुछ गुबार होली में।
कि रूठे मिलते हैं आपस में यार होली में।
मची है रंग की कैसी बहार होली में।
हुआ है ज़ोरे चमन आश्कार होली में।
अजब यह हिन्द की देखी बहार होली में॥1॥

अब इस महीने में पहुंची हैं यां तलक यह चाल।
फ़लक का जामा पहन सुखऱी शफ़क़ से लाल।
बनाके चांद और सूरज के आस्मा पर थाल।
फरिश्ते खेले हैं होली बना अबीरो गुलाल।
तो आदमी का भला क्या शुमार होली में॥2॥

सुनाके होली जो जहरा बजाती है तंबूर।
तो उसके राग से बारह बरूज हैं मामूर।
छओं सितारों के ऊपर पड़ा है रंग का नूर।
सभों के सर पै हरदम पुकारती हैं हूर।
कि रंग से कोई मत कीजो आर होली में॥3॥

जो घिर के अब्र कभी इस मजे़ में आता है।
तो बादलों में वह क्या-क्या ही रंग लाता है।
खुशी से राँद भी ढोलक की गत लगाता है।
हवा की होलियां गा-गा के क्या नचाता है।
तमाम रंग से पुर है बहार होली में॥4॥

चमन में देखो तो दिन रात होली रहती है।
शराब नाब की गुलशन में नहर बहती है।
नसीम प्यार से गुंचे का हाथ गहती है।
और बाग़वान से बुलबुल खड़ी यह कहती है।
न छेड़ मुझको तू ऐ बदशिआर होली में॥5॥

गुलों ने पहने हैं क्या क्या ही जोड़े रंग-बिरंग।
कि जैसे लड़के यह माशूक पहनते हैं तंग।
हवा से पत्तों के बजते हैं ताल और मरदंग।
तमाम बाग़ में खेले हैं होली गुल के संग।
अजब तरह की मची है बहार होली में॥6॥

मजे़ की होती है होली भी राव राजों के यां।
कई महीनों से होता है फाग का सामां।
महकती होलियां गाती हैं गायनें खड़ियां।
गुलाल अबीर भी छाया है दर ज़मीनों ज़मां।
चहार तरफ़ है रंगों की मार होली में॥7॥

अमीर जितने हैं सब अपने घर में है खु़शहाल।
क़ब़ाऐं पहने हुए तंग तंग गुल की मिसाल।
बनाके गहरी तरह हौज़ मिल के सब फिलहाल।
मचाते होलियां आपस में ले अबीरो गुलाल।
बने हैं रंग से रंगी निगार होली में॥8॥

यह सैर होली की हमने तो ब्रज में देखी।
कहीं न होवेगी इस लुत्फ़ की मियां होली।
कोई तो डूबा है दामन से लेके ता चोली।
कोई तो मुरली बजाता है कह ‘कन्हैयाजी’।
है धूमधाम यह बेइख़्तियार होली में॥9॥

घरों से सांवरी और गौरियां निकल चलियां।
कुसुंभी ओढ़नी और मस्ती करती अचपलियां।
जिधर को देखें उधर मच रही है रंगरलियां।
तमाम ब्रज की परियों से भर रही गलियां।
मज़ा है, सैर है, दर हर किनार होली में॥10॥

जो कोई हुस्न की मदमाती गोरी है वाली।
तो उसके चेहरे से चमके हैं रंग की लाली।
कोई तो दौड़ती फिरती है मस्त रुखवाली।
किसी की कुर्ती भी अंगिया भी रंग से रंग डाली।
किसी को ऐश सिवा कुछ न कार होली में॥11॥

जो कुछ कहाती है अबला बहुत पिया-प्यारी।
चली है अपने पिया पास लेके पिचकारी।
गुलाल देख के फिर छाती खोल दी सारी।
पिया की छाती से लगती वह चाव की मारी।
न ताब दिल को रही ने क़रार होली में॥12॥

जो कोई स्यानी है उनमें तो कोई है नाकंद ।
वह शोर बोर थी सब रंग से निपट यक चंद।
कोई दिलाती है साथिन को यार की सौगंद।
कि अब तो जामा व अंगिया के टूटे हैं सब बंद।
‘फिर आके खेलेंगे होकर दो चार होली में'॥13॥

कोई तो शर्म से घूंघट में सैन करती है।
और अपने यार के नैनों में नैन करती है।
कोई तो दोनों की बातों को गै़न करती है।
कोई निगाहों में आशिक़ को चैन करती है।
ग़रज तमाशे हैं होते हज़ार होली में॥14॥

‘नज़ीर’ होली का मौसम जो जग में आता है।
वह ऐसा कौन है होली नहीं मनाता है।
कोई तो रंग छिड़कता है कोई गाता है।
जो ख़ाली रहता है वह देखने को जात है।
जो ऐश चाहो सो मिलता है यार होली में॥15॥
(गुबार=मनोमालिन्य, आश्कार=प्रकट, फ़लक=
आकाश, शफ़क़=उषा,शाम की लाली, नाब=
खालिस, नसीम=ठंडी और धीमी हवा, गुंचे=
कली, बदशिआर=दुष्प्रकृति वाले, क़ब़ाऐं=दोहरा
लंबा अंगरखा, चोग़ा, निगार=समान, दामन=
कार=कार्य, ताब=शक्ति, नाकंद=नादान)

11. जुदा न हमसे हो ऐ ख़ुश जमाल होली में - नज़ीर अकबराबादी

जुदा न हमसे हो ऐ ख़ुश जमाल होली में।
कि यार फिरते हैं यारों के नाल होली में।
हर एक ऐश से हैगा बहाल होली में।
बहार और कुछ अब की है साल होली में।
मज़ा है सैर है हर सू कमाल होली में॥1॥

सभों के ऐश को फ़ागुन का यह महीना है।
सफ़ेदो ज़र्द में लेकिन कमाल कीना है।
तिला का ज़र्द कने सर ब सर ख़जीना है।
सफ़ेद पास फ़क़त सीम का दफ़ीना है।
हर एक दिल में है रुस्तमो-जाल होली में॥2॥

कहा सफे़द से आखि़र को ज़र्द ने यह पयाम।
कि ऐ सफ़ेद! तू अब छोड़ दे जहां का मुक़ाम।
मैं आया अब तो मेरा बन्दोबस्त होगा तमाम।
तू मुझसे आन के मिल छोड़ अपनी ज़िद का कलाम।
वगरना खींचेगा तू अनफ़आल होली में॥3॥

मिलेगा मुझसे तो मैं तुझको फिर बढ़ाऊँगा।
बनाके आपसा पास अपने ले बिठाऊँगा।
कहा सफ़ेद ने मैं मुत्लक़न न आऊंगा।
तुझी को बाद कई दिन के मैं भगाऊंगा।
तू अपना देखियो क्या होगा हाल होली में॥4॥

यह सुनके तैश में आ ज़र्द का सिपह सालार।
चढ़ आया फ़ौज को लेकर सफ़ेद पर यकबार।
इधर सफ़ेद भी लड़ने को होके आया सवार।
सफ़ें मुक़ाबला दोनों की जब हुई तैयार।
हुआ करख़्त जबाबो सवाल होली में॥5॥

मिला इधर से सफ़ेद और उधर से ज़र्द बहार।
घटाएं रंग बिरंग फ़ौजों की झुकीं सरशार।
पखाले मशके छुटीं रंग की पड़ी बौछार।
और चार तरफ़ से पिचकारियों की मारामार।
उड़ा ज़मीं से ज़मां तक गुलाल होली में॥6॥

यहां तो दोनों में आपस में हो रही यह जंग।
उधर से आया जो एक शोख़ बारुख़ गुल रंग।
हज़ारों नाज़नी माशूक़ और उसके संग।
नशे में मस्त, खुली जुल्फ़, जोड़े रंग बरंग।
कहा कि पूछो तो क्या है यह हाल होली में॥7॥

कहा किसी ने कि ऐ बादशाहे! महरुमा।
सफ़ेदी ज़र्द यह आपस में लड़ रहे हैं यहां।
यह सुन के आप वह दोनों के आगया दरमियां।
इधर से थांबा उसे और उधरसे उसको कि हां।
तुम इस कदर न करो इख़्तिलाल होली में॥8॥

महा तुम्हारी ख़सूमत का माजरा है क्या।
कहा सफ़ेद ने नाहक यह ज़र्द है लड़ता।
यह सुनके उसने वहीं अपना एक मगा जोड़ा।
फिर अपने हाथ से जोड़े को छिड़कवा रंगवा।
कहा कि दोनों रहो शामिल हाल होली में॥9॥

फिर अपने तन में जो पहनी वह खि़लअतें रंगीं।
सभों को हुक्म किया तुम भी पहनों अब यूं ही।
हज़ारों लड़कों ने पहने वह जोड़े फिर बूं हीं।
पुकारी खल्क़ कि इन्साफ़ चाहिए यूं ही।
हुआ फिर और ही हुस्नो जमाल होली में॥10॥

कियां मैं क्या कहूं फिर इस मजे़ की ठहरी बहार।
जिधर को आंख उठाकर नज़र करो एक बार।
हज़ारों बाग रवाँ हैं करोड़ों हैं गुलज़ार।
चमन चमन पड़े फिरते हैं सरब गुल रुख़सार।
अजब बहार के हैं नौनिहाल होली में॥11॥

जो नहर हुस्न की है मौज़ मार चलती है।
अलम लिए हुए आगे बहार चलती है।
अगाड़ी मस्त सफ़े गुल इज़ार चलती है।
पिछाड़ी आशिक़ों की सब क़तार चलती है।
सभों के दिल में खु़शी का खयाल होली में॥12॥

गुलाल अबीर से कितने भरे हैं चौपाये।
तमाम हाथों में गड़ुवे भी रंग के लाये।
कोई कहे है किसी से ‘कि हम भी लो आये’।
तो उससे कहता वह हंसकर कि ‘आ मेरे जाये’।
हंसी खु़शी का का है क़ालोमक़ाल होली में॥13॥

इसी बहार से गोकुलपरे में जा पहुंचे।
और मंडी नाई की और सईद खां की मंडी से।
सब आलम गंज में शाहगंजो ताजगंज फिरे।
हैं शहर में नहीं और गिर्द शहर में रहते।
हुआ हुजूम का बहरे कमाल होली में॥14॥

सभों को लेके किनारी बजार में आये।
फिर मोती कटरे फुलट्ठी के लोग सब धाये।
कि पीपल मंडी व पन्नीगली के भी आये।
जहां तहां से यह घिर घिर के लोग सब धाये।
कि बेनवाओं के देखें ज़माल होली में॥15॥

हुई जो सब में शरीफो-रज़ील में होली।
तो पहले रंग की पिचकारियों की मार हुई।
किसी का भर गया जामा किसी की पगड़ी भरी।
किसी के मुंह पे लगाई गुलाल की मुट्ठी।
तो रफ़्ता रफ़्ता हुई फिर यह चाल होली में॥16॥

घटाएं मशकों पखालों की झूम कर आई।
सुनहरी बिजलियां पिचकारियों की चमकाईं।
सबा ने रंग की बौछारें आके बरसाईं।
हवा ने आन के सावन की झड़ियां बनवाई।
लगी बरसने को मशको पखाल होली में॥17॥

इधर गुलाल का बादल भी छा गया घनघोर।
सदाये-राद हुई हर किसी का गुल और शोर।
यह लड़के नाज़नी बोलें हैं कोकिला जों मोर।
तमाम रंग की बौछार से है शराबोर।
अजब है रंग, लगी बरशकाल होली में॥18॥

लगा के चौक से और चार सू तलक देखा।
कि जगह एक भी तिल धरने की नहीं है ज़रा।
तमाम भीड़ से हर तरफ़ बन्द है रस्ता।
तिस ऊपर रंग का बादल है इस क़दर बरसा।
कि हर गली में बहा ढोलीखाल होली में॥19॥

‘नज़ीर’ होली तो है हर नगर में अच्छी खूब।
वलेक ख़त्म हुआ आगरे पे ये असलूब।
कहां हैं ऐसे सनम और कहां हैं ये महबूब।
जिन्हों के देखे से आशिक़ का होवे ताज़ा क़लूब।
तेरी निराली है यां चाल ढाल होली में॥20॥
(ख़ुश जमाल=सुन्दर, नाल=साथ, सू=तरफ,
ज़र्द=केसरिया, कीना=रंजिश, तिला=सोना, कने=
पास, ख़जीना=ख़ज़ाना, सीम-चांदी, दफ़ीना=
ख़ज़ाना, रुस्तम=प्रसिद्ध ईरानी पहलवान,वीर,
जाल=रुस्तम पहलवान का पिता, पयाम=संदेश,
कलाम=कथन, मुत्लक़न=कदापि, तैश=क्रोध,
सिपह सालार=सेनापति, सफ=कतार, करख़्त=
कठोर,सख़्त, सरशार=मस्त, पखाले=बड़ी मशक,
मशक=पानी भरने की चमड़े की खाल, ज़मां=
संसार, नाज़नी=सुकुमारी,सुन्दरी, इख़्तिलाल=
विघ्न,गड़बड़ी, ख़सूमत=दुश्मनी, माजरा=हाल,
खि़लअतें=राज्य की ओर से सम्मानार्थ दिए
जाने वाले वस्त्र, खल्क़=लोग, गुल रुख़सार=
फूल जैसे गाल, अलम=झंडा, क़ालोमक़ाल=
वाद-विवाद, हुजूम=भीड़, बेनवाओं=दीन-हीन,
दरिद्र, शरीफ=कुलीन,सज्जन, रज़ील=नीच,
सबा=शीतलमंद समीर, सदाये-राद=बादल का
कड़कना, बरशकाल=वर्षाऋतु, सू=तरफ,
वलेक=लेकिन, असलूब=तरीका,तौर, सनम=
प्रिय, क़लूब=दिल)

12. मिलने का तेरे रखते हैं हम ध्यान इधर देख - नज़ीर अकबराबादी

मिलने का तेरे रखते हैं हम ध्यान इधर देख।
भाती है बहुत हमको तेरी आन इधर देख।
हम चाहने वाले हैं तेरे जान! इधर देख।
होली है सनम, हंस के तो एक आन इधर देख।
ऐ! रंग भरे नौ गुले-खंदान इधर देख॥1॥

हम देखने तेरा यह जमाल इस घड़ी ऐ जाँन!।
आये हैं यही करके ख़याल इस घड़ी ऐ जाँन!।
तू दिल में न रख हमसे मलाल इस घड़ी ऐ जाँन!।
मुखड़े पे तेरे देख गुलाल इस घड़ी ऐ जाँन!।
होली भी यही कहती है ऐ जान! इधर देख॥2॥

अब ज़र्द यह चीरा जो तेरे सर पे जमा है।
और इस पे यह तुर्रा जो ज़री का भी धरा है।
नीमा भी तेरा रंग से केसर के भरा है।
पोशाक पे तेरी गुले सद बर्ग फ़िदा है।
नर्गिस तेरी आंखों पे है कु़र्बान इधर देख॥3॥

होली की तरब है जो हर इक जा में नमूदार।
सुनते हैं कहीं राग कहीं मै से हैं सरशार।
है दिल में हमें तो तेरी नज़रों से सरोकार।
पिचकारी हमारे तो लगा, या न लगा यार।
हमको तो फ़कत है यही अरमान इधर देख॥4॥

है धूम से होली के कहीं शोर, कहीं गुल।
होता नहीं टुक रंग छिड़कने में तअम्मुल।
दफ़ बजते हैं सब हंसते हैं और धूम है बिल्कुल।
होली की खुशी में तू न कर हमसे तग़ाफुल।
ऐ जाँन! हमारा भी कहा मान इधर देख॥5॥

है दीद की हर आन तलब दिल को हमारे।
जीते हैं फ़क़त तेरी निगाहों के सहारे।
हैं याँ जो खड़े आन के इस शौक़ के मारे।
हम एक निगाह के तेरे मुश्ताक़ हैं प्यारे।
टुक प्यार की नज़रों से मेरी जान! इधर देख॥6॥

हर चार तरफ़ होली की धूमें हैं अहा! हा!।
देखो जिधर आता है नज़र रोज़ तमाशा।
हर आन झमकता है अजब ऐश का चर्चा।
होली को ‘नज़ीर’ अब तू खड़ा देखे है यां क्या।
महबूब यह आया, अरे नादान इधर देख॥7॥
(नये=नौ, गुले-खंदान=फूल जैसी मुस्कराहट
वाली,वाले, जमा=सजा, ज़री=सोने का बना
हुआ, नीमा=एक प्रकार का ऊंचा पाजामा,
गुले-सद बर्ग=सौ पत्तियों वाला,शतदल,
तरब=आनन्द,खुशी, मै=शराब, तअम्मुल=
सोच-विचार, तग़ाफुल=देर,विलम्ब, दीद=
दर्शन, तलब=इच्छा, फ़क़त=सिर्फ,केवल,
मुश्ताक़=अभिलाषी)

13. आ झमके ऐशो-तरब क्या क्या, जब हुश्न दिखाया होली ने - नज़ीर अकबराबादी

आ झमके ऐशो-तरब क्या क्या, जब हुश्न दिखाया होली ने।
हर आन खुशी की धूम हुई, यूं लुत्फ़ जताया होली ने।
हर ख़ातिर को ख़रसन्द किया, हर दिल को लुभाया होली ने।
दफ़ रंगी नक्श सुनहरी का, जिस वक्त बजाया होली ने।
बाज़ार गली और कूचों में गुल शोर मचाया होली ने॥1॥

या स्वांग कहूं, या रंग कहूं, या हुस्न बताऊं होली का।
सब अबरन तन पर झमक रहा और केसर का माथे टीका।
हंस देना हर दम, नाज भरा, दिखलाना सजधज शोख़ी का।
हर गाली मिसरी, क़न्द भरी, हर एक कदम अटखेली का।
दिल शाद किया और मोह लिया, यह जीवन पाया होली ने॥2॥

कुछ तबले खड़के ताल बजे कुछ ढोलक और मरदंग बजे।
कुछ छड़पें बीन रबाबों की कुछ सारंगी और चंग बजे।
कुछ तार तंबूरों के झनके कुछ ढमढमी और मुहचंग बजे।
कुछ घुंघरू छनके छम-छम-छम कुछ गत-गत पर आहंग बजे।
है हर दम नाचने गाने का यह तार बंधाया होली ने॥3॥

हर जागह थाल गुलालों से खुश रंगत की गुलकारी है।
और ढेर अबीरों के लागे, सौ इश्रत की तैयारी है।
हैं राग बहारें दिखलाते और रंग भरी पिचकारी है।
मुंह सुखऱी से गुलनार हुए तन केसर की सी क्यारी है।
यह रूप झमकता दिखलाया यह रंग दिखाया होली ने॥4॥

पोशाकें छिड़कीं रंगों की और हर दम रंग अफ़्सानी है।
हर वक़्त खुशी की झमकें हैं पिचकारियों की रख़्शानी है।
कहीं होती है धींगा मुश्ती कहीं ठहरी खींचा तानी है।
कहीं लुटिया झमकती रंग भरी कहीं पड़ता कीचड़ पानी है।
हर चार तरफ खु़शहाली का यह जोश बढ़ाया होली ने॥5॥

हर आन खु़शी से आपस में सब हंस-हंस रंग छिड़कते हैं।
रुख़सार गुलालों से गुलगूं कपड़ों से रंग टपकते हैं।
कुछ राग और रंग झमकते हैं कुछ मै के जाम छलकते हैं।
कुछ कूदे हैं, कुछ उछले हैं, कुछ हंसते हैं, कुछ बकते हैं।
यह तौर ये नक़्शा इश्रत का, हर आन बनाया होली ने॥6॥

महबूब परीरू प्यारों की हर जानिब नोका झोंकी है।
कुछ आन रंगीली चलती है कुछ बान उधर से रोकी है।
कुछ सैनें तिरछी सहर भरी कुछ घात लगावट जो की है।
कुछ शोर अहा! हा! हा! हा! का कुछ धूम अहो! हो! हो! की है।
यह ऐश यह हिज यह काम, यह ढब, हर आन जताया होली ने॥7॥

माजूनों से रंग लाल हुए कहीं चलती मै की प्याली है।
कहीं साज तरब के बजते हैं दिल शादां मुंह पर लाली है।
सौ कसरत ऐश मुसर्रत की खुश वक़्ती और खुशहाली है।
कुछ बोली ठोली प्यार भरी, कुछ गाली है कुछ ताली है।
इन चर्चों का इन चुहलों का यह तार लगाया होली ने॥8॥

हैं क्या-क्या सर में रंग भरे और स्वांग भी क्या-क्या आते हैं।
कर बातें हर दम चुहल भरी, खुश हंसते और हंसाते हैं।
कुछ जोगी चेले बैठे हैं कुछ कामिनियों की गाते हैं।
कुछ और तरह के स्वांग बने कुछ नाचते हैं कुछ गाते हैं।
हर आन ‘नज़ीर’ इस फ़रहत का, सामान दिखाया होली ने॥9॥
(ऐशो-तरबआराम और खुशी, ख़रसन्द=खुश, दफ़=डफ़,
नक्श=शक्ल, चंग=डफ़ की शक्ल का एक बाजा, तंबूरों=
तानपूरा, ढमढमी=डफ़,डफ़ली,खंजड़ी, मुहचंग=मुंह में
दबाकर उंगलियों से बजाया जाने वाला एक बाजा,
आहंग=गान, गुलनार=अनार के फूल, रख़्शानी=गाल,
रुख़सार=कपोल,गाल, गुलगूं=गुलाब जैसे रंग वाले,
परीरू=परी जैसी शक्ल सूरत वाले, जानिब=तरफ,
सहर=बेदारी,जाग्रति, हिज=आनन्द,मजा, माजून=
कुटी हुई दवाओं को शहद या शकर के क़िवास में
मिलाकर बनाया हुआ अवलेह, मुसर्रत=खुशी)

14. आलम में फिर आई तरब उनवान से होली - नज़ीर अकबराबादी

आलम में फिर आई तरब उनवान से होली।
फ़रहत को दिखाती ही गई शान से होली।
रंगी हुई रंगों की फ़रावान से होली।
गुलगू है गुलालों की गुल अफ़्शान से होली।
झमकी तरबो ऐश के सामान से होली॥1॥

दफ़ बजने लगे हर कहीं गुल शोर की ठहरी।
गलियों में हुई खु़शदिली और कूंचों में खूबी।
यह नाच लगे होने कि दिल खु़श हुए और जी।
और राग खु़श आवाज हुए ऐसे कि जिनकी।
हर तान लगी खेलने हर कान से होली॥2॥

है फ़रहतो-इश्रत जो हर एक जा में फ़रावां।
चर्चे हैं बड़े धूम के चुहलें हैं नुमायां।
आये हैं तमाशे के लिए नाज़नी खू़बां।
होली का अजब हुस्न बढ़ाते हैं यह हर आं।
जब कहते हैं अपने लबे-ख़न्दांन से ‘होली’॥3॥

चेहरों पे गुलाल उनके लगा है जो बहुत सा।
आता है नज़र हुस्न का कुछ ज़ोर ही नक्शा।
है रंग में और रूप में झमका जो परी का।
देख उनकी बहारें यही कहते हैं अहा हा।
दुनियां में यह आई है परिस्तान से ‘होली’॥4॥

चमके हैं यह कुछ हुस्न परी चेहरों के ‘यारो’।
सब उनकी झमक देख के कहते हैं ‘उहो हो’।
फिरते हैं लगे चाहने वाले भी जो खुश हो।
पोशाक छिड़कवां से यह जाते हैं जिधर को।
वां उनके लगी फिरती है दामान से होली॥5॥

महबूबों में ठहरा है अजब होली का चर्चा।
जो रंग झमकता है पड़ा नाज़ो अदा का।
हर आन जताते हैं खड़े शोखि़यां क्या-क्या।
और पान जो खाते हैं तो वह पान भी गोया।
खेले हैं बुतों के लबो दन्दान से होली॥6॥

मुखड़े पे गुलाल आता है जिस दम नज़र उनके।
होते हैं निगाहों में अजब हुस्न के नक़्शे।
पिचकारियां हंस हंस के जो हर दम हैं लगाते।
वह हाथ हिंनाबस्ता भी कुछ मलते हैं ऐसे।
जो खेलें हैं आशिक़ के गिरीबान से होली॥7॥

वह शोख़ लिए रंग इधर जिस घड़ी आया।
फिर उस पे वही रंग बहुत हमने भी छिड़का।
उसने हमें और हमने उसे खू़ब भिगोया।
इस ऐश के नक़्शे को ‘नज़ीर’ आगे कहूं क्या।
हम खेले यह महबूब के एहसान से होली॥8॥
(आलम=संसार, तरब=आनन्द, उनवान=
शीर्षक, फ़रहत=खुशी,आनन्द, फ़रावान=बहुत
अधिक होने से, गुलगू=गुलाब जैसे रंग वाली,
गुल अफ़्शान=फूल बरसाने वाली, इश्रत=खुशी,
नुमायां=प्रकट,ज़ाहिर, खू़बां=सुन्दर स्त्रियां,माशूक,
आं=क्षण,पल, लबे-ख़न्दांन=हंसते हुए होंठ,
दन्दान=होंठ और दांत, हिंनाबस्ता=मेंहदी रचे
हुए, गिरीबान=कुर्ते या कमीज़ का गला,सिरा)

15. होली की बहार आई फ़रहत की खिलीं कलियां - नज़ीर अकबराबादी 

होली की बहार आई फ़रहत की खिलीं कलियां।
बाजों की सदाओं से कूचे भरे और गलियां।
दिलबर से कहा हमने टुक छोड़िये छलबलियां।
अब रंग गुलालों की कुछ कीजिय रंग रलियां।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥1॥

है सब में मची होली अब तुम भी यह चर्चा लो।
रखवाओ अबीर ऐ जां! और मैय को भी मंगवाओ।
हम हाथ में लोटा लें तुम हाथ में लुटिया लो।
हम तुमको भिगो डालें तुम हमको भिगो डालो।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥2॥

है तर्ज जो होली की उस तर्ज़ हंसो-बोलो।
जो छेड़ हैं इश्रत की अब तुम भी वही छेड़ो।
हम डालें गुलाल ऐ जां! तुम रंग इधर छिड़को।
हम बोलें ‘अहा हा हा’ तुम बोलो "उहो हो हो"।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥3॥

इस दम तो मियां हम तुम इस ऐश की ठहरावें।
फिर रंग से हाथों में पिचकारियां चमकावें।
कपड़ों को भिगो डालें और ढंग कई लावें।
भीगे हुए कपड़ों से आपस में लिपट जावें।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥4॥

हम छेड़ें तुम्हें हंस हंस, तुम छेड़ की ठहरा दो।
हम बोसे भी ले लेवें तुम प्यार से बहला दो।
हम छाती से आ लिपटें तुम सीने को दिखला दो।
हम फेकें गुलाल ऐ जां! तुम रंग को छलका दो।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥5॥

यह वक़्त खु़शी का है मत काम रखो रम से।
ले रंग गुलाल ऐ जां! और नाज़ की ख़म चम से।
हंस हंस के बहम लिपटें इस ऐश के आलम से।
हम ‘छोड़’ कहें तुमसे, तुम ‘छोड़’ कहो हमसे।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥6॥

कपड़ों पे जो आपस में अब रंग पड़े ढलकें।
और पड़के गुलाल ऐ जां! रंगीं हों भवें पलकें।
कुछ हाथ इधर तर हों कुछ भीगें उधर अलकें।
हर आन हंसे कूदें, इश्रत के मजे़ झलकें।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥7॥

तुम रंग इधर लाओ और हम भी उधर आवें।
कर ऐश की तैयारी धुन होली की बर लावें।
और रंग से छीटों की आपस में जो ठहरावें।
जब खेल चुकें होली फिर सीनों से लग जावें।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥8॥

इस वक़्त मुहैया है सब ऐशो-तरब की शै।
दफ़ बजते हैं हर जानिब और बीनो-रुबावो नै।
हो तुम में भी और हममें होली की है जो कुछ रै।
सुनकर यह ‘नज़ीर’ उसने हंस कर यह कहा ‘सच है।’
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥9॥
(फ़रहत=खुशी,आनन्द, सदाओं=आवाज़ों,
दिलबर=प्रिय, मैय=शराब, इश्रत=खुशी,आनन्द,
बोसे=चुम्बन, रम=भागना, बहम=आपस में,
मुहैया=उपस्थित, ऐशो-तरब=विलास, शै=चीज़,
बीनो-रुबाबो=नै=बीन, रुबाव और बांसुरी, रै=
राय)

16. जब आई होली रंग भरी - नज़ीर अकबराबादी

जब आई होली रंग भरी, सो नाज़ो-अदा से मटकमटक।
और घूंघट के पट खोल दिये, वह रूप दिखाया चमक-चमक।
कुछ मुखड़ा करता दमक-दमक कुछ अबरन करता झलक-झलक।
जब पांव रखा खु़शवक़्ती से तब पायल बाजी झनक-झनक।
कुछ उछलें, सैनें नाज़ भरें, कुछ कूदें आहें थिरक-थिरक॥1॥

यह रूप दिखाकर होली के, जब नैन रसीले टुक मटके।
मंगवाये थाल गुलालों के, भर डाले रंगों से मटके।
फिर स्वांग बहुत तैयार हुए, और ठाठ खु़शी के झुरमुटके।
गुल शोर हुए ख़ुश हाली के, और नाचने गाने के खटके।
मरदंगें बाजी, ताल बजे, कुछ खनक-खनक कुछ धनक-धनक॥2॥

पोशाक छिड़कवां से हर जा, तैयारी रंगी पोशों की।
और भीगी जागह रंगों से, हर कुंज गली और कूचों की।
हर जागह ज़र्द लिबासों से, हुई ज़ीनत सब आगोशों की।
सौ ऐशो-तरब की धूमें हैं, और महफ़िल में मै नोशों की।
मै निकली जाम गुलाबी से, कुछ लहक-लहक कुछ छलक-छलक॥3॥

हर चार तरफ़ खु़शवक़्ती से दफ़ बाजे, रंग और रंग हुए।
कुछ धूमें फ़रहत इश्रत की, कुछ ऐश खु़शी के रंग हुए।
दिल शाद हुए ख़ुशहाली से, और इश्रत के सौ ढंग हुए।
यह झमकी रंगत होली की जो देखने वाले दंग हुए।
महबूब परीरू भी निकले कुछ झिजक-झिजक कुछ ठिठक-ठिठक॥4॥

जब खू़बां आये रंग भरे, फिर क्या-क्या होली झमक उठी।
कुछ हुश्न की झमकें नाज़ भरीं, कुछ शोख़ी नाज़ अदाओं की।
सब चाहने वाले गिर्द खड़े, नज़्ज़ारा करते हंसी खु़शी।
महबूब नशे की खू़बी में, फिर आशिक़ ऊपर घड़ी-घड़ी।
हैं रंग छिड़कते सुखऱी के, कुछ लपक-लपक कुछ झपक-झपक॥5॥

है धूमख़ुशी की हर जानिब, और कसरत है खु़श वक़्ती की।
हैं चर्चे होते फ़रहत के, और इश्रत की भी धूम मची।
खूंबां के रंगीं चेहरों पर हर आन निगाहें हैं लड़तीं।
महबूब भिगोएं आशिक़ को, और आशिक़ हंसकर उनको भी।
खु़श होकर उनको भिगोवें हैं, कुछ अटक-अटक कुछ हुमक-हुमक॥6॥

वह शोख़ रंगीला जब आया, यां होली की कर तैयारी।
पोशाक सुनहरी, जेब बदन, और हाथ चमकती पिचकारी।
की रंग छिड़कने से क्या-क्या, उस शोख़ ने हरदम अय्यारी।
हमने भी ”नज़ीर“ उस चंचल को, फिर खू़ब भिगोया हर बारी।
फिर क्या-क्या रंग बहे उस दम कुछ ढलक-ढलक कुछ चिपक-चिपक॥7॥
(नाज़ो-अदा=नाज, अंदाज, अबरन=आभूषण, खु़शवक़्ती=
समय की अनुकूलता,सौभाग्य, पोशों=वस्त्र, ज़र्द=केसरिया,
ज़ीनत=सुन्दरता, आगोशों=बग़ल,गोद, ऐशो-तरब=आनन्द,
मै नोशों=शराब पीने वाले, मै=शराब, फ़रहत=खुशी, परीरू=
परियों जैसी शक़्ल सूरत वाले, खू़बां=खूबसूरत, जानिब=तरफ़,
कसरत=अधिकता)

17. होली की रंग फ़िशानी से है रंग यह कुछ पैराहन का - नज़ीर अकबराबादी

होली की रंग फ़िशानी से है रंग यह कुछ पैराहन का।
जो रंगारंग बहारों में हो सहन चमन और गुलशन का।

जिस खू़बी और रंगीनी से गुलज़ार खिले हैं आलम में।
हर आन छिड़कवां जोड़ों से है हुश्न कुछ ऐसा ही तनका।

ले जाम लबालब भर दीना फिर साक़ी को कुछ ध्यान नहीं।
यह साग़र पहुंचे दोस्त तलक या हाथ लपक ले दुश्मन का।

हर महफ़िल में रक़्क़ासों का क्या सिहर दिलों पर करता है।
वह हुश्न जताना गानों का, और जोश दिखाना जीवन का।

है रूप अबीरों का महवश और रंग गुलालों का गुलगूं।
हैं भरते जिसमें रंग नया, है रंग अजब इस बर्तन का।

उस गुल गूं ने यूं हम से कहा, क्या मस्ती और मदहोशी है।
ना ध्यान हमें कुछ चोली का, ना होश तुम्हें कुछ दामन का।

जब हमने ”नज़ीर“ उस गुलरू से यह बात कही हंसकर उस दम।
क्या पूछे है, ऐ! रंग भरी है मस्त हसीना फागुन का।
(पैराहन=वस्त्र,लिबास, साक़ी=शराब पिलाने वाला, साग़र=
शराब का प्याला, रक़्क़ासों, नर्तक,नाचने वाले, सिहर=जादू,
महवश=आकृति वाला,)

18. सनम तू हमसे न हो बदगुमान होली में - नज़ीर अकबराबादी

सनम तू हमसे न हो बदगुमान होली में।
कि यार रखते हैं यारों का मान होली में॥
वह अपनी छोड़ दे अब ज़िद की आन होली में।
हमारे साथ तू चल महरबान होली में।
फिर तेरी घट न जावेगी शान होली में॥1॥

ज़रा तू घर से निकल देख कु़दरते अल्लाह।
कि रंग में भीग रहे हैं तमाम माहियो-माह॥
खड़े हैं पीरो जवां तिफ्ल नाजनीं सरे राह।
किसी की सुर्ख है पगड़ी किसी की ज़र्द कुलाह॥
खुशी से मस्त है यक्सर जहान होली में॥2॥

नशे में कितने तो माशूक हैंगे मतवाले।
जल्वे उनके हज़ारों हैं देखने वाले॥
किसी के हाथ में शीशे किसी के हैं प्याले।
किसी ने हाथ किसी के गले में हैं डाले॥
करे हैं ऐश सभी मैकशान होली में॥3॥

कोई तो बांधे है दस्तार गुलनारी।
किसी के हाथ में हैंगा गुलाल पिचकारी॥
किसी की रंग में पोशाक ग़र्क है सारी।
किसी के गाल पे है सुर्ख़ रंग की धारी॥
अजब बहार जो ठहरी है आन होली में॥4॥

कहीं जो देखा तो है नाज़नीं बहुत चंचल है।
कि जिसको देखके आशिक का दिल न पावै कल॥
गले और बाजू में पहने हैं नौरतन हैकल।
चले जो राह कमर में पड़े हैं सौ सौ बल॥
है इस तरह का वह नाजु़क मियान होली में॥5॥

तमाम शहर में हरसू मची हैं रंगरलियां।
गुलाल अबीर से गुलज़ार हैं सभी गलियां॥
कोई किसी के साथ कर रहा है अचपलियां।
गरज़ कि ज़ोर हवाएं हैं ऐश की चलियां॥
किसी को ऐश सिवा कुछ न ध्यान होली में॥6॥

‘नज़ीर’ होली तो हरजा हो रही होगी।
पर हमने सैर यह इक बाग़ में अजब देखी॥
दीवारें बाग़ की यक्सर सुनहरी नक़्क़ाशी।
और उनके बीच में एक नौबहार बारहदरी॥
ज़री का उसमें खिंचा सायवान होली में॥7॥

हर एक ने अपने मुआफ़िक़ दिया है फ़र्श बिछा।
खु़शी से बैठा हुआ सैर बाग़ की करता॥
है भीड़ भाड़ का अब इस ज़हूर का चर्चा।
कि बीच बाग़ के तिल धरने को नहीं है जा॥
रहा था न कोई खाली मकान होली में॥8॥

हुई है किसी परविश मुखविचों की दुकान।
तरह तरह की शराबों का किया सामान॥
कोई कहे है कि मेरी गुलाबी भर दे जान।
रुपया अशर्फी का इस क़दर है वारान॥
कि वह दुकान हुई ज़र की खान होली में॥9॥

और कितने ऐसे हैं सूरत के उनके मतवाले।
कि उनकी आंखसे पीते हैं दम बदम प्याले॥
कहते हैं ‘हाय’ ‘हाय’ रे इन ज़ालिमों ने घर गाले।
कहीं हज़ारों व लाखों हैं देखने वाले॥
खड़े हैं सामने घेरे दुकान होली में॥10॥

हज़ारों खोमचे वाले फिर हैं लालो लाल।
पुकारते हैं मिठाई है और मोंठ की दाल॥
तमोली बैठे हैं बीड़ों में अपना मुंह कर लाल।
कोई पुकारे है क्या ज़ोर है नशे रंग लाल॥
कोई नशा, कोई खाता है पान होली में॥11॥

कोई तो हुस्न में अपने कहे हैं गुलशन हूं।
कोई बहार दिखाकर कहे हैं लालन हूं॥
लुभा के दिल के और बोला कि मैं तो मोहन हूं।
कोई पुकारे है आशिक मैं बामन हूं॥
दिलाओ अब कोई बोसे का दान होली में॥12॥

कोई किसी के ऊपर लाल घड़ा छुड़ाता है।
कोई गुलाल किसी के मुंह पे फेंक जाता है॥
कोई किसी के नई गालियां सुनाता है।
मुआफ़िक अपने हरेक होली को मनाता है॥
गरज़ कि दोनों ही की है आन बान होली में॥13॥
(माहियो-माह=मछली और चांद पाताल से
आकाश तक, कुलाह=टोपी, मैकशान=शराब पीने
वाले, नौरतन=नौ नगा नाम का गहना, हैकल=
चौकोर पान के तथा अन्य प्रकार के आकार के
कई जंतरों से बना गले में पहनने का स्त्रियों
का एक गहना,हुमेल, नाजु़क मियान=नाजुक
कमरवाला, मुखविचों=शराब बेचने वाले)

19. होली हुई नुमायां सौ फ़रहतें सभलियां - नज़ीर अकबराबादी

होली हुई नुमायां सौ फ़रहतें सभलियां।
डफ बजने लागे हरजां, और इश्रतें और छलियां॥
बातें हंसी खु़शी की, हर लब से फिर निकलियां।
मै के नशों ने हरदम तर्जे़ खुर्द की छलियां॥
रंग और गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥1॥

पड़ने से रंग हर जां आपस में यार भीगे।
गुलशोर भी मचाए और बार-बार भीगे॥
रंगत के जो खड़े थे उम्मीदवार भीगे।
आशिक भी तरवतर है और गुल इज़ार भीगे॥
रंग औ गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥2॥

कुछ ठाठ आके ठहरे कुछ स्वांग रूप चमके।
कुछ गिर्द उनके खुश हो अम्बोह आन धमके॥
अश्शाक़ में भी हरदम रंग उल्फ़तों के दमके।
खू़ंबा के भी हर इक जा हुस्नोजमाल झमके॥
रंग औ गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥3॥

देखो जिधर उधर को है सैर और तमाशा।
कुछ नाचने के खटके कुछ राग रंग ठहरा॥
ठठ्ठे हंसी के चर्चे ऐशो तरब का चर्चा।
सौ सौ बहारें चुहलें आई नज़र अहा हा॥
रंग औ गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥4॥

हैं रंग साथ लेकर आपस में यार फिरते।
आया जो उनके आगे खूब उसपे रंग छिड़के॥
कोई किसी से भागें कोई किसी को पकड़े।
भीगे बदन सरापा मुंह लाल ज़र्द कपड़े॥
रंग औ गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥5॥

होती हैं चुहलें क्या क्या नाज़ो अदा की भीगें।
मुंह पर गुलाल, भोंहैं उस आश्ना की भीगें।
जुल्फ़ें भी रंग से हैं हर दिलरुवा की भीगें।
पोशाके़ं बदन में हर दिलरुवा की भीगें।
रंग औ गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥6॥

हैं रंग से जो भीगे महबूब हुस्न वाले।
हंसते हैं सब खु़शी से बांहें गले में डाले॥
कपड़े छिड़कवां उनके हर दिल को खुश हैं आते।
मुखड़े हैं जगमगाते तुर्रे हैं झमझमाते॥
रंग और गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥7॥

होली की यारो क्या-क्या कहने में आती खूबी।
कुछ ज़ोर ही मजे़ की हरदम बहार देखी॥
सुनते ही आए क्या! क्या! बातें हंसी खुशी की।
आगे ‘नज़ीर’ अब तो क्या कहिए वाह! वाह! जी॥
रंग और गुलाल पड़के रंगी हुई हैं गलियां।
दिखलाई अपनी क्या-क्या होली ने रंग रलियां॥8॥
(गुल इज़ार=गुलाब जैसे सुकुमार गालों वाला,
सरापा=सिर से पैर तक, आश्ना=मित्र,यार)

20. जो ज़र्द जोड़े से ऐ यार! तू खेले होली - नज़ीर अकबराबादी

जो ज़र्द जोड़े से ऐ यार! तू खेले होली।
आके मुखड़े की बलाएं अभी ले ले होली॥

रात छाती से लिपट रंग छिड़क मल के गुलाल।
क्या हम शोख़ से खेले हैं ले ले होली॥

गालियां देते हैं और मलते हैं कीचड़ मुंह पर।
तुम से ऐ यार! जो भड़ुआ हो सो खेले होली॥

पहन कर आते हैं यह गुलरू जो छिड़कवां जोड़े।
उनका आशिक़ जो कोई हो वही खेले होली॥

सब तो हैं आशिक़ माशूक़ व लेकिन प्यारे।
क्या मजे़ के वह दिखाती हैं झमेले होली॥

कहीं गाली कहीं झिड़की, कहीं कोहनी, कहीं लात।
सौ अदाओं के बहा देती है रेले होली॥

शुक्र है आज तो मुद्दत में बना रंग 'नज़ीर'।
अपने हम यार से दिल खोल के खेले होली॥

21. उनकी होली तो है निराली जो हैं मांग भरी - नज़ीर अकबराबादी

उनकी होली तो है निराली जो हैं मांग भरी।
साथ फिरती हैं कई रंग भरी राग भरी।
अपनी होली तो उसी यार की है राग भरी।
जिसके दरवाजे़ पर बैठीं हैं कई फाग भरो।
आह के शोले हैं और सीने में है आग भरी।
हम फ़क़ीरों की सदा होली है बैराग भरी॥

छिड़कवां जोड़ा जो गुदड़ी का पड़ा भारी है।
जिस पर उस दीदयेखूंखार की गुलकारी है।
आंसू का रंग है और पलकों की पिचकारी है।
किसकी होली में भला कहिये ये तैयारी है॥

ये जो रो रो के हम करते हैं आँखों को लाल।
और हाथों से और आँखों से उड़ाते हैं गुलाल।
सामने रंग छिड़कता है खड़ा सर पर वह लाल।
दम के बजते हैं पड़े तबलाओं सारंगी ओ ताल॥

तन से टपके हैं पसीने के जो कतरात पड़े।
रंग यों बरसे हैं ज्यूं ख़ल्क में बरसात पड़े।
भीगे रंगों से जो दिलबर के गले हाथ पड़े।
होली उस यार से खेले हैं जो दिन रात बड़े॥

अपनी ही ख़ाक अबीरों की बंधी झोली है।
अपना ही रंग और अपना ही दिल रोली है।
अपने ही साथ हर एक बोली है और ठठोली है।
आप ही हँस हँस के पुकारे हैं खड़े होली है॥

आस को तोड़ दिया आस के फिर आस न पास।
रंग में रंग मुहब्बत का हमें आया हैरास।
अपने बेगाने का कुछ दिल में न खतरा न हिरास।
होली उस यार से खेलें हैं खड़े हो विश्वास॥

और तो पीते हैं होली में मिल मिल के शराब।
हम मुहब्बत के नशे में हैं हमेशा ग़रक़ाब।
चश्म के प्यालें हैं और आंसू की मै दिल के कबाब।
गम में पी-पी के लहू लोटें हैं नित मस्त खराब॥

है कढ़ाई धरी कर कासये सर के टुकड़े।
मैदा घी तेल शकर शान ओ बर के टुकड़े।
तकते हैं शामो-सहर करके कमर के टुकड़े।
क्याही पकवान उतरते हैं जिगर के टुकड़े॥

पूछता है जो कोई राहे मुहब्बत से आ।
तुमने सामान किया होली का अबके क्या क्या।
रंग ज़र्द अपना दिखा देते हैं उसको ये सुना।
देख ले आन के क्या पूछे है मुझसे बाबा॥

सब से हैं रूठ रहे हमने मनाई होली।
आपको खो दिया जब हमने मनाई होली।
दिल जिगर जोड़ कर मैदां में लगाई होली।
तन को होला किया तब हमने जलाई होली॥

तन को है ख़ाक किया होके मुहब्बत में असीर।
रात दिन उसका उड़ाते हैं गुलाल और अबीर।
ऐसी होली है उन्हीं की जो हैं दिलबर के फ़कीर।
साल भर अपने तो घर होली ही रहती है ‘नज़ीर’॥
(दीदयेखूंखार=भयानक दृष्टि, कतरात=बूँदें,
हिरास=चिन्ता,दुःख, ग़रक़ाब=डूबे हुए, चश्म=
आँख, कासये सर=खोपड़ी,कपाल, शामो-सहर=
शाम-सुबह, असीर=बन्दी)

Jane Mane Kavi (medium-bt) Hindi Kavita (medium-bt) Nazeer Akbarabadi(link)

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